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ऐसे घनघोर ज्ञानी देश में जमुई से लेकर दिल्ली तक औरतों के रेप हो रहे हैं तो इसमें इतनी हैरानी क्‍यों?

feminism
मैंने अपने जीवन के अनुभवों से जिस गुण को सबसे बड़ा और ज़रूरी माना है वो विवेक है। विवेक बुद्धि से भी बड़ा गुण है। बुद्धि धोखा दे सकती है, मन तो धोखा देता ही है, किंतु विवेक में वे सभी गुण धर्म हैं, जो हमारी आंख और दृष्टि दोनों को सही रास्ता दिखाते हैं। संस्कृत साहित्य में कहीं यह कहा गया है कि... 

विवेकः परमं वर्मा, विवेकः परमं धनम्।
विवेकहीनः पुरुषो, पशुभिः सदृशः स्मृतः।।

अर्थात विवेक ही सबसे बड़ा कवच है और विवेक ही सबसे बड़ा धन है। विवेक से हीन मनुष्य साक्षात पशु के समान माना गया है। हालांकि विवेक अच्छी संगत और जीवन में सामने आई आपाधानी, संघर्ष से उपजता है, हम किन लोगों के साथ और किस परिवेश में रहते आए हैं इस पर निर्भर करता है। इसलिए राम चरितमानस में कहा गया है,

बिनु सतसंग बिबेक न होई।
राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।

इस दौर में मनुष्य ने बुद्धि तो पर्याप्त प्राप्त कर ली, किंतु वो विवेक गंवाता जा रहा है। अपने चारों तरफ हमें ऐसे विवेकहीन लोग मिल जाएंगे, जिन्हें हम आसानी से पहचान सकते हैं। ऐसे गुणीजन को पहचानना कोई बड़ी चुनौती नहीं है, जब कोई जज यह कहे कि स्त्री का नाड़ा खोलना दुष्कर्म की श्रेणी में नहीं आता, या जब तक पेनिट्रेट न किया जाए तब तक बलात्कार नहीं माना जाना चाहिए, तो इन टिप्पणियों से सहज ही इस बात की पुष्टि हो जाती है कि स्थानीय से लेकर उच्च स्तर तक, लोकल से लेकर ग्लोबल तक तुलसी, नानक, कबीर और बुद्ध के देश में किस हद तक ज्ञान में भांग घुल चुकी है। फिर कोई विवेकहीन पशु किसी नाबालिग बच्ची की योनि वाले हिस्से में हथेली रखकर उठा ले और उसका वीडियो भी बना ले और उसे मॉरल पुलिसिंग कहे तो हैरत क्यों?
आपके मी लार्ड तो पहले ही कह चुके हैं कि नाड़ा खोलना दुष्कर्म की श्रेणी में नहीं आता और जब तक मर्द पेनिट्रेट नहीं करे उसे दुष्कर्म नहीं माना जाना चाहिए। बल्कि ज्ञान के अगले स्तर पर पहुंचकर हमारी संसद से एक साक्षात् गुरु घंटाल यह उदघोष कर चुका हैं कि जब लड़की का बलात्कार हो और यदि वो स्वयं की अस्मिता न बचा सके तो उसे अपनी आंखे बंद कर के उस अपराध को प्लेज़र में तब्दील कर लेना चाहिए!

अब ऐसे घनघोर ज्ञानी देश में जमुई से लेकर दिल्ली तक स्त्रियों, बच्चियों और नाबालिग बच्चों के साथ अगर ऐसे फुटेज आए तो हमारे माथे पर शिकन क्यों आ जाती है? हम क्यों हैरान हो जाते हैं? हम क्यों व्यथित हो जाते हैं?

तुलसी, कबीर, गुरुनानक, बुद्ध, संत तुकाराम, सूरदास, मीरा इत्यादि के बाद और उन संतों ने जो किया उसके बाद हम आपने ऐसा क्या उखाड़ लिया जिसके खराब होने पर हमे शर्मिंदा होना चाहिए? इन संतों ने जो किया उसके इतर और उसके बाद आपने और हमने ऐसा क्या किया, जिसके ध्वस्त हो जाने से हमें मार-काट रोना चाहिए? तुलसी, कबीर, तुकाराम की उस धारा के बाद और देश की आज़ादी के बाद कुकुरमुत्तों की तरह उगे बाबाओं से तो आपके हिदुस्तान की आधी जेलें भरी पड़ी हैं, जो बचे हैं वो संसद में हैं, जो संसद तक नहीं पहुंच पाए वो टीवी पर हैं या बड़े पंडालों में मंचों पर आसीन हैं, उनके सामने आपके और हमारे बीच के ही लाखों करोड़ों लोग बैठकर उनके ज्ञान का अमृत पान कर रहे हैं!

इन घटनाओं से इतने आप हैरान क्यों है भाई! आपका ध्यान तो ईश्वर की तरफ है। आप तो मंदिर मस्जिद बनवाने में मशगूल हैं, आप तो रामलीलाओं में लड़कियां नचा रहे हैं, आप तो करोड़ों की संख्या में बाबाओं, मुल्लाओं और पोपों के सामने नतमस्तक होकर बैठे हैं, या तो आप राजनीतिक सभाओं में हैं या धार्मिक पंडालों में बैठे हैं! आपको अपने सोशल सिस्टम का ख्याल कहाँ है? आप क्यों अपनी पेशानी पर बल लाने की अदा दिखा रहे हैं?

जब लड़कियां यह कह रही हैं कि... एक कचोरी दो समोसा, इन मर्दों का क्या भरोसा! एक सुट्टा दो चाय, मर्द जात हाय हाय...

औरतों के इन नारों के बाद अब मर्दों की तरफ से भी प्रतीक्षा कीजिए, मर्द भी एकआध जुमला जरूर बना लेंगे औरतों के ख़िलाफ़। यही सब तो हमने सीखा है। यही आपका देश है, और ऐसा ही आपने इसे बनाया है, इतना अचंभा क्यों? मज़ा कीजिए कि आप भारत में हैं।

आपकी जड़ों में ही में कीड़े लगे हुए हैं तो आप फूल और पत्तों से क्या अपेक्षा करेंगे? जिस धरती पर हम रहते हैं, उसी की आब ओ हवा में ज़हर घुला है तो शेष माहौल का तो समूल नाश तय है। अब कौनसा कीटनाशक इस जड़ के कीड़े मार सकेगा?

रश्मिरथी में दिनकर ने जो लिखा वो नहीं पढ़ा क्या आपने?

जब नाश मनुज पर छाता है,
पहले विवेक मर जाता है।

जब जज से लेकर जनता तक, राजा से लेकर अवाम तक का विवेक मर जाता है तो ऐसे वीडियो, ऐसे दृश्य मुझे हैरान नहीं करते। मैं किसी भी चीज़ से हैरान नहीं होता, मुझे कुछ भी अचंभित नहीं करता, आपको कर रहा है तो आप संभवतः इस दुनिया के बारे में बहुत कम जानते हैं। अभी आपको इस दुनिया के बारे में और जानना चाहिए। कभी बहुत दृश्य आना शेष है।

इस भाषा में और यह सब लिखने के लिए मैं आपसे करबद्ध क्षमा मांगता हूं। इतना ही यथेष्ट है।
लेखक के बारे में
नवीन रांगियाल
नवीन रांगियाल DAVV Indore से जर्नलिज्‍म में मास्‍टर हैं। वे इंदौर, भोपाल, मुंबई, नागपुर और देवास आदि शहरों में दैनिक भास्‍कर, नईदुनिया, लोकमत और प्रजातंत्र जैसे राष्‍ट्रीय अखबारों में काम कर चुके हैं। करीब 15 साल प्रिंट मीडिया में काम करते हुए उन्‍हें फिल्‍ड रिपोर्टिंग का अच्‍छा-खासा अनुभव है। उन्‍होंने अखबार.... और पढ़ें
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