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श्राद्ध पक्ष 2026: पितरों के लिए इन 3 समय में करें श्राद्ध

Shraddha Paksha 2026 time
हिंदू धर्म और वैदिक शास्त्रों में पितृ पक्ष यानी श्राद्ध पक्ष का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है। यह 16 दिनों की वह पवित्र अवधि होती है, जब हमारे पूर्वज (पितर) सूक्ष्म रूप में धरती पर आते हैं और अपने वंशजों द्वारा दिए गए तर्पण, पिंडदान व अन्न-जल को स्वीकार करते हैं। शास्त्रों में मान्यता है कि पितरों की संतुष्टि से घर में सुख, शांति, समृद्धि और वंश वृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
 
हालांकि, श्राद्ध कर्म केवल सही तिथि पर कर देना ही काफी नहीं होता, बल्कि इसे सही समय पर करना भी उतना ही अनिवार्य है। शास्त्र विधि के अनुसार प्रातः काल या रात्रि के समय श्राद्ध करना वर्जित माना गया है। शास्त्रों में दोपहर का समय ही पितरों के तर्पण और पिंड दान के लिए सर्वोपरि बताया गया है। यदि आप भी अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध कर रहे हैं, तो इन 3 विशेष शुभ मुहूर्तों का ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक है।

1. कुतुप मुहूर्त:

कुतुप मुहूर्त को श्राद्ध कर्म के लिए सबसे पहला और अत्यंत फलदायी समय माना जाता है। ज्योतिष शास्त्र और मत्स्य पुराण के अनुसार, सूर्योदय से सूर्यास्त तक के पूरे दिन को कुल 15 बराबर भागों या मुहूर्तों में विभाजित किया जाता है। इनमें से दिन का 8वाँ मुहूर्त कुतुप काल कहलाता है।
 
सामान्य भाषा में यह समय दोपहर लगभग 11:36 बजे से शुरू होकर 12:24 बजे के बीच रहता है। 'कुतुप' शब्द का अर्थ संताप या पापों को नष्ट करने वाला होता है। मान्यता है कि इस मुहूर्त में पितरों के निमित्त जो भी तर्पण, जलांजलि या पिंड दान किया जाता है, उससे परिजनों के पापों का शमन होता है। इस समय किया गया तर्पण पितरों तक सीधे पहुँचता है और उनकी क्षुधा शांत होती है।
 

2. रौहिण मुहूर्त:

रौहिण मुहूर्त कुतुप काल के ठीक बाद आता है और इसे श्राद्ध का दूसरा सबसे श्रेष्ठ समय माना जाता है। दिनमान (सूर्योदय से सूर्यास्त तक का समय) को 15 भागों में बाँटने पर दिन का 9वाँ मुहूर्त रोहिणी या रौहिण काल कहलाता है।
 
समय के हिसाब से यह दोपहर लगभग 12:24 बजे से शुरू होकर 01:12 बजे तक रहता है। 'रोहिणी' नक्षत्र और काल दोनों ही वृद्धि और आरोग्य का प्रतीक माने गए हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, रौहिण मुहूर्त में किए गए दान, तर्पण और ब्राह्मण भोजन से कुल में सुख-समृद्धि बढ़ती है और पितर प्रसन्न होकर अपने वंशजों को आरोग्यता तथा दीर्घायु का वरदान देते हैं।

3. अपराह्न काल:

अपराह्न काल श्राद्ध कर्म की संपूर्ण प्रक्रिया (जैसे ब्राह्मण भोजन, पिंड दान और पंचबली भोग) को संपन्न करने के लिए सबसे उपयुक्त और मुख्य समय माना गया है। यदि पूरे दिन को 12 घंटे का माना जाए (सुबह 6:00 बजे से शाम 6:00 बजे तक), तो अपराह्न काल दोपहर 01:12 बजे से अपराह्न 03:36 बजे तक का समय होता है।
 
मार्कंडेय पुराण और मनुस्मृति के अनुसार, दोपहर के इस तीसरे पहर में सूर्य का ताप धीरे-धीरे कम होने लगता है और यही समय पितरों की तृप्ति के लिए सबसे अनुकूल होता है। अपराह्न काल में किए गए कर्मकांड से पितृदोष शांत होता है और घर में चल रही पारिवारिक कलह या आर्थिक तंगी दूर होती है।
 

श्राद्ध कर्म करते समय ध्यान रखने योग्य मुख्य बातें

भोजन का समय: श्राद्ध का मुख्य भोजन और संकल्प हमेशा कुतुप काल से शुरू करके अपराह्न काल समाप्त होने से पहले संपन्न कर लेना चाहिए।
 
वर्जित समय: कभी भी सूर्योदय के तुरंत बाद, प्रात:काल, संध्या समय (सूर्यास्त के समय) या रात्रि में श्राद्ध नहीं करना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार, इस समय किया गया श्राद्ध पितर स्वीकार नहीं करते।
 
तिल और कुशा का प्रयोग: तर्पण और पिंड दान करते समय काले तिल और कुशा घास का उपयोग अवश्य करें, क्योंकि इनके बिना पितर जल ग्रहण नहीं करते।
 
श्राद्ध पक्ष में इन तीन मुहूर्तों का पालन करके पूरी श्रद्धा और विधि-विधान से किया गया तर्पण पितरों को संतुष्ट करता है और परिवार पर पितृ कृपा बनी रहती है।
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