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Last Modified: शनिवार, 18 अप्रैल 2026 (14:21 IST)

ऋचा चड्ढा ने फिल्मों की कास्टिंग पर उठाए सवाल, बोलीं- ऑथेंटिक टैलेंट को मिले मौका

Richa Chadha statement
निर्माता और अभिनेत्री ऋचा चड्ढा ने इंडस्ट्री में सवाल उठाया है कि फिल्ममेकर्स आखिर क्यों 'कमर्शियल' कलाकारों को कास्ट करते हैं, जबकि न तो वे ऐसी फिल्मों के लिए बॉक्स ऑफिस खींच पाते हैं और न ही फेस्टिवल्स में कोई खास भरोसेमंद पहचान जोड़ते हैं।
 
भारतीय सिनेमा की मौजूदा स्थिति पर खुलकर बात करते हुए ऋचा ने कास्टिंग के इस लंबे समय से चले आ रहे विरोधाभास को सामने रखा। उन्होंने कहा, यदि कोई कलाकार आपकी फिल्म को थिएटर में ओपनिंग नहीं दिला रहा है और फेस्टिवल्स में भी कोई खास वज़न नहीं जोड़ रहा, तो फिर उसे फिल्म में लेने का फायदा क्या है। 
 
ऋचा ने कहा, मैं किसी के खिलाफ नहीं बोल रही, लेकिन ट्रेनिंग लिए हुए कलाकार के साथ कम से कम परफॉर्मेंस की क्वालिटी का भरोसा होता है। इंडी फिल्मों में भी एक तरह का बिज़नेस होता है, और हर कहानी को बड़े चेहरे की ज़रूरत नहीं होती। ऐसे कलाकारों को लेना ज्यादा समझदारी है जो भरोसेमंद हों और बजट पर भी भारी न पड़ें। 
उन्होंने कहा, बात किसी की काबिलियत कम करने की नहीं है, बल्कि ये समझने की है कि यदि 2026 में इंडी फिल्मों को टिकना है, तो हमें सीखना होगा कि दर्शक अच्छी कहानियां और सच्चे कलाकार देखना चाहते हैं, बिना बजट पर ज़्यादा बोझ डाले।
 
ऋचा ने यह भी कहा कि इंडिपेंडेंट सिनेमा की पहचान हमेशा से रिस्क लेने, सच्चाई और मज़बूत कहानी कहने में रही है। लेकिन जब कास्टिंग सिर्फ “मार्केट वैल्यू” को देखकर की जाती है, तो ये मूल बातें कमजोर पड़ जाती हैं। इंडी फिल्में नए टैलेंट एक्टर्स, राइटर्स और टेक्नीशियंस - को सामने लाने के लिए होती हैं, जो अपने काम में ताज़गी और सच्चाई लाते हैं। जब फिल्ममेकर्स ‘कमर्शियल वैल्यू’ के नाम पर कास्टिंग में समझौता करते हैं, तो फिल्म अपनी आत्मा खो देती है। 
 
उन्होंने कहा, 1980 के दशक में इंडी सिनेमा बहुत मजबूत था और फारूक शेख, अमोल पालेकर, शबाना आज़मी जैसे कलाकार अपने आप में बड़े नाम थे। आज वो स्पेस लगभग खत्म हो गया है। यदि पूरी इंडस्ट्री कुछ गिने-चुने बड़े मेल एक्टर्स के सहारे बैठी रहेगी, तो फिल्मों की संख्या भी कम हो जाएगी।
 
मुख्यधारा और इंडी सिनेमा दोनों में सफलतापूर्वक काम कर चुकी ऋचा ने जोर देकर कहा कि आज के समय में असली पहचान लेबल से नहीं, बल्कि परफॉर्मेंस से बनती है। उन्होंने फिल्ममेकर्स से अपील की कि वे ऐसे टैलेंट को मौका दें जो सच में कहानी को बेहतर बना सके चाहे वह नया हो या अनुभवी, लेकिन फिल्म के विज़न के साथ ईमानदारी से जुड़ा हो।
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