पिठोरी अमावस्या: तिथि, नाम-महिमा, धार्मिक महत्व एवं पौराणिक कथा
पूर्णिमान्त कैलेंडर के अनुसार भाद्रपद मास तथा अमान्त कैलेंडर के अनुसार श्रावण मास की अमावस्या तिथि को 'पिठोरी अमावस्या' के रूप में मनाया जाता है। वर्ष 2026 में यह पावन पर्व 10 सितंबर को पड़ रहा है। चलिए जानते हैं इस पर्व का महत्व और पौराणिक कथा।
अमावस्या तिथि एवं समय (2026)
तिथि प्रारंभ: 10 सितंबर 2026, प्रातः 10:33 बजे
तिथि समाप्त: 11 सितंबर 2026, प्रातः 08:56 बजे
नाम-महिमा एवं विभिन्न क्षेत्रीय पहचान
एक ही तिथि को देश के अलग-अलग अंचलों में विभिन्न नामों और परंपराओं के साथ मनाया जाता है:
कुशगृहिणी अमावस्या:
इस दिन वर्ष भर के समस्त धार्मिक व मांगलिक अनुष्ठानों हेतु पवित्र 'कुश' घास एकत्र (ग्रहण) की जाती है। इसी कारण इसे कुशगृहिणी अमावस्या कहते हैं।
पिठोरी / मातृ अमावस्या:
'पिठोरी' शब्द संस्कृत के 'पिष्टक' (आटा) से बना है। प्राचीन समय में माताएं अपनी संतान की दीर्घायु और कुल रक्षा के लिए आटे (पिठ) से निर्मित प्रतिमाएं व लड्डू बनाकर देवी दुर्गा, 64 योगिनियों तथा सप्तमातृकाओं की पूजा करती थीं। माताओं के वात्सल्य और संतान-मंगल की भावना से जुड़े होने के कारण इसे 'मातृ अमावस्या' भी कहा जाता है।
पोला अमावस्या:
महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ में यह पर्व पशुधन को समर्पित कृषि एवं लोक पर्व के रूप में मनाया जाता है। इस दिन बैलों का शृंगार कर पूजन किया जाता है, उन्हें पूरणपोली खिलाई जाती है तथा बच्चे मिट्टी व लकड़ी के बैलों से खेलते हैं। छत्तीसगढ़ में इसी अवसर पर 'बैल सजाओ प्रतियोगिता' का आयोजन होता है।
धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व
पितृ तृप्ति व शांति: यह अमावस्या पितृपक्ष से ठीक पहले आती है। इस दिन स्नान, दान, श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने से पितरों को शांति मिलती है और वंश वृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
शिव-शनि एवं पीपल पूजन: शाम के समय पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक प्रज्वलित कर भगवान शिव, देवी दुर्गा और शनिदेव की आराधना करने से कष्टों से मुक्ति मिलती है।
पौराणिक व्रत कथा (पोलेरम्मा / पिठोरी व्रत कथा)
पौराणिक कथा के अनुसार, एक परिवार में सातों भाइयों की पत्नियों ने पिठोरी अमावस्या का व्रत रखना प्रारंभ किया। किंतु दुर्भाग्यवश, सबसे बड़े भाई की पत्नी जब भी यह व्रत रखती, उसके बालक का निधन हो जाता। सात वर्षों तक लगातार ऐसा ही हुआ। सातवें वर्ष दुःखी माता ने अपने मृत पुत्र के शव को छिपा दिया।
रात्रि में गांव की कुलदेवी मां पोलेरम्मा (मां दुर्गा का स्वरूप) जब गश्त पर निकलीं, तो उन्होंने उस दुःखी मां को देखा। देवी द्वारा कारण पूछने पर उसने अपना सारा दुख व्यक्त किया। देवी पोलेरम्मा ने दयाद्र होकर उसे आदेश दिया कि वह उन सभी स्थानों पर हल्दी छिड़क दे, जहाँ-जहाँ उसके बालकों का अंतिम संस्कार हुआ था।
महिला ने मां पोलेरम्मा के बताए अनुसार हल्दी छिड़की, जिससे उसके सातों पुत्र पुनः जीवित हो उठे। घर लौटने पर जीवित पुत्रों को देखकर उसकी खुशी की सीमा न रही। इसी पौराणिक घटना के बाद से संतान की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि हेतु पिठोरी अमावस्या व्रत की परंपरा पूरे भारत में प्रचलित हुई। उत्तर भारत में यह दुर्गा पूजा तथा दक्षिण भारत में मां पोलेरम्मा की आराधना के रूप में प्रसिद्ध है।
पौराणिक व्रत कथा पौराणिक कथा:
इन्द्राणी के पूछने पर माता पार्वती ने पिठोरी अमावस्या व्रत की यह पौराणिक कथा सुनाई:
पूर्वांचल में श्रीधर नामक धनाढ्य ब्राह्मण के ज्येष्ठ पुत्र शंकर की पत्नी विदेहा के शिशु जन्म लेते ही मृत हो जाते थे। एक बार भाद्रपद (पिठोरी) अमावस्या के दिन पुनः मृत शिशु के जन्म पर सासू सुमित्रा की डांट से दुखी होकर विदेहा मृत शिशु को लेकर वन की ओर चली गई।
वन में एक मठ के पास पहुंचकर वह मठनारी के निर्देशानुसार बेलपत्रों के पीछे छुप गई। मध्यरात्रि में वहाँ चौंसठ योगिनियां पूजा-अर्चना हेतु प्रकट हुईं। विदेहा ने विनम्रतापूर्वक उनके समक्ष उपस्थित होकर अपने मृत शिशुओं की व्यथा सुनाई और कृपा की गुहार लगाई।
विदेहा के करुण वचनों से द्रवित होकर चौंसठ योगिनियों ने उसे नैवेद्य दिया और अखंड सौभाग्य व पुत्र-पौत्र की प्राप्ति का वरदान दिया। देवी योगिनियों के प्रभाव से उसके आठों मृत पुत्र जीवित होकर सामने आ गए। विदेहा सहर्ष अपने बच्चों के साथ घर लौटी, जहाँ परिवार ने उसका भव्य स्वागत किया। इसके बाद विदेहा ने संपूर्ण विधि-विधान व मंगल-गीतों के साथ चौंसठ योगिनियों का पूजन किया।
माता पार्वती ने इन्द्राणी को बताया कि जो भी स्त्री भाद्रपद अमावस्या को चौंसठ योगिनियों का ध्यान व पूजन कर इस पिठोरी महाव्रत का पालन करती है, उसे पुत्र, पौत्र और धन-धान्य की सिद्धि प्राप्त होती है।

