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अच्छे दिन आ गए हैं
सत्ता बदल गई हैआवाजें भी, चेहरे भीशब्दनाद भी, शंखनाद भीसत्ता के गलियारे मेंनए दमकते चेहरों की आमद हुई हैहर सत्ताकुछ प्रार्थनाओं के तीर्थ में हीसपनों को यथार्थ बना पाती हैंलेकिनदेहरी से बाहर फेंक दी जाती हैं जब प्रार्थनाएंतो उन्हें आहों का गोला बनने में भी समय कहां लगता हैसत्ताएं जब अच्छे दिनों की बातें करती हैंमन की कंपन भी उत्साह से बढ़ती है आगेघर के सामने के पेड़ से झर चुके पत्ते भीजी उठना चाहते हैं फिर सेडरा मन झूमने लगता है उम्मीदों के भरे-भरे बादलों सेपर औरतें अच्छे दिनों के वादे से सहरती भी हैंदिन जो भी हों, बस,भरोसा और इज्जत बनाए रखेंचूल्हे की रोटीमन की शांतिफरेब से मुक्तिआसमान का एक टुकड़ा मुट्ठी में भरचांद से बचपन की कहानी कह सकनेऔर मारे जाने की धमकी से बची रहे अगर मजबूर औरत की मजबूतीतो अच्छे दिन दूर कहांउम्मीदों से भरे दिन कितने अच्छे होते हैं दिन।
लेखक के बारे में
वर्तिका नंदा