नहीं है तो खरीद ली बहू
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पिछले कई सालों में हरियाणा में बच्चियों की गिरती संख्या ने अब वहां बहुओं की कमी कर दी है। लिंग जांच कर भ्रूण हत्या और कम उम्र में ठीक से पालन-पोषण नहीं किए जाने की वजह से पूरे राज्य में बच्चियों की संख्या कम होती गई है।
पिछले सालों में बेटों को प्राथमिकता देने की वजह से युवा लड़के-लड़कियों का अनुपात बिगड़ता गया है। नतीजा ये कि 15 वर्ष से 44 वर्ष तक की आयु के पुरुषों में एक बड़ी संख्या अविवाहित है। एक गैर-सरकारी संस्था के मुताबिक पिछले 10 सालों में ये आंकड़ा 40 से 50 फीसदी तक बढ़ गया है। ऐसे ही एक पुरुष, धनपत सिंह यादव से हम मिले हरियाणा के भिवानी जिले के नंदगांव में।
दूसरे राज्यों से बहुओं की खरीद : 45 साल के धनपत की अपने जिले में शादी नहीं हो पा रही थी। इसलिए डेढ़ साल पहले वो असम गए और 22 साल की सुशीला से शादी कर यहां ले आए। सुशीला हरियाणा की और बहुओं से अलग दिखती है, उसके कपड़े मानो खुद को ढंकने की बजाय, तन को दिखाने की मंशा से ओढ़े गए हों।
सुशीला का एक बेटा है। वो कुछ कहती नहीं, लेकिन मुझे देखकर बहुत हंसती है। पर शायद वो अपनी जिंदगी पर हंस रही है, जिस पर अब उसका कोई वश नहीं रहा। मां नहीं है, पिता ने दोगुनी उम्र के पुरुष से शादी कर दी, अब अनजान देश के मुताबिक खुद को बदल रही है।
धनपत बताते हैं, 'वो अपने गांव में सिर्फ चावल और मछली खाती थी और लुंगी पहनती थी, लेकिन यहां आकर वो घाघरा-चोली, साड़ी पहनने लगी है, वो रोटी बनाती भी है और खाती भी है।'
धनपत ये नहीं मानते की वो सुशीला को खरीदकर लाए हैं बल्कि बताते हैं कि, सुशीला एक गरीब परिवार में रहती थी और यहां उसे बहुत आराम है।
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जगमति सांगवान ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक वुमेन्स एसोसिएशन की हरियाणा राज्य की अध्यक्ष हैं। वो बताती हैं कि पिछले सालों में पूर्वी और उत्तर-पूर्वी राज्यों, मध्य प्रदेश और केरल से लड़कियों को खरीद कर या उनकी मर्जी से लाने का चलन बढ़ा है।
जगमति बताती हैं, 'ज्यादातर ये लड़कियां खरीदी जाती हैं जिस वजह से समाज में उनकी इज्जत कम होती है और उन्हें यौन शोषण के लिए उपलब्ध माना जाता है।'
कैद से निकले की चाह : नंदगांव में रहने वाले नरेश बताते हैं कि उनके गांव में 650 परिवार रहते हैं जिनमें कम से कम 50 परिवारों में बहू दूसरे राज्य से लाई गई है।
वो मुझे सोना खातून से मिलाते हैं। हर तरीके से सोना सुशीला जैसी है। वो 21 साल की है, उसके पति करीब 40 साल के। वो खूब हंसती है और वैसे ही खुले तरीके से घाघरा-चोली पहनती हैं।
फर्क सिर्फ इतना कि उसने हिंदी सीख ली है और हमारी छोटी सी मुलाकात में उसने मुझे बताया, 'मैं घर से बाहर निकलना चाहती हूं, कुछ करना चाहती हूं।'
हरियाणा के पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं को खुलकर अपनी बात कहने की आजादी नहीं, फिर ये तो यहां के समाज का ऐसा हिस्सा हैं, जिनकी एक अलग वर्ग की तरह गिनती ही नहीं की गई।
अब कई समाजसेवियों ने राज्य सरकार को आवेदन लिख कहा है कि ऐसी लड़कियों की सामाजिक स्थिति का ब्योरा लें और उनके अधिकारों को सुरक्षित करने के लिए कदम उठाएं।

