Varalakshmi Vrat katha: वरलक्ष्मी व्रत की पौराणिक कथा
धार्मिक शास्त्रों के अनुसार माता वरलक्ष्मी को देवी महालक्ष्मी का ही अवतार माना जाता हैं, इसलिए भी उनका नाम वर और लक्ष्मी मिलाकर वरलक्ष्मी पड़ा। यह व्रत श्रावण के महीने में सावन पूर्णिमा या रक्षा बंधन के त्योहार से पहले आने वाला शुक्रवार को मनाया जाता है। खासकर दक्षिण भारत में रखा जाने वाला यह व्रत सभी मनोकामना को पूर्ण करने और पैसे की तंगी को दूर करने वाला माना गया है। चलिए पढ़ते हैं इस व्रत की कथा।
वरलक्ष्मी व्रत की कथा:-1
कहा जाता है कि वरलक्ष्मी माता की कथा भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा के अनुसार मगध देश में कुंडी नामक एक नगर था। उस नगर का निर्माण सोने से हुआ था। उस नगर में चारुमती नाम की एक महिला रहती थी। चारुमती अपने पति का बहुत ख्याल रखती थी और वह माता लक्ष्मी की बहुत बड़ी भक्त थी। हर शुक्रवार को चारुमती माता लक्ष्मी का व्रत करती थी और लक्ष्मी जी भी उससे से बहुत प्रसन्न रहती थी।
एक बार मां लक्ष्मी ने चारुमती के सपने में आकर उसको इस व्रत के बारे में बताया। तब चारुमती से उस नगर की सभी महिलाओं के साथ मिलकर विधिपूर्वक इस व्रत को रखा और मां लक्ष्मी की पूजा की। जैसे ही चारुमती की पूजा संपन्न हुई, वैसे ही उसके शरीर पर सोने के कई आभूषण सज गए तथा उसका घर भी धन-धान्य से परिपूर्ण हो गया। उसके बाद नगर की सभी महिलाओं ने भी इस व्रत को रखना शुरू कर दिया।
तभी से इस व्रत को वरलक्ष्मी व्रत के रूप में मान्यता मिल गई। और इसी कारण प्रतिवर्ष महिलाएं श्रावण मास के शुक्ल पक्ष के अंतिम शुक्रवार को तथा श्रावण पूर्णिमा का पहले यह व्रत रखकर माता वरलक्ष्मी की विधिपूर्वक पूजा करती हैं।
इस प्रकार व्रत रखने से मां लक्ष्मी प्रसन्न होकर धन और सुख-समृद्धि का वरदान देती है। अपार धन-संपत्ति देने वाला यह व्रत रखने से धन की तंगी, गरीबी, आर्थिक समस्याएं आदि दूर करता है तथा घर में धन-समृद्धि और धन-धान्य बढ़ता ही चला जाता है। इसीलिए श्रावण पूर्णिमा से पहले आने वाला वरलक्ष्मी व्रत बहुत अधिक महत्वपूर्ण माना गया है। ऐसी इस व्रत की खास महिमा है।
वरलक्ष्मी व्रत की कथा:-2
कैलाश पर्वत पर भगवान शिव और माता पार्वती के बीच चौसर के खेल में जीत को लेकर विवाद हुआ। मध्यस्थ बने शिवभक्त चित्रनेमि ने पक्षपात करते हुए असत्य कह दिया कि भगवान शिव जीते हैं। इस असत्य भाषण से क्रोधित होकर माता पार्वती ने चित्रनेमि को कुष्ठ रोगी होने का श्राप दे दिया।
भगवान शिव की प्रार्थना पर माता पार्वती ने श्रापमुक्ति का उपाय बताते हुए कहा कि जब सरोवर तट पर अप्सराएं वरलक्ष्मी व्रत करेंगी, तब उनके संसर्ग से वह रोगमुक्त होगा। श्रापवश चित्रनेमि कैलाश से गिरकर सरोवर किनारे कुष्ठ रोगी जीवन बिताने लगा।
समय आने पर सरोवर तट पर आई अप्सराओं ने चित्रनेमि को श्रावण मास के शुक्ल पक्ष के शुक्रवार को किया जाने वाला 'वरलक्ष्मी व्रत' और उसकी पूजन विधि बताई। अप्सराओं द्वारा विधि-विधान से व्रत पूजन संपन्न करने पर धूप और दीप के प्रभाव से चित्रनेमि का कुष्ठ रोग दूर हो गया और उसका शरीर सोने जैसा कांतिवान बन गया।
इसके बाद चित्रनेमि ने भी स्वयं देवी की प्रतिमा स्थापित कर पूरे विधि-विधान, 21 पकवानों और 5 वायानों से वरलक्ष्मी माँ का पूजन किया। व्रत के प्रभाव से वह पूरी तरह श्रापमुक्त होकर पुनः कैलाश पहुँचा। माता पार्वती और भगवान शिव ने उसे आशीर्वाद दिया। पौराणिक मान्यता के अनुसार, इसी व्रत के प्रभाव से माता पार्वती को कार्तिकेय, राजा विक्रमादित्य को राज्य और नंदा को सर्वसमर्थ पुत्र की प्राप्ति हुई थी।
इस प्रकार भविष्यपुराण में वर्णित श्रावण शुक्रवार को किया जाने वाला वरलक्ष्मी व्रत सम्पूर्ण होता है।
॥इति श्री वरलक्ष्मी व्रत कथा सम्पूर्णः॥

