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भुवनेश्वरी जयंती 2026: कौन हैं माता भुवनेश्वरी? जानिए 10 महाविद्याओं में शामिल देवी से जुड़ी 5 खास बातें

भुवनेश्वरी जयंती 2026
दस महाविद्याओं में चौथा स्थान प्राप्त माता भुवनेश्वरी संपूर्ण सृष्टि की अधिष्ठात्री देवी और आद्याशक्ति मानी जाती हैं। इनका नाम दो शब्दों से मिलकर बना है- 'भुवन' (अर्थात् संसार/ब्रह्मांड) और 'ईश्वरी' (अर्थात् स्वामिनी/रानी)। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि (वर्ष 2026 में यह तिथि 23 सितंबर 2026, बुधवार को मनाई जाएगी) को माँ भुवनेश्वरी की जयंती के रूप में श्रद्धाभाव से मनाया जाता है। आइए जानते हैं माँ भुवनेश्वरी के बारे में 5 सबसे खास बातें।
 
द्वादशी तिथि प्रारम्भ- 22 सितम्बर 2026 को 21:43 बजे
द्वादशी तिथि समाप्त- 23 सितम्बर 2026 को 22:50 बजे
 

1. समस्त संसार और 14 भुवनों की स्वामिनी

माँ भुवनेश्वरी को चौदह भुवनों (लोकों) की जननी और शासिका माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार, जब यह संसार जलमग्न और अंधकारमय था, तब देवी ने ही अपनी दिव्य शक्ति से ब्रह्मांड की रचना की थी। वे ही जगत् का संचालन करती हैं और अंत में संपूर्ण सृष्टि उन्हीं में विलीन हो जाती है।
 

2. 'ह्रीं' बीज मंत्र की अधिष्ठात्री देवी

तंत्र साधना में देवी भुवनेश्वरी को एकाक्षरी बीज मंत्र 'ह्रीं' (Hreem) की अधिष्ठात्री देवी माना गया है। 'ह्रीं' को 'माया बीज' या 'प्रणव मंत्र' के समान अत्यंत शक्तिशाली माना जाता है। इनकी उपासना से साधक को अतुल्य वाक्-सिद्धि, तेज, ज्ञान और सम्मोहन शक्ति की प्राप्ति होती है।
 

3. सौम्य और अभय प्रदान करने वाला स्वरूप

दस महाविद्याओं में जहाँ कुछ देवियों के रूप अत्यंत उग्र और उग्र-साधना वाले हैं (जैसे माँ काली या माँ छिन्नमस्ता), वहीं माँ भुवनेश्वरी का स्वरूप अत्यंत सौम्य, मनोहर और करुणामयी है। चार भुजाओं वाली देवी अपने हाथों में वरद मुद्रा, अभय मुद्रा, अंकुश और पाश धारण करती हैं। इनके मस्तक पर चंद्रमा सुशोभित रहता है और वे कमल के आसन पर विराजमान होती हैं।
 

4. श्रीयंत्र और राज-सत्ता की दात्री

देवी भुवनेश्वरी को 'राजराजेश्वरी' भी कहा जाता है। इनकी साधना से साधक को सर्वत्र विजय, उच्च पद, समाज में मान-सम्मान और राजनीतिक या प्रशासनिक क्षेत्रों में सफलता मिलती है। माँ भुवनेश्वरी का सीधा संबंध 'श्रीयंत्र' से है, इसलिए इनकी कृपा से जीवन में कभी धन-धान्य और भौतिक सुखों की कमी नहीं रहती।
 

5. मनोकामना पूर्ति और मोक्ष का संगम

माँ भुवनेश्वरी की पूजा केवल सांसारिक सुख ही नहीं देती, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति भी प्रदान करती है। जो भक्त सच्चे मन से इनकी आराधना करता है, उसके समस्त पाप और दारिद्र्य दूर हो जाते हैं। देवी की कृपा से व्यक्ति जीवन भर समस्त सांसारिक भोग भोगता है और अंत काल में मोक्ष को प्राप्त होता है।
 

भुवनेश्वरी की कथा:

'देवी भागवत पुराण' में माता भुवनेश्वरी की कथा-

संकट में जगत् और दुर्गमासुर का अत्याचार

समय के चक्र में एक ऐसा दौर आया, जब 'दुर्गम' नामक दैत्य के पापों, अहंकार और अत्याचार से धरती और स्वर्गलोक कांप उठे। धर्म का लोप होने लगा और चारों ओर त्राहि-त्राहि मच गई। दुर्गमासुर के इस घोर अधर्म से व्याकुल होकर समस्त देवी-देवताओं, ऋषियों और ब्राह्मणों ने एक शरण स्थान चुना- पावन हिमालय पर्वत। वहाँ एकत्र होकर सभी ने निष्काम भाव से जगन्माता, आद्याशक्ति भगवती भुवनेश्वरी का ध्यान लगाया और उनकी उग्र तपस्या व स्तुति प्रारंभ की।
 

करुणामयी माँ का अलौकिक प्राकट्य

देवताओं और ऋषियों की इस निष्कपट पुकार से ब्रह्मांड की स्वामिनी माँ भुवनेश्वरी का हृदय द्रवित हो उठा। वे तुरंत उनके समक्ष प्रकट हुईं। माता का वह स्वरूप अत्यंत दिव्य और अद्भूत था- उनके हाथों में धनुष-बाण के साथ-साथ कोमल कमल पुष्प, जीवनदायिनी जड़ी-बूटियाँ, शाक और फल-मूल सुशोभित थे।
 
संसार और अपने बच्चों को भुखमरी, प्यास और कष्ट में देखकर माँ के करुणा से भरे नेत्रों से अश्रुओं की सहस्रों धाराएँ बह निकलीं। माँ के नेत्रों से बहे उस करुणामयी जल ने पूरे पृथ्वी लोक को तृप्त कर दिया। सूखी नदियाँ और समुद्र अथाह जल से लबालब भर गए। धरती की मिट्टी में पुनः जीवन का संचार हुआ और पेड़-पौधे, औषधियां एवं फसलें लहलहा उठीं।
 

युद्ध, दुर्गमासुर का वध और 'दुर्गा' नाम का प्राकट्य

संसार को जीवन देने के पश्चात् माँ भुवनेश्वरी ने रणचंडी का रूप धारण किया और देवताओं पर छाए संकट के बादलों को छीलने निकल पड़ीं। माँ भुवनेश्वरी और दैत्य दुर्गमासुर के बीच भयानक और विनाशकारी युद्ध हुआ। अंततः माँ ने अपनी अपरंपार दिव्य शक्ति से उस पापी असुर का संहार कर दिया और तीनों लोकों को उसके आतंक से सदा-सदा के लिए मुक्त कराया।
 
दुर्गमासुर जैसे परम भयंकर असुर का अंत करने के कारण ही महाशक्ति भगवती भुवनेश्वरी को इस संसार में 'देवी दुर्गा' के परम-पवित्र नाम से प्रतिष्ठा और ख्याति प्राप्त हुई।
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