लद्दाख में ईरानी केसर की दस्तक, क्या कश्मीरी केसर को मिलेगी कड़ी टक्कर?
कश्मीर में केसर की खेती मौसम की मार, घटती पैदावार और खेती की जमीन पर बढ़ते दबाव से जूझ रही है, उसी बीच लद्दाख ने पहली बार ईरानी केसर की व्यावसायिक संभावनाओं को परखने के लिए कदम बढ़ा दिया है। लेह के स्पितुक फारका में करीब 4,000 वर्गमीटर बंजर जमीन पर लगभग 90 हजार ईरानी केसर कंद, जिनका वजन करीब 800 किलो है, लगाए गए हैं। यह फिलहाल पायलट परियोजना है, लेकिन सफल होने पर कश्मीर के लिए प्रतिस्पर्धा का नया मोर्चा खुल सकता है।
लद्दाख प्रशासन का मकसद अभी कश्मीर केसर को टक्कर देना नहीं, बल्कि यह जांचना है कि 10 ग्राम या उससे अधिक वजन वाले ईरानी कंद वहां के ऊंचाई वाले ठंडे रेगिस्तानी मौसम में कितनी अच्छी तरह विकसित होते हैं और किसानों के लिए आर्थिक रूप से कितने लाभकारी साबित होते हैं। सिंचाई के लिए बहाल की गई इगू-पेह नहर और आसपास विकसित जलाशयों का इस्तेमाल भी किया जा रहा है।
चुनौती की असली वजह कश्मीर में बदलता उत्पादन परिदृश्य है। केंद्र सरकार के आंकड़ों के अनुसार 2023-24 में जम्मू कश्मीर में केसर उत्पादन 23.53 मीट्रिक टन तक पहुंचा था, जो 2024-25 में घटकर 19.58 मीट्रिक टन रह गया। औसत उत्पादकता भी 6.33 किलो प्रति हेक्टेयर से घटकर 5.27 किलो प्रति हेक्टेयर हुई। हालांकि सरकार का कहना है कि नेशनल मिशन आन केसर के बाद क्षेत्रफल और उत्पादकता में दीर्घकालीन सुधार हुआ है।
दूसरी तरफ जलवायु परिवर्तन कश्मीर के परंपरागत केसर क्षेत्र के लिए गंभीर चिंता बन रहा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक पंपोर में उत्पादन 2010-11 के 8 मीट्रिक टन से घटकर 2023-24 में 2.6 मीट्रिक टन रह गया। अनियमित बारिश और तापमान में बदलाव को प्रमुख कारणों में गिना गया है।
ऐसे में लद्दाख का प्रयोग सफल रहा तो इसका असर केवल उत्पादन पर नहीं, बाजार और ब्रांडिंग पर भी पड़ सकता है। कश्मीर का केसर 2020 से जीआई टैग के कारण विशिष्ट पहचान रखता है और उसकी गुणवत्ता, सुगंध तथा रंग उसे अलग बाजार दिलाते हैं। इसलिए लद्दाख में ईरानी किस्म की खेती शुरू होना तत्काल कश्मीरी केसर का विकल्प नहीं है।
लेकिन खतरा लंबी अवधि का है। यदि लद्दाख में उत्पादन लागत नियंत्रित रहती है, पैदावार अच्छी मिलती है और बड़े क्षेत्र में खेती फैलती है तो भारत के बाजार में एक ही फसल की दो भौगोलिक आपूर्तियां सामने आ सकती हैं। कश्मीर के लिए असली चुनौती तब पैदा होगी जब कम होती उत्पादकता के साथ लद्दाख का उत्पादन लगातार बढ़े। फिलहाल 4,000 वर्गमीटर का प्रयोग कश्मीर के हजारों हेक्टेयर क्षेत्र की तुलना में बेहद छोटा है, मगर यह संकेत जरूर है कि केसर का भविष्य अब केवल कश्मीर की जमीन तक सीमित नहीं रह सकता।

