रचना नहीं होती प्रवासी - नामवर सिंह
- पंकज नारायण
आई.सी.सी.आर. और अक्षरम् के संयुक्त तत्वावधान में 'रचना समय' कार्यक्रम के अंतर्गत प्रवासी कथाकार उषा वर्मा के कहानी संग्रह 'कारावास' का लोकार्पण 9 अप्रैल 2009 को आई.सी.सी.आर. नई दिल्ली के सभागार में हुआ।
इस अवसर पर वरिष्ठ आलोचक डॉ. नामवर सिंह ने कहा कि रचनाएँ प्रवासी नहीं होती। निर्मल वर्मा, उषा प्रियंवदा जैसे रचनाकारों ने अपनी कई श्रेष्ठ रचनाएँ अपने प्रवास के दौरान ही लिखी। वे हिंदी साहित्यकार कहे जाते हैं, न कि प्रवासी साहित्यकार। अच्छी कहानी की पहचान यह है कि उसका संक्षेपण नहीं किया जा सकता। उन्होंने बताया कि डॉ. उषा वर्मा की कहानियाँ पाठकों को बाँधती हैं।
प्रतिष्ठित कथाकार चित्रा मुद्गल ने लेखिका को निरंतरता की ओर प्रेरित करते हुए इन कहानियों में चित्रित विदेशी संस्कार और स्वदेशी मर्यादा के संतुलन की विशिष्टता को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि शोषण और दमन दुनिया के हर कोने में है, जिसके खिलाफ ये कहानियाँ पाठक को जागरूक करती हैं।
अक्षरम् के अध्यक्ष अनिल जोशी ने प्रवासी रचनाकारों के रचनाधर्मिता के प्रति आस्था जताई। कार्यक्रम की शुरूआत अलका सिन्हा द्वारा संग्रह की कहानी 'रॉनी' के पाठ से हुई। इस कहानी ने एक अश्वेत छात्रा के साथ उसके टीचर द्वारा यौन शोषण से उपजी पीड़ा को श्रोताओं के सामने रखा। चर्चित कथाकार ममता कालिया ने प्रवासियों द्वारा लिखे जा रहे साहित्य की सराहना करते हुए उषा वर्मा की कुछ कहानियों का विशेष उल्लेख किया और इन्हें मजबूत कथ्य वाली कहानियाँ बताया।
अपने आलेख पाठ में डॉ. हरजेन्द्र चौधरी ने कहानियों के संदर्भों के साथ इस बात की पुष्टि की कि अब प्रवासी रचनाकारों के साथ किसी रियायत की आवश्यकता नहीं है, बल्कि वे किसी भी रचनाकार के समकक्ष रखी जाने वाली कहानियाँ हैं। दूसरी ओर डॉ. अजय नावरिया ने इन कहानियों को प्रवासी स्त्री विमर्श की कहानियाँ बताते हुए आधुनिक कथा-लेखन से जुड़े कई सवाल रखे।
उन्होंने कहा कि इन कहानियों में आत्म-विश्लेषण से जुड़े सवाल आते-जाते रहते हैं। अतिथियों का स्वागत गगनांचल के संपादक अजय गुप्ता ने किया। कार्यक्रम में डॉ. कैलाश वाजपेयी, कमला सिंघवी, वीरेन्द्र प्रभाकर, डॉ. सीतेश आलोक, डॉ. प्रेम जनमेजय, आलोक श्रीवास्तव तथा डॉ. पदमेश गुप्त सहित कई जाने-माने साहित्यकार व शब्दकर्मी उपस्थित थे।
साभार -अक्षरम्
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आई.सी.सी.आर. और अक्षरम् के संयुक्त तत्वावधान में 'रचना समय' कार्यक्रम के अंतर्गत प्रवासी कथाकार उषा वर्मा के कहानी संग्रह 'कारावास' का लोकार्पण 9 अप्रैल 2009 को आई.सी.सी.आर. नई दिल्ली के सभागार में हुआ।
इस अवसर पर वरिष्ठ आलोचक डॉ. नामवर सिंह ने कहा कि रचनाएँ प्रवासी नहीं होती। निर्मल वर्मा, उषा प्रियंवदा जैसे रचनाकारों ने अपनी कई श्रेष्ठ रचनाएँ अपने प्रवास के दौरान ही लिखी। वे हिंदी साहित्यकार कहे जाते हैं, न कि प्रवासी साहित्यकार। अच्छी कहानी की पहचान यह है कि उसका संक्षेपण नहीं किया जा सकता। उन्होंने बताया कि डॉ. उषा वर्मा की कहानियाँ पाठकों को बाँधती हैं।
प्रतिष्ठित कथाकार चित्रा मुद्गल ने लेखिका को निरंतरता की ओर प्रेरित करते हुए इन कहानियों में चित्रित विदेशी संस्कार और स्वदेशी मर्यादा के संतुलन की विशिष्टता को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि शोषण और दमन दुनिया के हर कोने में है, जिसके खिलाफ ये कहानियाँ पाठक को जागरूक करती हैं।
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अपने आलेख पाठ में डॉ. हरजेन्द्र चौधरी ने कहानियों के संदर्भों के साथ इस बात की पुष्टि की कि अब प्रवासी रचनाकारों के साथ किसी रियायत की आवश्यकता नहीं है, बल्कि वे किसी भी रचनाकार के समकक्ष रखी जाने वाली कहानियाँ हैं। दूसरी ओर डॉ. अजय नावरिया ने इन कहानियों को प्रवासी स्त्री विमर्श की कहानियाँ बताते हुए आधुनिक कथा-लेखन से जुड़े कई सवाल रखे।
उन्होंने कहा कि इन कहानियों में आत्म-विश्लेषण से जुड़े सवाल आते-जाते रहते हैं। अतिथियों का स्वागत गगनांचल के संपादक अजय गुप्ता ने किया। कार्यक्रम में डॉ. कैलाश वाजपेयी, कमला सिंघवी, वीरेन्द्र प्रभाकर, डॉ. सीतेश आलोक, डॉ. प्रेम जनमेजय, आलोक श्रीवास्तव तथा डॉ. पदमेश गुप्त सहित कई जाने-माने साहित्यकार व शब्दकर्मी उपस्थित थे।
साभार -अक्षरम्

