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इस्लामिक इतिहास में मोहर्रम और ताजिया क्या संबंध है, जानें कैसे हुई इसकी शुरुआत?
Tazia Islamic history: मोहर्रम इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना है और इसे अत्यंत पवित्र माना जाता है। इस्लामिक इतिहास और भारतीय उपमहाद्वीप की संस्कृति में मुहर्रम और ताजिया का गहरा संबंध है। सीधे शब्दों में कहें तो, मुहर्रम वह महीना है जिसमें पैगंबर मोहम्मद के नवासे (नाती) हजरत इमाम हुसैन और उनके 72 साथी कर्बला के मैदान में शहीद हुए थे, और 'ताजिया' उसी शहादत और उनकी पवित्र दरगाह/ मकबरे का एक प्रतीकात्मक रूप है जिसे लोग मुहर्रम के दौरान याद के तौर पर बनाते हैं।ALSO READ: Muharram month 2026: मोहर्रम मास का इस्लाम धर्म में महत्व और परंपरा जानें
आइए इसके इतिहास, संबंध और भारत में इसकी शुरुआत की पूरी कहानी को गहराई से समझते हैं।
ताजिया क्या है और इसका अर्थ क्या है?
'ताजिया' मूल रूप से अरबी भाषा के शब्द 'अजा' से बना है, जिसका अर्थ होता है- शोक मनाना, सांत्वना देना या किसी मृत व्यक्ति को याद करना।
धार्मिक और सांस्कृतिक संदर्भ में, ताजिया बांस की खपच्चियों, रंग-बिरंगे कागजों, पन्नी और कपड़ों की मदद से बनाया गया एक बेहद खूबसूरत ढांचा या मॉडल होता है। यह ढांचा इराक के कर्बला शहर में स्थित इमाम हुसैन के रौजे (मकबरे/दरगाह) की हुबहू नकल या प्रतीक होता है।
भारत में ताजिया की शुरुआत कैसे हुई? जानें तैमूर लंग की कहानी
दिलचस्प बात यह है कि मुहर्रम में ताजिया निकालने की परंपरा अरब देशों या इराक से शुरू नहीं हुई थी, बल्कि इसकी शुरुआत भारत (हिंदुस्तान) में हुई थी। इसका श्रेय 14वीं शताब्दी के क्रूर शासक तैमूर लंग को जाता है। इसके पीछे की कहानी इस प्रकार है:
इमाम हुसैन से लगाव: तैमूर लंग, जो तैमूरी राजवंश का संस्थापक था, वह हर साल मुहर्रम के महीने में इराक के कर्बला जाकर इमाम हुसैन के रौजे पर हाजिरी दिया करता था। वह इमाम हुसैन का बहुत बड़ा मुरीद था।
बीमारी और मजबूरी: साल 1398 के आसपास, जब तैमूर लंग ने भारत पर आक्रमण किया, तो मुहर्रम के दिनों में वह भारत में ही था और बीमार होने के कारण इराक नहीं जा सका। वह इस बात से बेहद उदास हो गया।
कलाकारों को आदेश: तैमूर की उदासी को दूर करने के लिए उसके दरबार के इंजीनियरों और कलाकारों ने कर्बला में बने इमाम हुसैन के मकबरे का एक हूबहू छोटा ढांचा बांस और कपड़ों की मदद से तैयार किया और उसे तैमूर के महल में रखा।
जुलूस की शुरुआत: तैमूर ने उस ढांचे को 'ताजिया' नाम दिया और उसे फौज व आम जनता के सामने प्रदर्शित किया। इसके बाद से ही भारत में मुहर्रम के दिनों में इमाम हुसैन की याद में ताजिया बनाने और उसे सड़कों पर जुलूस या यादगार के रूप में निकालने की परंपरा शुरू हो गई।ALSO READ: Muharram 2026: कब से शुरू हो रहा है मोहर्रम मास, जानें सही डेट
धीरे-धीरे यह परंपरा मुगल काल और नवाबों के दौर- विशेषकर लखनऊ के नवाबों में और ज्यादा भव्य होती गई।
मुहर्रम और ताजिया का धार्मिक संबंध
मुहर्रम के पहले दिन से ही लोग अपने घरों या 'इमामबाड़ों'/ शोक सभा के स्थानों में इन ताजियों को स्थापित करते हैं। मुहर्रम की पहली से नौवीं तारीख तक लोग इसके सामने बैठकर 'मजलिस' करते हैं, कर्बला का दर्दनाक इतिहास सुनते हैं, और इमाम हुसैन की शहादत पर आंसू बहाते हैं।
मुहर्रम की 10वीं तारीख 'यौम-ए-आशूरा' को इन सभी ताजियों को एक बड़े जुलूस के रूप में शहर भर में घुमाया जाता है। इस दौरान लोग 'या हुसैन' का नारा लगाते हैं और अंत में इन ताजियों को स्थानीय 'कर्बला' यानी वह स्थान या कब्रिस्तान जिसे कर्बला का नाम दिया गया हो, में ले जाकर पूरे अदब और सम्मान के साथ दफन या ठंडा कर दिया जाता है।
सांस्कृतिक एकता का प्रतीक: भारत में ताजिया सिर्फ मुस्लिम समुदाय तक सीमित नहीं रहा है। इतिहास गवाह है कि हिंदू समाज के कई लोग- जैसे राजस्थान के हुसैनी ब्राह्मण और कई ग्रामीण क्षेत्रों के लोग भी मन्नतें पूरी होने पर ताजिया बनाते हैं और मुहर्रम के जुलूस में शामिल होते हैं। यह भारत की गंगा-जमुनी तहजीब का एक बड़ा उदाहरण है।
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