मैं आज फिर उड़ना चाहता हूँ
कुणाल वाडिया
तड़पता था, सकुचाता था, मचलता था
मैं जब उड़ नहीं पाता था
उड़ने लगा तो अजीब सी खुशी हुई,
लगता था आसमान छू लिया,
मैंने तब लड़ना सीख लिया था
मैंने तब उड़ना सीख लिया था
आज फिर मैं उड़ना चाहता हूँ
आज फिर मैं लड़ना चाहता हूँ
आज मन शांत है मगर
पता नहीं क्यों ऐसा लगता है
जैसे मैं उड़ना भूल गया हूँ
जब आज मैंने उड़ना छोड़ दिया है
तब आज मेरा मन फिर मचल रहा है
मैं फिर से उड़ना चाहता हूँ
मैं फिर से लड़ना चाहता हूँ
पता नहीं वो तड़प फिर कब उठेगी
पता नहीं वो चिंगारी फिर कब भड़केगी
जब मैं फिर कोशिश करूँगा
उड़ने की, लड़ने की, आसमान छू लेने की
छोड़ो ये आग और जज्बात की बातें
छोड़ो ये सैलाब की बातें
आओ करें कुछ मन की बातें
अपने अंतर्मन की बातें
आज मैंने यह प्रण लिया है
दृढ़ निश्चय फिर मन ने किया है
सोचो कितना मजा आएगा
जब फिर से आसमान नीचे आएगा
आज फिर उड़ने को जी कर रहा है
आज फिर लड़ने को जी कर रहा है!
| |
|
मैं जब उड़ नहीं पाता था
उड़ने लगा तो अजीब सी खुशी हुई,
लगता था आसमान छू लिया,
मैंने तब लड़ना सीख लिया था
मैंने तब उड़ना सीख लिया था
आज फिर मैं उड़ना चाहता हूँ
आज फिर मैं लड़ना चाहता हूँ
आज मन शांत है मगर
पता नहीं क्यों ऐसा लगता है
जैसे मैं उड़ना भूल गया हूँ
जब आज मैंने उड़ना छोड़ दिया है
तब आज मेरा मन फिर मचल रहा है
मैं फिर से उड़ना चाहता हूँ
मैं फिर से लड़ना चाहता हूँ
पता नहीं वो तड़प फिर कब उठेगी
पता नहीं वो चिंगारी फिर कब भड़केगी
जब मैं फिर कोशिश करूँगा
उड़ने की, लड़ने की, आसमान छू लेने की
छोड़ो ये आग और जज्बात की बातें
छोड़ो ये सैलाब की बातें
आओ करें कुछ मन की बातें
अपने अंतर्मन की बातें
आज मैंने यह प्रण लिया है
दृढ़ निश्चय फिर मन ने किया है
सोचो कितना मजा आएगा
जब फिर से आसमान नीचे आएगा
आज फिर उड़ने को जी कर रहा है
आज फिर लड़ने को जी कर रहा है!

