कैसी ख्वाहिश.....
- पंकज जोशी
भटकते यायावर को वो सिकंदर मान बैठी,
इक बहते दरिया से नादाँ समंदर माँग बैठी।
यूँ तो उसके चेहरे को मुस्कुराने का हक़ है,
जाने क्यों पगली मन का भँवर माँग बैठी।
खिलती कलियों का मौसम था पसंद उसे,
उदास थी, जो हँसी में शहर बंजर माँग बैठी।
हाथ में बनी चित्रकारी और कल की फ़िक्र न थी,
दिल की आवाज़ पर किसी को मुकद्दर मान बैठी।
खुली आँखों से देखे सपनों की ताबीर इतनी,
जो बेलफ़्ज हो ख़ुदगर्ज़ दुनिया से प्यार माँग बैठी।
कनखियों से देखना तो यूँ भी कभी गवारा न था,
भीड़ से निगाहें चुराकर प्यार की एक नज़र माँग बैठी।
बंद ज़ुबाँ मेरी, माथे पर सल, मन में विचारों की लड़ाई,
मुझे जीतने के बाद भी मुझसे हारने का ज़हर माँग बैठी।
अँधेरों की परछाईं से हरदम अकेला लड़ता है जो,
जाने क्या सोचकर उससे रौशनी भरी सहर माँग बैठी।
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भटकते यायावर को वो सिकंदर मान बैठी,
इक बहते दरिया से नादाँ समंदर माँग बैठी।
यूँ तो उसके चेहरे को मुस्कुराने का हक़ है,
जाने क्यों पगली मन का भँवर माँग बैठी।
खिलती कलियों का मौसम था पसंद उसे,
उदास थी, जो हँसी में शहर बंजर माँग बैठी।
हाथ में बनी चित्रकारी और कल की फ़िक्र न थी,
दिल की आवाज़ पर किसी को मुकद्दर मान बैठी।
खुली आँखों से देखे सपनों की ताबीर इतनी,
जो बेलफ़्ज हो ख़ुदगर्ज़ दुनिया से प्यार माँग बैठी।
कनखियों से देखना तो यूँ भी कभी गवारा न था,
भीड़ से निगाहें चुराकर प्यार की एक नज़र माँग बैठी।
बंद ज़ुबाँ मेरी, माथे पर सल, मन में विचारों की लड़ाई,
मुझे जीतने के बाद भी मुझसे हारने का ज़हर माँग बैठी।
अँधेरों की परछाईं से हरदम अकेला लड़ता है जो,
जाने क्या सोचकर उससे रौशनी भरी सहर माँग बैठी।

