यूपीआई लेनदेन पर एमडीआर शुल्क से फोन-पे और गूगल-पे को फायदा कैसे?
UPI MDR Charge: यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) का इस्तेमाल करने वालों के लिए बड़ा बदलाव होने जा रहा है। 15 अक्टूबर से यूपीआई पर मुफ्त लेनदेन की 6 साल पुरानी व्यवस्था समाप्त हो रही है और 2,000 रुपये से अधिक के मर्चेंट (P2M) लेनदेन पर 0.4% मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू होगा। इस फैसले से यूपीआई मार्केट पर कब्जा जमाए बैठी दिग्गज कंपनियों—फोन-पे और गूगल-पे—की बल्ले-बल्ले होने वाली है, जिन्हें हर साल करोड़ों डॉलर का अतिरिक्त राजस्व मिलेगा। हालांकि, राजनीतिक स्तर पर और व्यापारी वर्गों के बीच इस शुल्क का तीखा विरोध भी शुरू हो गया है।
भारत में डिजिटल भुगतान के सबसे बड़े माध्यम यूपीआई (UPI) पर मर्चेंट शुल्क (MDR) लागू होने के फैसले से फिनटेक सेक्टर में हलचल तेज हो गई है। 15 अक्टूबर से प्रभावी हो रहे इस नए नियम के तहत, 2000 रुपए से अधिक के व्यावसायिक या मर्चेंट (P2M) लेनदेन पर 0.4% का एमडीआर लागू किया जाएगा। ALSO READ: MP के पेट्रोल पंपों पर 2 हजार से ज्यादा के पेमेंट UPI से नहीं, नए नियमों के बाद पंप डीलर्स का फैसला
फोन-पे और गूगल-पे को सालाना 900 मिलियन डॉलर का फायदा
ब्रोकरेज फर्म 'बर्नस्टीन' की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस नए एमडीआर शुल्क से मार्च 2028 तक फिनटेक और पेमेंट्स ऐप्स के लिए 1.1 अरब डॉलर (लगभग 9,000 करोड़ रुपये) का वार्षिक राजस्व पैदा होने का अनुमान है। वर्तमान में यूपीआई के लगभग 80% बाजार पर फोन-पे (PhonePe) और गूगल-पे (Google Pay) का कब्जा है। इस हिसाब से इस कुल 1.1 अरब डॉलर के नए राजस्व में से करीब 900 मिलियन डॉलर (लगभग 7500 करोड़ रुपए) का बड़ा हिस्सा केवल इन दोनों दिग्गज कंपनियों की झोली में जाएगा।
फोन-पे के सह-संस्थापक राहुल चारी ने इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि यह कंपनियों के परिचालन लागत और देनदारियों की भरपाई करने तथा बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की दिशा में एक बेहद सकारात्मक कदम है। ALSO READ: UPI Payment पर नया चार्ज, किन लोगों को देना होगा MDR और किसके लिए रहेगा फ्री? सरकार ने दी पूरी जानकारी
छोटे प्रतिद्वंद्वियों की रणनीति
राजस्व के इस नए स्रोत से दिग्गज फिनटेक कंपनियों को ग्रामीण भारत में अपने नेटवर्क का विस्तार करने का प्रोत्साहन मिलेगा, जिसे पहले व्यावसायिक रूप से कम फायदेमंद माना जाता था। हालांकि ग्रामीण क्षेत्रों में लेनदेन का आकार छोटा हो सकता है, लेकिन वहां से मिलने वाले डेटा के आधार पर कंपनियों को वित्तीय उत्पाद, बीमा और लोन बेचने में मदद मिलेगी।
वहीं दूसरी ओर, मोबिक्विक (MobiKwik) जैसे छोटे प्रतिद्वंद्वी अब हाई-वैल्यू ट्रांजैक्शन जैसे कि टिकट बुकिंग, यूटिलिटी बिल पेमेंट और बड़े व्यावसायिक भुगतानों पर ध्यान केंद्रित करेंगे। मोबिक्विक के सह-संस्थापक बिपिन प्रीत सिंह का मानना है कि यह बदलाव उद्योग को केवल पर्सन-टू-पर्सन (P2P) ट्रांसफर से हटाकर मर्चेंट पेमेंट और ई-कॉमर्स बिजनेस की ओर ले जाएगा। हालांकि, ब्लूम वेंचर्स के जोसेफ सेबेस्टियन का कहना है कि इस बड़े नीतिगत सुधार का सबसे बड़ा वित्तीय लाभ पहले से स्थापित बड़ी कंपनियों को ही मिलेगा। ALSO READ: UPI Payment Rules : आम यूजर के लिए UPI रहेगा फ्री, किन ट्रांजेक्शन पर लगेगा चार्ज, जान लीजिए सरकार के नए नियम
मार्केट शेयर कैप और वैश्विक मॉडल से तुलना
बड़ी कंपनियों की बढ़ती वित्तीय ताकत से भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (NPCI) द्वारा किसी एक ऐप के लिए 30% मार्केट-शेयर कैप (सीमा) लगाने के लंबे समय से अटके फैसले पर दोबारा बहस शुरू हो सकती है। वैश्विक स्तर पर देखा जाए तो भारत का यह नया मॉडल अब चीन के 'अलीपे' (Alipay - जहां 0.6% से 1.5% तक शुल्क लगता है) और ब्राजील के 'पिक्स' (Pix) जैसे सफल डिजिटल पेमेंट मॉडल के करीब पहुंच रहा है।
इस फैसले का कौन-कौन विरोध कर रहा है?
इस नए शुल्क को लेकर देश के अलग-अलग वर्गों से आपत्तियां और विरोध के स्वर उठ रहे हैं। व्यापारियों का मानना है कि 2000 रुपए से अधिक के भुगतान पर 0.4% शुल्क लगने से उनके मार्जिन और मुनाफे पर असर पड़ेगा। हालांकि नियम व्यापारियों को ग्राहकों से सीधे यह शुल्क वसूलने की अनुमति नहीं देते, लेकिन व्यापारियों को डर है कि उन्हें यह अतिरिक्त लागत खुद झेलनी पड़ेगी।
नो क्यूआर कोड, ओनली कैश
इस बीच, इंदौर में व्यापारियों ने यूपीआई के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। 23 सितंबर को इंदौर के 125 से ज्यादा व्यापारी संगठन और 2 लाख से ज्यादा व्यापारियों ने नो क्यूआर कोड, आज ओनली कैश मुहिम चलाई। इस दौरान व्यापारियों ने विरोध स्वरूप क्यू आर कोड पर काला कपड़ा बांध दिया। शहर के राजबाड़ा, सियागंज, क्लॉथ मार्केट, सराफा, मारोठिया बाजार, लोहामंडी, प्लायवुड, किराना, पेट्रोल-डीजल एसोसिएशन आदि सभी इसके खिलाफ एकजुट नजर आए।
राजनीतिक स्तर पर इस फैसले की कड़ी आलोचना हुई है। नेताओं का तर्क है कि डिजिटल इंडिया को बढ़ावा देने के बाद अब शुल्क लगाना आम जनता और छोटे कारोबारियों के साथ वादाखिलाफी है। उपभोक्ता समूहों ने यह आशंका जताई है कि भले ही सीधे तौर पर शुल्क ग्राहकों पर नहीं लगाया जा सकता, लेकिन व्यापारी उत्पादों और सेवाओं की कीमतें बढ़ाकर इस लागत का अप्रत्यक्ष बोझ ग्राहकों की जेब पर ही डालेंगे।
क्या है आलोचकों का तर्क?
आलोचकों का तर्क है कि शुल्क से बचने के लिए व्यापारी ग्राहकों से नकद भुगतान की मांग कर सकते हैं, जिससे देश पुनः नकद लेनदेन की ओर लौट सकता है और डिजिटल इंडिया मुहिम को झटका लग सकता है। इन सभी विरोधों और आशंकाओं के बावजूद, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि यूपीआई का इस्तेमाल अब लोगों की आदतों में शुमार हो चुका है। इसलिए व्यापारी या उपभोक्ता इतनी आसानी से नकद लेनदेन की ओर वापस नहीं लौटेंगे, बल्कि यह शुल्क डिजिटल पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर को लंबे समय तक आत्मनिर्भर और सुरक्षित बनाए रखने में मदद करेगा।

