जंतर-मंतर का नया व्याकरण, क्या 'Gen-Z' की गालियों से हो रहा संस्कारों का पतन, सोशल मीडिया में छिड़ी बहस
दिल्ली का जंतर-मंतर हमेशा से देश की धड़कन रहा है—यहां कभी इंकलाब के नारे गूंजते हैं, तो कभी व्यवस्था के खिलाफ आक्रोश का सैलाब उमड़ता है। लेकिन हाल ही में, नीट (NEET) परीक्षा पेपर लीक के विरोध में जुटे 'Gen-Z' (नई पीढ़ी) के प्रदर्शन ने विरोध प्रदर्शनों के इतिहास में एक नया और तीखा अध्याय जोड़ दिया है। इस आंदोलन की सबसे बड़ी चर्चा सिर्फ इसके मुद्दों को लेकर नहीं, बल्कि उस भाषा को लेकर है जो प्रदर्शनकारियों के मुंह से निकली। सरकार, प्रधानमंत्री मोदी और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को संबोधित करते हुए जिस खुलेपन और बेबाकी से फूहड़ और भद्दी गालियों का इस्तेमाल किया गया, उसने सोशल मीडिया से लेकर ड्राइंग रूम तक भूचाल ला दिया है।
यह सिर्फ एक राजनीतिक विरोध नहीं, बल्कि भाषा, संस्कृति और पीढ़ीगत अंतराल (Generation Gap) पर छिड़ी एक अंतहीन बहस बन गया है। देश की साहित्यिक और लेखक बिरादरी इस मुद्दे पर दो स्पष्ट और विपरीत ध्रुवों पर बंट गई है।
साहित्यिक बिरादरी में छिड़ा घमासान: अभिव्यक्ति या पतन?
इस पूरी घटना के बाद वैचारिक गलियारों में एक तीखी खींचतान शुरू हो गई है। एक धड़ा ऐसा है जो इन गालियों को युवा पीढ़ी के घुटनभरे गुस्से और निराशा का स्वाभाविक विस्फोट मान रहा है। इनका तर्क है कि जब सिस्टम युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करता है, जब उनकी डिग्रियां और सपने पेपर लीक की भेंट चढ़ जाते हैं, तब शालीनता और व्याकरण के दायरे टूट जाते हैं। इस वर्ग का मानना है कि गालियां समाज का हिस्सा हैं और जब सत्ता बहरी हो जाती है, तो भाषा अपनी शालीनता छोड़कर आक्रामक हो जाती है। उनके अनुसार, यह Gen-Z का अपने गुस्से को बिना किसी फिल्टर के बयां करने का तरीका है।
दूसरी तरफ, पारंपरिक साहित्यकारों, विचारकों और वरिष्ठ नागरिकों का एक बड़ा वर्ग इसे संस्कारों का गंभीर हनन और सभ्यता के पतन की शुरुआत मान रहा है। उनका कहना है कि विरोध दर्ज कराने के लोकतांत्रिक और शालीन तरीके सदियों से मौजूद रहे हैं। सार्वजनिक मंचों पर इस स्तर की भद्दी भाषा का प्रयोग न केवल राजनीतिक बहस के स्तर को गिराता है, बल्कि यह दिखाता है कि नई पीढ़ी के भीतर संवाद की संस्कृति खत्म हो रही है।
ओटीटी, सोशल मीडिया और 'मूक स्क्रीन' की देन : इस वैचारिक मंथन में एक और दिलचस्प पहलू पर बात हो रही है—वह है Gen-Z की भाषा का ताना-बाना। आज की पीढ़ी किताबों की दुनिया से दूर, ओटीटी प्लेटफॉर्म्स की वेब सीरीज, सोशल मीडिया के मीम्स और रील्स की ऐसी दुनिया में जी रही है जहाँ गालियों को 'कूल' और 'रॉ' (Raw) मानकर सामान्यीकृत कर दिया गया है। फिल्मों और सीरीज में एंटी-हीरो के मुंह से निकलने वाली गालियां अब युवाओं के दैनिक बोलचाल का हिस्सा बन चुकी हैं।
जब यही पीढ़ी अपने वास्तविक जीवन में किसी बड़े संकट या अन्याय का सामना करती है, तो उनके पास विरोध की अपनी गढ़ी हुई कोई शास्त्रीय शब्दावली नहीं होती। वे अपनी उसी सिनेमैटिक और सोशल मीडिया वाली दुनिया की भाषा में प्रतिक्रिया देते हैं, जहां आक्रोश का मतलब ही तीखा और अमर्यादित होना है।
क्या यह लोकतंत्र की नई भाषा है?
सवाल यह है कि क्या जंतर-मंतर पर सुनाई दी यह भाषा लोकतंत्र के लिए खतरनाक है या यह एक चेतावनी है? एक तरफ, भाषा की पवित्रता और सार्वजनिक जीवन की गरिमा का सवाल अपनी जगह बिल्कुल सही है। लोकतंत्र में संवाद की एक मर्यादा होती है, और जब वह मर्यादा तार-तार होती है, तो समाज की मूल संरचना खतरे में पड़ जाती है। दूसरी तरफ, यह भी सच है कि यह गुस्सा रातों-रात पैदा नहीं हुआ। युवाओं के भीतर सिस्टम के प्रति जो अविश्वास और लाचारी का भाव है, उसने इस अमर्यादित भाषा को जन्म दिया है।
अंत में, जंतर-मंतर की यह घटना सिर्फ नीट पेपर लीक तक सीमित नहीं है। यह इस बात का आईना है कि हमारी आने वाली पीढ़ी व्यवस्था से कितनी त्रस्त है और उनके गुस्से को व्यक्त करने के साधन कितने बदल चुके हैं। अब यह बहस सिर्फ इस बात की नहीं है कि गालियां दी जानी चाहिए या नहीं, बल्कि इस बात की है कि क्या हम उस समाज का निर्माण कर रहे हैं जहाँ युवाओं का गुस्सा केवल गालियों के शोर में ही दबकर रह जाए?
साहित्यिक बिरादरी में छिड़ा घमासान: अभिव्यक्ति या पतन?
इस पूरी घटना के बाद वैचारिक गलियारों में एक तीखी खींचतान शुरू हो गई है। एक धड़ा ऐसा है जो इन गालियों को युवा पीढ़ी के घुटनभरे गुस्से और निराशा का स्वाभाविक विस्फोट मान रहा है। इनका तर्क है कि जब सिस्टम युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करता है, जब उनकी डिग्रियां और सपने पेपर लीक की भेंट चढ़ जाते हैं, तब शालीनता और व्याकरण के दायरे टूट जाते हैं। इस वर्ग का मानना है कि गालियां समाज का हिस्सा हैं और जब सत्ता बहरी हो जाती है, तो भाषा अपनी शालीनता छोड़कर आक्रामक हो जाती है। उनके अनुसार, यह Gen-Z का अपने गुस्से को बिना किसी फिल्टर के बयां करने का तरीका है।
दूसरी तरफ, पारंपरिक साहित्यकारों, विचारकों और वरिष्ठ नागरिकों का एक बड़ा वर्ग इसे संस्कारों का गंभीर हनन और सभ्यता के पतन की शुरुआत मान रहा है। उनका कहना है कि विरोध दर्ज कराने के लोकतांत्रिक और शालीन तरीके सदियों से मौजूद रहे हैं। सार्वजनिक मंचों पर इस स्तर की भद्दी भाषा का प्रयोग न केवल राजनीतिक बहस के स्तर को गिराता है, बल्कि यह दिखाता है कि नई पीढ़ी के भीतर संवाद की संस्कृति खत्म हो रही है।
जब यही पीढ़ी अपने वास्तविक जीवन में किसी बड़े संकट या अन्याय का सामना करती है, तो उनके पास विरोध की अपनी गढ़ी हुई कोई शास्त्रीय शब्दावली नहीं होती। वे अपनी उसी सिनेमैटिक और सोशल मीडिया वाली दुनिया की भाषा में प्रतिक्रिया देते हैं, जहां आक्रोश का मतलब ही तीखा और अमर्यादित होना है।
क्या यह लोकतंत्र की नई भाषा है?
सवाल यह है कि क्या जंतर-मंतर पर सुनाई दी यह भाषा लोकतंत्र के लिए खतरनाक है या यह एक चेतावनी है? एक तरफ, भाषा की पवित्रता और सार्वजनिक जीवन की गरिमा का सवाल अपनी जगह बिल्कुल सही है। लोकतंत्र में संवाद की एक मर्यादा होती है, और जब वह मर्यादा तार-तार होती है, तो समाज की मूल संरचना खतरे में पड़ जाती है। दूसरी तरफ, यह भी सच है कि यह गुस्सा रातों-रात पैदा नहीं हुआ। युवाओं के भीतर सिस्टम के प्रति जो अविश्वास और लाचारी का भाव है, उसने इस अमर्यादित भाषा को जन्म दिया है।

