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भाद्रपद पूर्णिमा 2026: जानिए इसका महत्व, धार्मिक मान्यता और पौराणिक कथा

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भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि सनातन परंपरा में अपना एक विशिष्ट स्थान रखती है। वर्ष 2026 में यह पावन पर्व 26 सितंबर, शनिवार को मनाया जा रहा है। इस तिथि का महत्व इसलिए भी दो गुना हो जाता है क्योंकि इसी दिन पूर्णिमा तिथि का श्राद्ध संपन्न किया जाता है और इसके साथ ही हमारे पितरों को समर्पित रहने वाला 16 दिनों का 'पितृ पक्ष' भी शुरू हो जाता है। धार्मिक दृष्टिकोण से यह दिन भगवान श्रीहरि विष्णु के कल्याणकारी स्वरूप 'सत्यनारायण' और देवाधिदेव महादेव व माता पार्वती के 'उमा-महेश्वर' स्वरूप की आराधना के लिए समर्पित है।
 

भाद्रपद पूर्णिमा की महिमा एवं फल

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस पावन अवसर पर भगवान सत्यनारायण का पूजन करने और उमा-महेश्वर व्रत रखने का विशेष विधान है।
सौभाग्य और समृद्धि: यह व्रत विशेष रूप से महिलाओं द्वारा परिवार में सुख, शांति और अखंड सौभाग्य की कामना से रखा जाता है।
संतान सुख और बुद्धि: शास्त्रों के अनुसार, इस दिन श्रद्धापूर्वक व्रत रखने से संतानों को सद्बुद्धि और आरोग्य की प्राप्ति होती है।
कष्टों का निवारण: जीवन के समस्त विघ्न-बाधाओं का शमन होकर घर-परिवार में सुख-समृद्धि का वास होता है।
 

पौराणिक कथा: जब क्षमा और भक्ति ने दूर किया श्राप

मत्स्य पुराण में भाद्रपद पूर्णिमा से जुड़ी उमा-महेश्वर व्रत की एक अत्यंत प्रेरणादायी और अलौकिक कथा मिलती है:-
एक बार परम तपस्वी महर्षि दुर्वासा कैलाश पर्वत पर भगवान शिव के दर्शन कर लौट रहे थे। मार्ग में उनका सामना जगत के पालनहार भगवान श्रीविष्णु से हुआ। महर्षि दुर्वासा ने अत्यंत आदर के साथ भगवान शिव द्वारा दी गई बिल्वपत्र की दिव्य माला श्रीविष्णु को भेंट कर दी। किंतु श्रीहरि ने सहज भाव से उस माला को स्वयं धारण करने के स्थान पर अपने वाहन गरुड़ के गले में पहना दिया।
 
अपने पूज्य देव की प्रसादी माला का यह अनादर देखकर महर्षि दुर्वासा अत्यंत क्रोधित हो गए। अपने उग्र स्वभाव के अनुरूप उन्होंने श्रीहरि को श्राप दे दिया- "आपकी अर्धांगिनी माता लक्ष्मी आपसे दूर हो जाएंगी, आपका परम धाम क्षीरसागर आपसे छिन जाएगा और संकट के समय आपके सेवक शेषनाग भी आपकी सहायता नहीं कर सकेंगे।"
 
महर्षि दुर्वासा का श्राप सुनते ही पूरी सृष्टि में खलबली मच गई। भगवान विष्णु ने अत्यंत विनम्रतापूर्वक महर्षि को प्रणाम किया और इस कठोर श्राप से मुक्ति व निवारण का उपाय पूछा।
 
तब महर्षि दुर्वासा का हृदय द्रवित हुआ और उन्होंने श्रीहरि को भाद्रपद पूर्णिमा के दिन संपूर्ण विधि-विधान से 'उमा-महेश्वर व्रत' करने का परामर्श दिया। उन्होंने बताया कि इस पावन व्रत के प्रभाव से ही खोया हुआ वैभव पुनः प्राप्त हो सकेगा।
 
तत्पश्चात, भगवान विष्णु ने इस व्रत का अनुष्ठान किया। इस व्रत के दिव्य प्रभाव से माता लक्ष्मी पुनः श्रीहरि के पास लौट आईं और उनका खोया हुआ क्षीरसागर तथा समस्त दिव्य शक्तियां व सिद्धियां उन्हें वापस प्राप्त हो गईं।

यशोदा और श्रीकृष्ण संवाद: द्वापर युग में माता यशोदा ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा कि हे नाथ! संसार के सभी जीवों की रक्षा करने वाले, ऐसा कोई श्रेष्ठ व्रत बताइए जिससे स्त्रियों का सौभाग्य और सदा सुहाग बना रहे तथा कभी भी विधवा होने का भय न हो।
 
व्रत का विधान: तब श्रीकृष्ण ने माता यशोदा को बत्तीस (32) पूर्णिमा के व्रत का विधान बताया। श्रीकृष्ण ने कहा कि जो स्त्री या पुरुष विधि-विधान से 32 पूर्णिमा का व्रत करते हैं, उन्हें अखंड सौभाग्य, दीर्घायु और समस्त मनोकामनाओं की प्राप्ति होती है।
 
उमा-महेश्वर कथा प्रसंग: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, एक बार दुर्वासा ऋषि के शाप के कारण विष्णु जी की शक्तियां क्षीण हो गई थीं। तब महर्षि दुर्वासा के मार्गदर्शन पर ही भगवान विष्णु ने भाद्रपद पूर्णिमा पर भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित उमा-महेश्वर व्रत किया था। इस व्रत के प्रभाव से विष्णु जी को उनके समस्त कष्टों से मुक्ति मिली और अपनी खोई हुई शक्तियां पुनः प्राप्त हुईं।
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