30 से 12 फीसदी पर सिमटी BSP! जानिए UP में कहां शिफ्ट हुआ दलित वोट और 2027 में कौन मारेगा बाजी (UP Dalit Politics Explained)
BSP vote share in UP: उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित मतदाता हमेशा से सत्ता की चाबी रहे हैं। कभी बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का एकमुश्त और अभेद्य किला माना जाने वाला यह वोट बैंक अब तेजी से बिखर रहा है। आगामी 2027 के यूपी विधानसभा चुनावों में छह महीने से भी कम समय बचा है। इस बीच, सभी प्रमुख राजनीतिक दलों ने दलित मतदाताओं को अपने पाले में लाने के लिए मोर्चेबंदी शुरू कर दी है।
हल्द्वानी के रामलीला मैदान में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की रैली और उसके बाद कथित 'शुद्धिकरण पूजा' का मुद्दा हो या बीजेपी और सपा का सामाजिक समीकरण साधना—सबकी नज़रें बसपा से छिटक रहे दलित वोटों पर हैं। आइए, 2002 से 2022 तक के चुनावी आंकड़ों के ज़रिए समझते हैं कि यूपी में दलितों की पसंद कैसे बदल रही है और 2027 के लिए क्या समीकरण बन रहे हैं।
बहुजन समाज पार्टी (बसपा) लंबे समय तक दलितों की पहली और प्राकृतिक पसंद रही है, लेकिन बीते डेढ़ दशक में बसपा का जनाधार तेजी से घटा है:
गैर-जाटव दलित : जहां भाजपा ने बनाई सबसे बड़ी सेंध
दलित राजनीति को दो मुख्य हिस्सों में देखा जाता है—जाटव और गैर-जाटव। आंकड़ों से साफ है कि गैर-जाटव दलित समाज बसपा से सबसे तेज़ी से दूर हुआ है और बीजेपी का मजबूत आधार बना है:
जाटव समुदाय को बसपा का सबसे कैडर वोट माना जाता रहा है, लेकिन अब इसमें भी सेंधमारी स्पष्ट दिखने लगी है:
2027 में क्या होगा असली निर्णायक फैक्टर?
2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में दलित मतदाता अब किसी एक दल से बंधे हुए नहीं हैं। गैर-जाटव दलितों के बीच भाजपा ने मजबूत बढ़त बनाई है, जबकि जाटव मतदाता अभी भी काफी हद तक बसपा के साथ हैं, लेकिन वहां भी भाजपा और सपा की सेंधमारी जारी है। जो भी दल जाटव और गैर-जाटव दोनों वर्गों में सर्वमान्य अपील बना पाएगा, वही 2027 में लखनऊ की गद्दी का सबसे प्रबल दावेदार होगा।
- उत्तर प्रदेश में दलित मतदाता किस पार्टी के साथ हैं?
- क्या BSP का दलित वोट बैंक BJP की तरफ शिफ्ट हो रहा है?
- जाटव और गैर-जाटव दलितों में वोटिंग पैटर्न का अंतर क्या है?
- 2027 यूपी चुनाव में दलित वोट बैंक का क्या समीकरण रहेगा?
- कांग्रेस और सपा के लिए यूपी में दलित राजनीति के क्या मायने हैं?
बहुजन समाज पार्टी (बसपा) लंबे समय तक दलितों की पहली और प्राकृतिक पसंद रही है, लेकिन बीते डेढ़ दशक में बसपा का जनाधार तेजी से घटा है:
- 2007 की पूर्ण बहुमत सरकार : 2007 के विधानसभा चुनाव में जब मायावती सत्ता में आई थीं, तब बसपा का कुल वोट शेयर 30.4% था।
- 2022 का निचला स्तर : 2022 के चुनाव तक बसपा का कुल वोट शेयर घटकर मात्र 12.8% रह गया।
गैर-जाटव दलित : जहां भाजपा ने बनाई सबसे बड़ी सेंध
दलित राजनीति को दो मुख्य हिस्सों में देखा जाता है—जाटव और गैर-जाटव। आंकड़ों से साफ है कि गैर-जाटव दलित समाज बसपा से सबसे तेज़ी से दूर हुआ है और बीजेपी का मजबूत आधार बना है:
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गैर-जाटव वोट में बदलाव (2002 से 2022):
- BSP: 2007 में 54% गैर-जाटव दलितों ने बसपा को वोट दिया था, जो 2022 में घटकर 27% रह गया।
- BJP-NDA: 2002 में गैर-जाटव दलितों में भाजपा का समर्थन केवल 12% था, जो 2022 में उछलकर 40% हो गया (28 प्रतिशत अंक की भारी बढ़त)।
जाटव समुदाय को बसपा का सबसे कैडर वोट माना जाता रहा है, लेकिन अब इसमें भी सेंधमारी स्पष्ट दिखने लगी है:
- BSP का घटता ग्राफ : 2007 में 86% जाटवों ने बसपा को वोट दिया था, जो 2022 तक घटकर 65% पर आ गया।
- BJP की बढ़त : 2002 में जाटव समाज के बीच भाजपा-राजग का समर्थन केवल 3% था, जो 2022 में बढ़कर 20% तक पहुंच गया (17 प्रतिशत अंक की बढ़ोतरी)।
- समाजवादी पार्टी (SP) : सपा ने 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) का नारा देकर दलितों में अपनी पैठ बढ़ाई है। 2007 में सपा और उसके सहयोगियों का वोट शेयर 25.4% था, जो 2022 में बढ़कर 36.3% हो गया।
- कांग्रेस की चुनौती : कांग्रेस लगातार दलित प्रतीकों और मुद्दों को उठाकर खुद को विकल्प के रूप में पेश करने की कोशिश कर रही है। हालांकि, आंकड़े बताते हैं कि 2012 में गैर-जाटव दलितों में कांग्रेस को 16% समर्थन मिला था, लेकिन 2022 तक यह घटकर केवल 4% रह गया। कांग्रेस अभी तक इस बड़े वोट शिफ्ट का सीधा फायदा नहीं उठा पाई है।
2027 में क्या होगा असली निर्णायक फैक्टर?2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में दलित मतदाता अब किसी एक दल से बंधे हुए नहीं हैं। गैर-जाटव दलितों के बीच भाजपा ने मजबूत बढ़त बनाई है, जबकि जाटव मतदाता अभी भी काफी हद तक बसपा के साथ हैं, लेकिन वहां भी भाजपा और सपा की सेंधमारी जारी है। जो भी दल जाटव और गैर-जाटव दोनों वर्गों में सर्वमान्य अपील बना पाएगा, वही 2027 में लखनऊ की गद्दी का सबसे प्रबल दावेदार होगा।

