सृजन : ईश्वरीय पंरपरा
कभी नहीं उतार पाएंगे हम माटी का कर्ज
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छोटा-सा तुलसी बिरवा। नन्ही-सी हरी कच एक नाजुक पत्ती। जब रोपा तो एक साथ कई स्वर उठे 'नहीं पनपेगा', 'जड़ नहीं पकड़ेगा'। मन का प्रबल विश्वास 'चेतेगा, पनपेगा, जरूर पनपेगा।' आत्मा की हर भावुक लहर से उसे सिंचित किया। संपूर्ण एकाग्रता से पोषित किया। बिरवे की आत्मा तक पहुंचने की कोमल कोशिश की। कब मिट्टी पलटना है, तपन भी जरूरी है। गोबर के उपले की खाद हाथों से बनाई.... और जिस दिन नर्म मुलायम पत्ती ने शरमाकर हल्का-सा सिर ऊंचा किया- आत्मा के सुप्त तारों में एक साथ कई रागिनियां बज उठीं रोम-रोम छनन...छुम थिरक उठा। यह है सृजन सुख।
एक ऐसा विलक्षण गुलाबी सुख जिसे कभी शब्दश: अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता। एक बेहद खूबसूरत-सा भाव जिसे सिर्फ अंतर की गहराइयों में अनुभूत किया जा सकता है। आज तुलसी हुलसकर मुस्कुरा रही है और एक नहीं बल्कि चार-चार गमलों में।
इससे पहले मैंने कभी ऐसा सुकोमल सुख अनुभूत नहीं किया था। बचपन से मां को प्रकृति से प्यार करते पाया। हम भाई-बहन के अतिरिक्त मां के चरणों के चार 'बच्चे' और हैं- मनी प्लांट, तुलसी, बिल्व पत्र और हारसिंगार।
इन चारों 'बच्चों' से जुड़ी यूं तो मां के पास कई कहानियां हैं, लेकिन जो मैंने प्रत्यक्ष अनुभूत किया। वह निश्चित रूप से उल्लेखनीय है। मां ने अपने लड्डूगोपाल के लिए हारसिंगार लगाया। दिन में उससे बड़ा सुंदर संप्रेषित करती। सुखद आश्चर्य कि केसरिया-बादामी संयोजन के साथ पहली बार हारसिंगार मुस्कुराया जन्माष्टमी के दिन। वह जन्माष्टमी आज भी मां की स्मृति मंजूषा में वैसी ही रखी है।
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एक बार परिवार की अनुपस्थिति में किसी ने मनी प्लांट चुराने के इरादे से काट दी। मां लौटीं और सदमे में पंद्रह दिन बीमार रहीं। अनुभूति के स्तर पर वह उच्चावस्था में प्राप्त नहीं कर सकी थी कि किसी लता के कट जाने से व्यथित हो पाती। किंतु आज मेरी तुलसी का एक पत्ता भी कुम्हलाता है तो मन जाने कैसा-कैसा हो जाता है।
तुलसी पनपने के उपरांत मेरे समक्ष सृजन के कितने आयाम खुले। मां से बढ़कर सृजनकर्ता इस पृथ्वी पर कोई नहीं। इसलिए कहा जाता है कि मां नहीं बने तो मां को नहीं समझ सकते। सृजन किया नहीं तो सृजन की महत्ता से कैसे अवगत हो सकते हैं?
माता-पिता के लिए उनका सृजन अनमोल होता है। पल-पल उनका मन, मस्तिष्क और आंखें उस पर लगी होती हैं। मन उसे स्नेहापोषित करता है। उसकी सुरक्षा और सफलता की कामना में लगा रहता है। मस्तिष्क उसके व्यक्तित्व, परिवेश, संगत और प्रवृत्तियों का मूल्यांकन करता है।
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