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चोमू शहर में बंदरों का आतंक! लोगों में दहशत, एक साल से फाइल में दबा ज्ञापन, राहत का इंतजार

Chomu Jaipur monkey menace
Chomu residents monkey terror: राजस्थान के चोमू शहर की कई कालोनियों में इन दिनों सुबह का सूरज किसी नए उत्साह के बजाय अनजाने डर और दहशत की आहट लेकर आता है। प्रतिदिन सुबह 5 से 7 बजे के बीच लाल मुंह के बंदरों का झुंड लगातार लोगों को निशाना बना रहा है। इधर से उधर छलांग लगाते इन बंदरों की जगह-जगह मौजूदगी स्थानीय निवासियों के लिए 'अघोषित कर्फ्यू' से कम नहीं होती।

लाठियों के साये में सुबह, थमे रोजमर्रा के काम

आलम यह है कि सुबह के इन दो घंटों में अशोक विहार समेत अन्य का‍लोनियों में जनजीवन ठप सा हो जाता है। लोग अपने ही घरों में कैद होने को मजबूर हैं। स्थिति इतनी खौफनाक है कि सुबह उठकर घर से बाहर कदम निकालने से पहले पड़ोसी एक-दूसरे को फोन करके या छतों से आवाज लगाकर यह पुष्टि करते हैं कि क्या बंदरों का झुंड तो आसपास नहीं है। 
 
बच्चों को स्कूल छोड़ना हो, दूध-सब्जी लाना हो या फिर बुजुर्गों का कॉलोनी के मंदिर में भोलेनाथ के दर्शन के लिए जाना, सारे काम या तो सुबह 5 बजे से पहले निपटाए जा रहे हैं या फिर 7 बजे के बाद। घर से बाहर निकलने वाले हर व्यक्ति के हाथ में अपनी आत्मरक्षा के लिए लाठी या डंडा होना अब मजबूरी बन चुका है। लगभग पूरे शहर में ही इन बंदरों का आतंक बना हुआ है। 

जरा सी चूक और बड़ा नुकसान

अशोक विहार समेत अन्य इलाके के निवासियों का कहना है कि खिड़की या दरवाजा खुला रह जाए तो बंदर सीधे रसोई में घुसकर राशन और खाने का सामान चट कर जाते हैं। कपड़े फाड़ना, नल-वाइपर तोड़ना और इलेक्ट्रॉनिक सामान को नुकसान पहुंचाना अब आम बात हो गई है। ये बंदर दोपहिया और चार पहिया वाहनों को भी नुकसान पहुंचाते हैं। जब भी कोई नागरिक इन्हें भगाने का प्रयास करता है तो बंदरों का पूरा झुंड आक्रामक होकर उन पर हमला बोल देता है।

एक महिला गंवा चुकी है जान, सैकड़ों पहुंचे अस्पताल

गंभीर बात यह है कि पिछले साल बंदरों के हमले से घबराकर छत से नीचे गिरने के कारण एक महिला की दर्दनाक मौत भी हो चुकी है। इस त्रासदी के बाद चोमू के स्थानीय व्यापारियों, समाजसेवियों और आम नागरिकों ने पूर्व नगरपालिका अध्यक्ष आशीष दुसाद के नेतृत्व में तत्कालीन एसडीएम को ज्ञापन सौंपा था। ज्ञापन में पीड़िता के परिजनों को मुआवजा देने और पूरे शहर को बंदरों के आतंक से मुक्ति दिलाने की मांग की गई थी।

नगर परिषद की कार्यप्रणाली पर सवाल

पूरा एक साल बीत जाने के बाद भी स्थिति जस की तस बनी हुई है। प्रशासन और नगर परिषद की उदासीनता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मुआवजे और बंदर पकड़ने की मांग वाला वह ज्ञापन आज भी एसडीएम कार्यालय में फाइलों के नीचे धूल फांक रहा है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि बंदरों को पकड़ने के नाम पर समय-समय पर लाखों रुपए का बजट भी पास होता है, लेकिन ठेकेदारों और जिम्मेदार अधिकारियों की मिलीभगत के कारण अभियान कभी अंजाम तक नहीं पहुंच पाता। 
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