समीक्षक : पारुल सिंह नई सदी के प्रारंभ के चार-पांच वर्षों में हिन्दी कहानी एकदम से चेहरा बदल कर सामने आई। यह जो परिवर्तन दिखाई दिया, यह उन युवा कहानीकारों के कारण था, जो उस समय अपनी कहानियां लेकर सामने आए। आज लगभग पंद्रह साल बीत जाने के बाद उन...