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बोधगया दी लैंड ऑफ एन्लाइट्नमेंट
किताबों की भीड़ में सिर्फ वही किताबें टिकने की आश्वस्ति दे सकती हैं जो सच के करीब हों और सटीक भी। उदय सहाय की संपादित ... -
#वेबदुनियादिवस : मुबारक, वेबदुनिया के 18 वर्ष
बधाई। खुशी के इस मौके पर वेबदुनिया को मुबारकबाद। वेबदुनिया के साथ मेरा पहला जुड़ाव कुछ साल पहले हुआ। वैसे भी कौन ऐसा ... -
साइबर संसार : इस तरह बचें साइबर अपराधों से
पिछले कई सालों से साइबर अपराधों को देखते सुलझाते ये बात सामने आई कि हिंदी में साइबर अपराध पर कोई ऐसी किताब नहीं है जो ... -
सृजन की रक्षा के बिना सृजनकर्ता की पूजा अपूर्ण-स्वामी चिदानंद
संयुक्त राष्ट्र संघ की 70 वर्षगांठ के दौरान, पोप फ्रांसिस के संबोधन की पूर्व संध्या पर परमार्थ निकेतन ऋषिकेश के ... -
चांद नवाबों के बीच हम
करीब 15 साल पहले दिल्ली की गीता कालोनी के थाने में एक बंदर घुस आया। बंदर थाने के अंदर ऐसा आया कि उसने बाहर जाने से ... -
नाम था निर्भया
औरत होना मुश्किल है या चुप रहना जीना या किसी तरह बस, जी लेना शब्दों के टीलों के नीचे छिपा देना उस बस पर चिपकी चीखें, ... -
पेड न्यूज पत्रकारिता का कलंक है- राजेश बादल
पत्रकारिता के क्षेत्र में राजेश बादल किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। वे मानते हैं कि पेड न्यूज पत्रकारिता का कलंक है। ... -
वो दो शव
पेड़ पर दो लड़कियों के शव लटके हुए मिले उनके साथ बलात्कार हुआ था फिर उन्हें मार डाला गया –यह टीवी और अखबार की खबर है ... -
अच्छे दिन आ गए हैं
सत्ता बदल गई है आवाजें भी, चेहरे भी शब्दनाद भी, शंखनाद भी सत्ता के गलियारे में -
दिल्ली पुलिस : विदाई-आगमन और आधी आबादी
दिल्ली के लोधी रोड के स्पेशल सेल के दफ्तर में दिल्ली पुलिस अक्सर आतंकवादियों से पूछताछ करती है। एक समय पर चुस्ती और ... -
स्टूडेंट्स फिल्म फेस्टिवल का शुभारंभ
पुणे। फिल्म और टेलीविजन इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया और सत्यजीत रे फिल्म और टेलीविजन इंस्टिट्यूट के संयुक्त तत्वावधान में ... -
एफटीआईआई से जुड़ कर ‘महा’ सम्मानित हुआ : धर्मेंद्र जे. नारायण
धर्मेंद्र जे. नारायण (डीजे नारायण) प्रसिद्ध फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूणट ऑफ इंडिया के निदेशक हैं। 1990 की बैच के ... -
मैं सब समझती हूं फिजा...
धुले-धुले बालों को अपने हाथ से झटकती, चांद के साथ किसी चांदनी की तरह सिमटी और शाल ओढ़े मुस्कुराती उस बेहद सुंदर फिजा के ... -
हर औरत होती है कविता
इबादत के लिए उठे भीगे हाथ उसमें सूखे पत्ते अपमान धर्म कर्म और शर्म को भर लेने के बाद जो जगह बची थी उसमें भर दी औरत ने ... -
हां, मैं थी. मैं हूं..मैं रहूंगी..
जुबां बंद है पलकें भीगीं सच मुट्ठी में पढ़ा आसमान ने मैं अपने पंख खुद बनूंगी हां, मैं थी. मैं हूं..मैं रहूंगी.. -
एक थी निर्भया
एक थी भंवरी देवी, एक थी प्रिदर्शिनी मट्टू, एक थी नैना साहनी। इनका नाम हम जानते थे। लेकिन एक थी वो, एक थी यह। देश में एक ... -
हां, मैं थी. हूं.. रहूंगी...
देखिए मैं यह बात साफ तौर पर कह देना चाहती हूं कि मैं अगर मर जाऊं या मारी जाऊं तो उसकी जांच पुलिस से न कराई जाए। जांच ... -
शंकर दयाल सिंह अमृत महोत्सव
'हिन्दी हमारी राजभाषा ही नहीं, जनभाषा भी है। हमारे संस्कारों से जुड़कर यह परिष्कार की भाषा हो जाती है। हालांकि देश का ... -
बलात्कार- जघन्य, दुखद और बेहद शर्मनाक
मेरा सवाल सीधा है– क्या हमें महिला आयोग जैसे चिंता जताने वाले आयोगों की जरूरत है। क्या हम अपराध से जूझने के लिए तैयार ... -
किसका बलात्कार है यह...
नीला आसमान वाकई सो गया है। यह बात फिल्मी नहीं है। यह बात सच का वह सिलसिला है, जो हर रोज दिखाई दे रहा है। जिस देश की ...
