1. लाइफ स्‍टाइल
  2. साहित्य
  3. मेरा ब्लॉग
  4. The challenge of rising temperatures and ways to protect yourself

बढ़ते तापमान की चुनौती और बचाव के मार्ग

Climate change
भारत, वर्तमान में तपती धरती, सुलगते आसमान के चलते भीषण जलवायु संकट के मुहाने पर खड़ा है। सूरज के तीखे तेवर और लू के थपेड़ों ने न केवल जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया है, बल्कि मानवों से लेकर बेजुबान पशु-पक्षियों तक के कंठ में शुष्कता भरते हुए, अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।

हाल के वर्षों में उत्तर भारत से लेकर दक्षिण तक और पूर्व से लेकर पश्चिम तक, पारा लगातार 45 से 50 डिग्री सेल्सियस के करीब पहुंच रहा है। यह बढ़ता तापमान केवल एक मौसमी बदलाव नहीं, बल्कि प्रकृति द्वारा इंसानों को दी जा रही एक गंभीर चेतावनी है। यदि हम वैज्ञानिक आंकड़ों पर गौर करें, तो भारत में गर्मी का यह प्रकोप ऐतिहासिक रिकॉर्ड तोड़ रहा है, जो हमारे पारिस्थितिकी तंत्र का रेड अलर्ट है।ALSO READ: गर्मी में यदि लू लग जाए तो करें ये घरेलू उपचार
 

भारत में बढ़ते तापमान के सांख्यिकीय साक्ष्य और कारण

भारत में तापमान वृद्धि की दर चिंताजनक है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) और जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (आईपीसीसी) की रिपोर्टों के अनुसार, भारत का औसत वार्षिक तापमान 1901 के बाद से लगभग 0.7 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है।

हालांकि यह संख्या छोटी लग सकती है, लेकिन इसके प्रभाव भयावह होकर विनाशकारी बन रहे हैं। पिछले एक दशक में भारत ने अपने इतिहास के सबसे गर्म वर्षों का अनुभव किया है। गर्मी के इस विकराल रूप के पीछे कई वैज्ञानिक और मानवीय कारण उत्तरदायी हैं।
 
भूमंडलीय तापन (ग्लोबल वार्मिंग) और जलवायु परिवर्तन के कारण वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों का जमाव बढ़ा है। अल-नीनो जैसे समुद्री प्रभाव भारत में मानसून को अनियमित करते हैं और ग्रीष्मकाल की अवधि को लंबा खींच देते हैं। इसके साथ ही, अनियंत्रित शहरीकरण ने कंक्रीट के जंगलों को जन्म दिया है।

शहरों में कंक्रीट और डामर की अधिकता के कारण अर्बन हीट आइलैंड का प्रभाव देखा जा रहा है, जिससे मिट्टी कम पानी सोख रही है। जहां शहरों का तापमान आसपास के ग्रामीण इलाकों की तुलना में 3 से 5 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया है। वनों की अंधाधुंध कटाई और बढ़ते कार्बन उत्सर्जन ने जैसे आग में घी डालने का काम किया है।
 
भीषण गर्मी और लू के बहुआयामी दुष्प्रभाव साफ झलक रहे है। तेज गर्मी का प्रभाव केवल शारीरिक पसीने तक सीमित नहीं है, इसके आर्थिक और पारिस्थितिक परिणाम अत्यंत घातक हैं। स्वास्थ्य के मोर्चे पर, हीट स्ट्रोक (लू), गंभीर डिहाइड्रेशन और शरीर के अंगों की विफलता जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं। एक अनुमान के अनुसार, बढ़ते तापमान के कारण भारत की श्रम क्षमता में भारी गिरावट आ रही है, क्योंकि दोपहर के समय बाहरी काम करना असंभव होता जा रहा है। 
 
कृषि क्षेत्र में, अत्यधिक गर्मी गेहूं और अन्य रबी फसलों को पकने से पहले ही सुखा देती है, जिससे खाद्य सुरक्षा पर संकट मंडराने लगा है। इसके अलावा, बेजुबान प्राणियों का संकट और भी अधिक है। सड़कों पर घूमने वाले पशु और आसमान में उड़ने वाले पक्षियों के लिए पानी के प्राकृतिक स्रोत सूख रहे हैं, जिससे जैव विविधता को अपूरणीय क्षति पहुंच रही है। भू-जल स्तर का लगातार नीचे गिरना इस संकट को एक जल-युद्ध की ओर धकेल रहा है।
 
ऐसे में हमें बचाव के पारंपरिक मार्ग मिट्टी और प्रकृति का संरक्षण करने की आवश्यकता है। गर्मी से लड़ने के लिए हमारे पूर्वजों ने जो मार्ग अपनाए थे, वे आज भी सबसे अधिक प्रासंगिक और वैज्ञानिक हैं।

पीने के पानी की कपड़े की छागल और मिट्टी के मटकों का उपयोग इसका बेहतरीन उदाहरण है। फ्रिज के पानी के विपरीत, मटके व छागल का पानी वाष्पीकरण की प्रक्रिया के माध्यम से प्राकृतिक रूप से ठंडा होता है, जो शरीर के इलेक्ट्रोलाइट संतुलन को बनाए रखता है और गले के संक्रमण से भी बचाता है। 
 
इसी प्रकार, भारतीय संस्कृति में प्याऊ लगाना और जल सेवा को परम धर्म माना गया है। सार्वजनिक स्थानों पर ठंडे जल की व्यवस्था करना न केवल एक सामाजिक उत्तरदायित्व है, बल्कि इस भीषण गर्मी में राहगीरों के लिए जीवनदान से कम नहीं है।

वहीं हमें अपनी छतों और बालकनियों में पक्षियों के लिए मिट्टी के सकोरों में पानी रखने की परंपरा को अधिक से अधिक अपनाना होगा। ग्रामीण भारत में आज भी खस के पर्दों और छप्पर का उपयोग घरों को ठंडा रखने के लिए किया जाता है, जो आधुनिक एयर कंडीशनिंग का एक सस्ता और पर्यावरण अनुकूल विकल्प है।
 
सामूहिक और प्राचीन प्रयासों के साथ आधुनिक उपाय और खान-पान का अनुशासन भी गर्मी में स्वस्थ रहने के लिए जरूरी है। आज पंखे, कूलर और एसी हमारी दिनचर्या का हिस्सा बन चुके हैं, किंतु इनका विवेकपूर्ण उपयोग आवश्यक है। स्वास्थ्य और ऊर्जा संरक्षण हेतु एसी को 24 से 26 डिग्री पर चलाना और कूलर के साथ वेंटिलेशन का ध्यान रखना जरूरी है, ताकि उमस न बढ़े। 
 
घर के अनावश्यक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को बंद रखकर भी हम आंतरिक ऊष्मा कम कर सकते हैं। आधुनिक विज्ञान भी अब पारंपरिक जीवनशैली का समर्थन कर रहा है।

आज के दौर में हाइड्रेशन के लिए केवल सादा पानी पर्याप्त नहीं है। शरीर में लवणों की पूर्ति के लिए नींबू-पानी, ताजी छाछ, बेल का शरबत, नारियल पानी और कच्चे आम का पना जैसे देसी पेय पदार्थों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। खान-पान में तरबूज, खरबूजा, खीरा, संतरा, नारियल पानी और ककड़ी आदि जैसे मौसमी फलों का समावेश अनिवार्य है, जिनमें जल की मात्रा 90% से अधिक होती है। 
 
व्यक्तिगत सुरक्षा के लिए सूती और हल्के रंगों के ढीले कपड़े पहनना, दोपहर 12 से 4 बजे के बीच बाहर निकलने से बचना और सिर को ढककर रखना बुनियादी बचाव हैं। आधुनिक तकनीक में कूल रूफ पेंट प्रचलित हो रहे है। वर्टिकल गार्डनिंग जैसे नवाचार भी घरों के भीतर के तापमान को 2-4 डिग्री तक कम करने में सहायक सिद्ध हो रहे हैं।
 
अंततः, बढ़ता तापमान केवल एक मौसमी समस्या नहीं है, बल्कि यह हमारे विकास के मॉडल पर भी प्रश्नचिह्न है। यदि हम चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ियां ठंडी छांव का अनुभव करें, तो हमें तात्कालिक बचाव के साथ-साथ दीर्घकालिक समाधानों पर काम करना होगा।

वृक्षारोपण को एक उत्सव बनाना होगा और जल संरक्षण को जीवन का हिस्सा। प्रकृति का बढ़ता पारा हमें सचेत कर रहा है कि सतर्कता, संयम और संवेदनशीलता ही इस संकट से सुरक्षा का मूल मंत्र हैं। आइए, हम खुद को सुरक्षित रखें और प्यासे बेजुबानों के लिए पानी की एक बूंद सुनिश्चित कर मानवता का धर्म भी निभाएं।

(वेबदुनिया पर दिए किसी भी कंटेट के प्रकाशन के लिए लेखक/वेबदुनिया की अनुमति/स्वीकृति आवश्यक है, इसके बिना रचनाओं/लेखों का उपयोग वर्जित है...)ALSO READ: Summer health tips: गर्मी में धूप से बचने के 10 प्रभावी उपाय
लेखक के बारे में
सपना सीपी साहू 'स्वप्निल'
ये भी पढ़ें
State Foundation Day 01 मई: महाराष्ट्र, गुजरात स्थापना दिवस, जानें 10 खास बातें