मैं हिन्दी हूं। बहुत दुखी हूं। स्तब्ध हूं। समझ में नहीं आता कहां से शुरू करूं? कैसे शुरू करूं? मैं, जिसकी पहचान इस देश से है, इसकी माटी से है। इसके कण-कण से हैं। जब जिसका मन चाहे अपने ही आंगन में बेइज्जत कर दी जाती हूं! कहने को संविधान...