क्यों भारत बन रहा चीन की मजबूरी? 7 साल बाद शी जिनपिंग के दिल्ली आने की असली वजह?
18वें ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन के लिए चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का नई दिल्ली पहुँचना अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का एक बड़ा मोड़ माना जा रहा है। 15 जून 2020 को पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प के बाद दोनों देशों के रिश्तों में गहरी कड़वाहट आ गई थी। पिछले 7 वर्षों में जिनपिंग की यह पहली भारत यात्रा है। सवाल उठना लाजमी है कि लगातार तनाव और सीमा विवाद के बावजूद आखिर चीन के लिए भारत से संबंध साधना और भारत की सरजमीं पर कदम रखना इतनी बड़ी मजबूरी क्यों बन गया है?
1. आर्थिक चुनौतियाँ और भारत का विशाल बाजार
चीन इस समय घरेलू स्तर पर कई आर्थिक चुनौतियों और धीमी विकास दर से जूझ रहा है। वहीं दूसरी ओर, अमेरिका और यूरोपीय देश चीनी सामानों पर सख्त टैरिफ और आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) पर प्रतिबंध लगा रहे हैं। ऐसे में चीन को एक ऐसे विशाल और बढ़ते बाजार की सख्त जरूरत है जो उसकी अर्थव्यवस्था को सहारा दे सके। भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, जहाँ चीन के इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और अन्य कलपुर्जों की भारी खपत है।
2. 'ग्लोबल साउथ' का नेतृत्व और भारत का कद
विकासशील और उभरते देशों (Global South) के मंच पर भारत का प्रभाव तेजी से बढ़ा है। चीन यह अच्छी तरह समझता है कि भारत को दरकिनार करके वह एशिया या ग्लोबल साउथ का एकाधिकार नेता नहीं बन सकता। भारत की 'गुटनिरपेक्ष' और बहुध्रुवीय (Multipolar) विदेश नीति के कारण पश्चिमी देश भी भारत का सम्मान करते हैं। चीन के लिए ब्रिक्स जैसे मंच पर भारत के साथ मिलकर काम करना उसकी वैश्विक विश्वसनीयता के लिए बेहद जरूरी है।
3. अमेरिकी टैरिफ और पश्चिमी दबाव का तोड़
अमेरिका में व्यापार नीतियों में आ रहे कड़े बदलावों और संभावित नए टैरिफ के डर ने चीन की चिंताएं बढ़ा दी हैं। अगर पश्चिमी देश चीन पर आर्थिक दबाव और कड़ा करते हैं, तो चीन को क्षेत्रीय स्थिरता और पड़ोसी देशों के साथ व्यापारिक रिश्तों की आवश्यकता होगी। भारत के साथ सीमा पर शांति बनाए रखना चीन की सुरक्षा और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए राहत की बात है।
4. सीमा तनाव कम करने और व्यापार सुचारू रखने की जरूरत
गलवान घाटी की घटना के बाद भारत ने कई चीनी ऐप्स पर बैन लगाया, निवेश के नियमों को सख्त किया और सीमा पर कड़ा रुख अपनाया। इसका असर चीनी कंपनियों और व्यापारिक गतिविधियों पर पड़ा है। चीन चाहता है कि सीमा पर गश्त समझौतों और बातचीत के जरिए सामान्य स्थिति बहाल हो, ताकि व्यापारिक रिश्ते फिर से सुगम हो सकें।
जिनपिंग का नई दिल्ली आना केवल एक औपचारिक यात्रा नहीं, बल्कि बदलती भू-राजनीति का प्रमाण है। भारत की मजबूत अर्थव्यवस्था, रणनीतिक स्थिति और ग्लोबल साउथ में उसकी धमक ने चीन को यह स्वीकार करने पर मजबूर कर दिया है कि एशिया में स्थिरता और विकास के लिए भारत को साथ लेकर चलना उसकी मजबूरी भी है और जरूरत भी।
चीन इस समय घरेलू स्तर पर कई आर्थिक चुनौतियों और धीमी विकास दर से जूझ रहा है। वहीं दूसरी ओर, अमेरिका और यूरोपीय देश चीनी सामानों पर सख्त टैरिफ और आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) पर प्रतिबंध लगा रहे हैं। ऐसे में चीन को एक ऐसे विशाल और बढ़ते बाजार की सख्त जरूरत है जो उसकी अर्थव्यवस्था को सहारा दे सके। भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, जहाँ चीन के इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और अन्य कलपुर्जों की भारी खपत है।
2. 'ग्लोबल साउथ' का नेतृत्व और भारत का कद
विकासशील और उभरते देशों (Global South) के मंच पर भारत का प्रभाव तेजी से बढ़ा है। चीन यह अच्छी तरह समझता है कि भारत को दरकिनार करके वह एशिया या ग्लोबल साउथ का एकाधिकार नेता नहीं बन सकता। भारत की 'गुटनिरपेक्ष' और बहुध्रुवीय (Multipolar) विदेश नीति के कारण पश्चिमी देश भी भारत का सम्मान करते हैं। चीन के लिए ब्रिक्स जैसे मंच पर भारत के साथ मिलकर काम करना उसकी वैश्विक विश्वसनीयता के लिए बेहद जरूरी है।
3. अमेरिकी टैरिफ और पश्चिमी दबाव का तोड़
अमेरिका में व्यापार नीतियों में आ रहे कड़े बदलावों और संभावित नए टैरिफ के डर ने चीन की चिंताएं बढ़ा दी हैं। अगर पश्चिमी देश चीन पर आर्थिक दबाव और कड़ा करते हैं, तो चीन को क्षेत्रीय स्थिरता और पड़ोसी देशों के साथ व्यापारिक रिश्तों की आवश्यकता होगी। भारत के साथ सीमा पर शांति बनाए रखना चीन की सुरक्षा और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए राहत की बात है।
गलवान घाटी की घटना के बाद भारत ने कई चीनी ऐप्स पर बैन लगाया, निवेश के नियमों को सख्त किया और सीमा पर कड़ा रुख अपनाया। इसका असर चीनी कंपनियों और व्यापारिक गतिविधियों पर पड़ा है। चीन चाहता है कि सीमा पर गश्त समझौतों और बातचीत के जरिए सामान्य स्थिति बहाल हो, ताकि व्यापारिक रिश्ते फिर से सुगम हो सकें।
जिनपिंग का नई दिल्ली आना केवल एक औपचारिक यात्रा नहीं, बल्कि बदलती भू-राजनीति का प्रमाण है। भारत की मजबूत अर्थव्यवस्था, रणनीतिक स्थिति और ग्लोबल साउथ में उसकी धमक ने चीन को यह स्वीकार करने पर मजबूर कर दिया है कि एशिया में स्थिरता और विकास के लिए भारत को साथ लेकर चलना उसकी मजबूरी भी है और जरूरत भी।

