कल्कि व हृषिकेश द्वादशी 2026: पापों से मुक्ति और सुख-समृद्धि के लिए क्यों खास है यह पावन पर्व?
भाद्रपद शुक्ल द्वादशी का दिन सनातन धर्म में अत्यंत अलौकिक माना गया है। यह दिन भगवान विष्णु के आगामी 'कल्कि अवतार' और उनके 'हृषिकेश' स्वरूप की साधना को समर्पित है। मान्यता है कि इस दिन व्रत-पूजन करने से व्यक्ति के सभी पाप धुल जाते हैं और उसे विष्णुलोक की प्राप्ति होती है।
तिथि व शुभ समय (वर्ष 2026):
द्वादशी प्रारंभ: 22 सितंबर 2026, रात 09:43 बजे से
द्वादशी समाप्त: 23 सितंबर 2026, रात 10:50 बजे तक
इस तिथि का त्रि-आयामी महत्व:
कल्कि द्वादशी: कलियुग के अंत में होने वाले श्रीहरि के 10वें 'कल्कि अवतार' के स्मरण में यह पर्व मनाया जाता है।
हृषिकेश द्वादशी: नारद व भविष्य पुराण के अनुसार, इस दिन इंद्रियों के स्वामी 'भगवान हृषिकेश' (विष्णु जी) का विशेष पूजन होता है।
श्रवण द्वादशी का महासंयोग: यदि इस तिथि को श्रवण नक्षत्र (विशेषकर बुधवार) का योग बन जाए, तो इसका पुण्य अनंत गुना बढ़ जाता है। इस एक व्रत से सभी द्वादशियों का फल मिल जाता है।
संक्षिप्त एवं सटीक पूजा विधि:
अभिषेक व पूजन: उपवास रखकर तांबे या मिट्टी के कलश में दूध भरकर भगवान हृषिकेश का अभिषेक करें।
हवन: "हृषीकेश नमस्तुभ्यम्" मंत्र का जाप करते हुए शहद मिले चरु (चावल/अन्न) से 108 आहुतियाँ दें।
दान व दक्षिणा: पूजा के बाद किसी सुयोग्य विद्वान या ब्राह्मण को 6 सेर (लगभग 5.5 किग्रा) गेहूं और सामर्थ्यानुसार स्वर्ण/द्रव्य की दक्षिणा दें।
दान का प्रार्थना मंत्र:
हृषीकेश नमस्तुभ्यं सर्वलौकेकहेतवे।
मह्यं सर्वसुखं देही गोधूमस्य प्रदानतः॥
अर्थ: "हे सम्पूर्ण लोकों के स्वामी भगवान हृषिकेश! आपको प्रणाम है। इस गेहूं के दान से प्रसन्न होकर मुझे जीवन के समस्त सुख प्रदान करें।"
इसके बाद ब्राह्मणों को भोजन कराकर स्वयं मौन रहकर प्रसाद ग्रहण करें। इस सरल अनुष्ठान से मनुष्य जन्म-मरण और पापों के चक्र से मुक्त होकर महायज्ञ का फल प्राप्त करता है।

