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पुस्‍तक समीक्षा: ‘हौसले का हुनर’ शून्य से शिखर तक... रूमा देवी की कहानी

गुरुवार,जुलाई 16, 2020
ruma devi
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1981 के आसपास लिखी गई इस किताब में एक संक्रमण का जिक्र है और इसे वुहान 400 का ही नाम दिया गया है। यानी आज से करीब 40 साल पहले उस वायरस के बारे में लिए किताब में जिक्र कर दिया गया था। एक अमेरिकी की यह कृति शुरु तो एक ऐसी मां से होती है जो अपने बच्चे ...
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पटकथा लेखन बहुत ही श्रम साध्य काम है। यह इतना कठिन काम है कि आपको रस से लबालब भरे एक प्याले को हाथों में थामे एक नट की तरह रस्सी पर चलना है और मजाल है रस की एक बूंद भी छलक जाए।
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दिल्ली टोकियो तो नहीं बन पाता है, लेकिन इससे हजारों परिवारों का जीवन अंधकारमय बन जाता है।
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भारतीयता और भारत से प्रेम इन कहानियों में स्पष्ट रुप से देखा जा सकता है।
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बापू और हरिलाल दोनों अपनी जगह अच्छे थे, सच्चे थे, सही थे लेकिन परिस्थितियों के दंश ने एक सुयोग्य पुत्र को कंटीली राह पर धकेल दिया। जीवनभर पिता के प्रति पलते आक्रोश ने हरिलाल को पतन की राह पर धकेल दिया। जब सारा विश्व बापू को सम्मान के साथ अंतिम विदाई ...
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'एक पल ये भी' कहानियों का संकलन है। इसमें कुल 7 कहानियां हैं। लेखक ने बेहद ही मासूमियत से यह कहानियां लिखी हैं।
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चाचा चौधरी के जनक प्रसिद्ध कार्टूनिस्‍ट प्राण को देश में कौन नहीं जानता, लेकिन कोई प्राण के बेहद करीब रहने वाला उन पर कोई किताब लिखे तो जाहिर है दिलचस्‍पी बढ़ जाती है। कोई करीबी किताब लिखेगा तो उनके बारे में कई निजी बातें भी पता लगेंगी। ...
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“आपकी उंगलियों के निशान की तरह आपका दर्द भी आपके लिए अद्वितीय है। इसी बात को दूसरी तरह से कहें तो आप खुशी कहीं से भी खरीद सकते हैं, लेकिन आपकी उदासी खासतौर से सिर्फ आपके लिए बनी है, वो आपकी अपनी है”
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बेग़म अख़्तर ग़ज़ल को वो इज्‍जत नहीं दिला पाती तो ग़ज़ल के नए दौर में हमें न तो जगजीतसिंह मिलते और न ही मेहदी हसन मिल पाते। एक तवायफ की साहबजादी होने के बावजूद कोठों की चाहरदीवारी से बाहर निकालकर ग़ज़ल को संभ्रात परिवारों और महफिलों में लाने का श्रेय ...
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भारत में ऐसे कई उदाहरण हैं, जिनसे साबित होता है कि छोटे स्टार्टअप कालांतर में बड़े कारोबार में तब्दील हो सकते हैं। एक छोटी-सी शुरुआत से बड़ी उपलब्धि हासिल की जा सकती है।
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कवि हमेशा सीमाएं तोड़ता है, वे चाहें जिस भी प्रकार की हों- राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक अथवा आर्थिक। मनुष्य सामाजिक प्राणी है और समाज के बिना उसका काम नहीं चलता इसलिए वह सामाजिक नियमों में आसानी से बंध जाता है।
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जैसा कि नाम से ही कुछ-कुछ आभास होने लगता है, 'शकुनि: मास्टर ऑफ़ द गेम' का लेखन महाभारत के कुटिल पात्र शकुनि को केंद्र में रखकर किया गया है। शकुनि को महाभारत में एक खलनायक की छवि प्राप्त है और उसे महाभारत के युद्ध और कौरवों के सर्वनाश का कारण माना ...
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ऐसा अद्भुत उपन्यास बहुत कम पढ़ने को मिलता है। हिन्दी साहित्य में तो मैंने पहला ही पढ़ा है। समसामयिक, दुर्लभ, नाजुक, गंभीर और चिंतनशील विषय का कुशलता से निर्वाह किया गया है।
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उर्दू पत्रकारिता की अहमियत से किसी भी सूरत में इंकार नहीं किया जा सकता। पत्रकारिता का इतिहास बहुत पुराना है या यूं कहें कि जब से इंसानी नस्लों ने एक-दूसरे को समझना और जानना शुरू किया
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यह एक पत्रकार का पहला उपन्यास है। लेकिन यह कल्पना और यथार्थ के बीच ऐसे झूलता है, जैसे अच्छी कला झूलने की कोशिश करती है। भविष्य की गोदी में निडर होकर कूदने वाली इस कहानी की धुरी है सन् 1974 में
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गेइशा! जापान के इतिहास का और तात्कालीन जापानी समाज जीवन का एक अटूट अंग।इशा शब्द का शब्दशः अर्थ है 'कलाकार' पुरुषों को रिझाने वाली, उनका मनोरंजन करने वाली स्त्री।
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लेखक और मीडिया शिक्षक डॉ. सौरभ मालवीय की पुस्तक 'विकास के पथ पर भारत' मोदी सरकार की महत्वपूर्ण योजनाओं का दस्तावेज है।
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'यायावर हैं आवारा हैं बंजारे हैं', ये किताब हाथ में लेते ही मुझे बहुत भा गई। सुंदर कवर, हल्का वजन और गोल्डन स्याही से लिखा हुआ लेखक और किताब का नाम।
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वाणी बुक कंपनी, वाणी प्रकाशन के अंग्रेज़ी उपक्रम द्वारा डॉ. संजय कुमार की पुस्तक 'कटिहार टू कैनेडी : द रोड लेस ट्रैवेल्ड का लोकार्पण 5 अप्रैल को इण्डिया इंटरनेशनल सेण्टर में किया गया। पुस्तक लोकर्पण के उपरांत एक परिचर्चा का आयोजन किया गया जिसका विषय ...
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