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कविता : अच्छी ख़बरें हैं कितनी कम...

poem lekhan
खिन्न होता है मन, रक्षा सौदों पर होती छीछालेदर पर।
उच्च पदासीनों पर जब, ओछी टिप्पणियां होतीं इधर-उधर।।
 
युवाओं के आत्मघात, बालाओं पर पिपासुओं के प्रहार।
वृद्धों के वृद्धाश्रमों को पलायन, अपनों से होकर बेजार।।
 
भीड़तंत्र के नृशंस हमले, हर दिन मौके-बेमौके।
चोरों के बेख़ौफ़ आक्रमण, बड़े सौदों में धोखे ही धोखे।।
 
रिश्वतखोर कार्मिकों के घर नगदी और सोने के भंडार।
मतदाताओं को रिझाने झूठी घोषणाओं की बेशर्म भरमार।।
 
अवसरवादी गठजोड़ों की ख़बरें, अंतरघातों से डरे सब दल।
कैसे भी सत्ता हथियाने, घाघ राजनीति की चहल-पहल।।
 
बस ऐसी ही डरावनी ख़बरों से भरे हुए सारे अख़बार।
मन-मसोसकर सुबह-सुबह पढ़ना पड़ता है हर बार।।
 
कहीं-कहीं मिल जाती है मन बहलाने की ख़बरें।
खेलों में जीतों की, स्वर्ण-रजत पदकों के इने-गिने सेहरे।।
 
रुकी योजनाओं के पूरा होने की, नए निर्माणों की।
सफल अंतरराष्ट्रीय सौदों की, सेना को मिले दक्ष विमानों की।।
 
नई प्रतिभाओं की उपलब्धियों की, इसरो के गौरवमय चमत्कारों की।
चौकन्ने शासन के नित नव सामाजिक सरोकारों की।।
 
दिनभर विचलित रहता है मन, थोड़ी सी ख़ुशी, अधिक संभ्रम।
विचलित करती ख़बरों के आगे, सुखमय ख़बरें हैं कितनी कम।।
लेखक के बारे में
डॉ. रामकृष्ण सिंगी
डॉ. रामकृष्ण सिंगी ने मध्यप्रदेश के शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालयों में 40 वर्षों तक अध्यापन कार्य किया तथा 25 वर्षों तक वे स्नातकोत्तर वाणिज्य विभागाध्यक्ष व उप प्राचार्य रहे। महू में डॉ. सिंगी का निवास 1194 भगतसिंह मार्ग पर है। डॉ. सिंगी देवी अहिल्या विश्वविद्‍यालय इंदौर (मप्र) के वाणिज्य संकाय.... और पढ़ें
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