अगर गालियों से समाज का पतन होता है तो इसकी शुरुआत आपके बेडरूम से हो चुकी है
गालियों से याद आया कि जब मध्यप्रदेश में मोहन यादव सीएम बने थे तो उनका एक वीडियो वायरल हुआ था— वीडियो में वे गालियां दे रहे हैं, जिसे फुरसत से देखा जाना चाहिए। इसके कुछ पहले जाएं तो मध्यप्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने भी अपने कार्यकर्ताओं को बहुत ही अपनत्व और प्यारे मालवी अंदाज में बुलाया था। राजनीति में गालियों की यह अनफिल्टर्ड परंपरा हाल ही में बीजेपी मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के घंटा तक पहुंची थी। अतीत में अखबार के पन्ने और न्यूज चैनल के दृश्य टटोलेंगे तो कई जगह बीप... बीप... सुनाई दे जाएंगी।
इससे ज्यादा ही मनोरंजित होना है और समाज के सामने अच्छा नागरिक भी बने रहना है तो अपने कमरे में चुपचाप हेडफोन लगाकर ओटीटी पर कोई भी वेब-सीरीज लगा लीजिए और बाहर दफ्तर, समाज में सभ्य बनकर अच्छा नागरिक बने रहिये।
इन सब के बीच सवाल यह है कि अगर गुस्से में गालियां न दी जाएं तो गालियों की जगह क्या दिया जाना चाहिए?
ओटीटी, स्टैंडअप्स और पॉडकास्ट में गालियों को 'कूल' और 'रॉ' बताकर जिस तरह से आप और हम कूल बनते हैं तो यह भी बता दें कि इस जनरेशन को अपनी गालियों के साथ कौनसे श्लोक और मंत्र शामिल करने चाहिए थे, जिससे ये गालियां इतनी अश्लील और भद्दी न हो?
बात यह है कि गालियों का संबंध किसी पार्टी, संगठन या उम- वर्ग आदि से नहीं होता है। जिस आदमी को गुस्सा आता है— आक्रोश होता है वो जब वो चरम पर पहुंचता है तो उस आदमी के खिलाफ गालियां दी जाती हैं, जिसने उसे इसके लिए मजबूर किया है। हां, कुछ हद तक हमारे संस्कार काम आते हैं, लेकिन यह भी सिचुएशनल काम करते हैं। हम कितने ही आध्यात्मिक बन जाएं, किसी के मरने पर रो ही देंगे— किसी के बिछडने पर दुख होता ही है। हां, यह सही कि नई जनरेशन आपसे ज्यादा मुखर है— उसके लिए बहुत सी बातें नॉर्मल है, उनके बीच लिंग-भेद कम होता जा रहा है।
अगर प्रोटेस्ट में आक्रोश में एक करप्ट सिस्टम के खिलाफ निकली गालियों से समाज का पतन होता है तो यह पतन आपके बेडरूम में पहले ही हो चुका है। उन ओटीटी, स्टैंडअप कॉमेडी और पॉडकास्ट में हो चुका है, जिसे आप बड़े चाव से अपने कमरे की लाइट्स बंद कर के देखते हैं।
गालियां Gen-Z की भाषा नहीं है— न ही ये गालियां उन्होंने ईजाद की है— ये गालियां आपने उन्हें विरासत में ट्रांसफर की हैं। फर्क इतना है कि आप में सिर्फ अपने बेडरूम और प्राइवेट पार्टी में गालियां देने का साहस है— जबकि वे कहीं भी अनफिल्टर्ड नहीं हैं।
इससे ज्यादा ही मनोरंजित होना है और समाज के सामने अच्छा नागरिक भी बने रहना है तो अपने कमरे में चुपचाप हेडफोन लगाकर ओटीटी पर कोई भी वेब-सीरीज लगा लीजिए और बाहर दफ्तर, समाज में सभ्य बनकर अच्छा नागरिक बने रहिये।
इन सब के बीच सवाल यह है कि अगर गुस्से में गालियां न दी जाएं तो गालियों की जगह क्या दिया जाना चाहिए?

