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फिर याद आए आदिवासी

चुनाव 2008
- यशवंतसिंह पँवार, झाबुआ।
आदिवासियों के लिए आरक्षित झाबुआ-आलीराजपुर जिले की पॉंचों विधानसभा सीटों से बीते 56 सालों में जनता ने अपने 60 प्रतिनिधियों को चुनाव जीताकर भोपाल भेजा है। इनमें से 25 प्रतिनिधि तो ऐसे थे, जिन्हें दो या दो से अधिक बार चुनाव जीतने का गौरव हासिल हुआ है। लेकिन महज क्षेत्र के 6 प्रतिनिधियों को ही प्रदेश की सत्ता में भागीदारी दी गई है। यह भागीदारी भी अधिकांश को केवल एक बार और कम समय के लिए ही प्राप्त हुई है।

मौटे तौर पर यह बात साफ है कि आदिवासी प्रतिनिधियों को सत्ता में सीधी भागीदारी देने से प्रत्येक सरकार ने परहेज किया है और यदि मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व भी मिला है तो अधिकांशतः चुनावी वर्ष में सिर्फ आदिवासी वोट बैंक की याद आने से मिला है। मप्र विधानसभा में इस क्षेत्र के आदिवासी प्रतिनिधि चुनाव जीतकर जाते रहे और उनके संख्या बल का भोपाल में फायदा उठाते हुए सरकारें बनती रही हैं, किन्तु प्रादेशिक सत्ता में भागीदारी के नाम पर क्षेत्र की झोली लगभग खाली ही रही। अपवादस्वरूप केवल थांदला क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले कांतिलाल भूरिया ही एकमात्र ऐसे विधायक रहे हैं, जिन्हें कैबिनेट मंत्री एवं सरकार का महत्वपूर्ण हिस्सा बनने का अवसर मिला है।

केवल वोट बैंक पर निगाह : क्षेत्र में आदिवासियों के हित में दूरगामी फायदों को दृष्टिगत रखते हुए कोई स्थायी काम नहीं हो पाए। होते भी कैसे, क्योंकि भोपाल की कुर्सियों पर बैठने के लिए केवल आदिवासी क्षेत्रों के मतदाताओं का उपयोग करना ही तो सभी सत्ताधारियों का मुख्य लक्ष्य था। यह लक्ष्य पूरा होते ही वे आदिवासी क्षेत्रों को भूल जाते है और फिर चुनावी वर्ष में ही उनका मोह जागता है।

दो प्रतिनिधियों को अवसर मिला : आलीराजपुर सीट पर अपनी जीत का डंका बजाने वाले दो प्रतिनिधियों को प्रदेश मंत्रिमंडल में स्थान प्राप्त करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। पहले संविद सरकार के गठन के दौरान भागीरथ भँवर को तो बाद में मोतीलाल वोरा सरकार में मगनसिंह पटेल को राज्यमंत्री बनने का मौका मिला। हालाँकि ये दोनों ही मौके अधिक समय के लिए इन प्रतिनिधियों को नहीं मिल पाए हैं बीते 56 सालों में 13 चुनावों के माध्यम से 6 नेताओं को विधायक बनने का अवसर मिला और इसमे भी दो चुनाव जीतकर भागीरथ भँवर 10 सालों तक तो 6 चुनाव जीतकर मगनसिंह पटेल 24 सालों तक विधायक रहे, परन्तु प्रदेश की सत्ता में उन्हें कोई उल्लेखनीय भूमिका देने से लगभग परहेज ही किया गया।

एकमात्र विधायक भाग्यशाली रहे : थांदला सीट का लगातार चार चुनाव जीतकर 18 सालों तक भोपाल में प्रतिनिधित्व करने वाले कांतिलाल भूरिया एकमात्र ऐसे विधायक रहे हैं जो तीन-तीन बार प्रदेश मंत्रिमंडल में स्थान पाने में सफल रहे हैं। पहली बार चुनाव जीतने पर ही उन्हें अर्जुनसिंह मंत्रिमंडल में शामिल कर लिया गया था। उसके बाद श्यामाचरण शुक्ल के मंत्रिमंडल में भी उन्हें स्थान मिल गया। 1993 में दिग्विजयसिंह मंत्रिमंडल में पहली बार उन्हें कैबिनेट मंत्री बनने का मौका मिला और यह इस क्षेत्र का अब तक का सबसे बड़ा किसी भोपाल सरकार में प्रतिनिधित्व था।

मंत्री बनने से उल्टा नुकसान : झाबुआ सीट पर 6 चुनाव जीतकर 26 सालों तक रेकॉर्ड बनाने वाले बापूसिंह डामोर को राज्यमंत्री बनने का अवसर जरूर मिला, लेकिन मंत्री बनने से उनका फायदा कम और उल्टा नुकसान अधिक हो गया। 1998 के विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजयसिंह ने आदिवासी मतदाताओं को खुश करने के लिए वरिष्ठ विधायक बापूसिंह को चुनाव के कुछ महीनों पूर्व अपने मंत्रिमंडल में राज्यमंत्री के रूप में स्थान दिया था। बापूसिंह ने कुछ महीने के लिए इस सम्मान को हासिल किया, लेकिन यह सम्मान देने वालों ने ही उनका चुनाव में टिकट काट दिया। बापूसिंह के अतिरिक्त 6 अन्य प्रतिनिधियों को इस क्षेत्र से विधानसभा की सीट पर बैठने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है किन्तु सत्ता में भागीदार से सभी वंचित रहे हैं।

चुनावी वर्ष में याद आई : पेटलावद सीट पर लगातार तीन चुनाव जीतकर 15 सालों तक विधायक रहने वाली निर्मला भूरिया की वरिष्ठता का ध्यान प्रदेश की शिवराजसिंह सरकार को भी चुनावी वर्ष में ही आया है।

मात्र चुनाव के 6-7 माह पूर्व ही इस साल शिवराजसिंह सरकार ने निर्मला को राज्यमंत्री बनाते हुए आदिवासी वोट बैंक को रिझाने का प्रयास किया है। हालाँकि 41 सालों में पेटलावद के किसी प्रतिनिधि को पहली बार मंत्रिमंडल में स्थान दिया गया है। यह बात अलग है कि साढ़े चार वर्षो तक उपेक्षित रखने के बाद भोपाल की सत्ता ने निर्मला को चाहे कम समय के लिए लेकिन सत्ता में भागीदारी दी है। 1967 में गठित हुई इस सीट पर निर्मला के अतिरिक्त 6 अन्य प्रतिनिधियों को विधायक बनकर भोपाल जाने का मौका हाथ लगा है, लेकिन सत्ता में किसी की भी प्रभावी उपस्थिति दर्ज नही हो पाई है।