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श्रावण में जागेश्वर धाम का करें दर्शन: देवदार के जंगलों के बीच बसे 224 प्राचीन शिव मंदिर, क्या बोले सीएम धामी?

jageshwar dham
उत्तराखंड के अल्मोड़ा स्थित जागेश्वर धाम में एक ही परिसर में 224 प्राचीन शिव मंदिर हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने श्रद्धालुओं से श्रावण मास में जागेश्वर महादेव के दर्शन करने की अपील की। जानिए इस पौराणिक तीर्थ की महिमा और इतिहास। ALSO READ: उत्तराखंड आध्यात्मिक राजधानी बनने की ओर अग्रसर, जागेश्वर से कैंची धाम तक श्रद्धालुओं की रिकॉर्ड बढ़ोतरी
 
सीएम धामी ने सोशल मीडिया साइट एक्स पर अपनी पोस्ट में कहा कि जनपद अल्मोड़ा में देवदार के घने वनों के मध्य स्थित श्री जागेश्वर महादेव मंदिर देवाधिदेव महादेव को समर्पित अत्यंत रमणीय तीर्थ स्थल है, जो लाखों श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का प्रमुख केंद्र है।
 
मुख्यमंत्री ने कहा कि अपनी दिव्यता, आध्यात्मिक ऊर्जा और प्राचीन स्थापत्य कला के लिए विख्यात इस मंदिर का उल्लेख स्कंद पुराण सहित अनेक धार्मिक ग्रंथों में मिलता है। यह यहां की ऐतिहासिक एवं धार्मिक महत्ता को दर्शाता है। पवित्र श्रावण मास में देवभूमि उत्तराखंड आगमन पर श्री जागेश्वर महादेव के दर्शन का पुण्य लाभ अवश्य प्राप्त करें। ALSO READ: CM धामी ने की बालेश्वर मंदिर आने की अपील, जानिए क्यों खास है चंपावत का यह शिवधाम?

जागेश्वर धाम में एक ही स्थान पर 224 मंदिर

अल्मोड़ा से 35 किलोमीटर दूर स्थित केंद्र जागेश्वर धाम के प्राचीन मंदिर प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर इस क्षेत्र को सदियों से आध्यात्मिक जीवंतताप्रदान कर रहे हैं। यहां लगभग 250 मंदिर हैं जिनमें से एक ही स्थान पर छोटे-बड़े 224 मंदिर स्थित हैं। मंदिरों का निर्माण लकड़ी तथा सीमेंट की जगह पत्थर की बड़ी-बड़ी शिलाओं से किया गया है। ALSO READ: CM धामी ने बताया नैनीताल के मुक्तेश्वर महादेव मंदिर का महत्व, जहां शिव भक्ति के साथ दिखता है हिमालय का अद्भुत नजारा
 

8वीं शताब्दी का मृत्युंजय मंदिर

यहां का सबसे प्राचीन मंदिर 8वीं शताब्दी का मृत्युंजय मंदिर है। इसके बाद जागेश्वर, नवदुर्गा, कालिका, प्युष्टिदेवी, बालेश्वर और कुछ छोटे मंदिर बने। इन सभी का निर्माण आरंभिक कत्यूरी राजाओं ने करवाया था। कत्यूरी राजाओं ने 11वीं और 14वीं शताब्दी के बीच सूर्य, नवग्रह और नीलकंठेश्वर के मंदिरों का निर्माण किया। पांच छोटे मंदिरों का श्रेय गरुड़ ज्ञान चंद के शासनकाल को जाता है, जिन्होंने 1374 से 1419 तक गद्दी संभाली थी।
 
पुराणों के अनुसार शिवजी तथा सप्तऋषियों ने यहां तपस्या की थी। कहा जाता है कि प्राचीन समय में जागेश्वर मंदिर में मांगी गई मन्नतें उसी रूप में स्वीकार हो जाती थीं जिसका भारी दुरुपयोग हो रहा था। आठवीं सदी में आदि शंकराचार्य जागेश्वर आए और उन्होंने महामृत्युंजय में स्थापित शिवलिंग को कीलित करके इस दुरुपयोग को रोकने की व्यवस्था की। शंकराचार्य जी द्वारा कीलित किए जाने के बाद से अब यहां दूसरों के लिए बुरी कामना करने वालों की मनोकामनाएंपूरी नहीं होती। केवल यज्ञ एवं अनुष्ठान से मंगलकारी मनोकामनाएं ही पूरी हो सकती हैं।
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