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'गवर्नर' में RBI गवर्नर बने मनोज बाजपेयी, बताया भारत के सबसे बड़े आर्थिक संकट का सच
एक बहुत सिंपल सादा सा घर का सिद्धांत होता है कि जब बुरा समय आ जाए तो घर में जितने भी जमा पूंजी होती है, उसे निकालकर जिंदगी को आगे बढ़ाया जाए। कोई भी मां कोई भी पत्नी तभी अपने जेवर बेचने या गिरवी रखने के लिए तभी देती है जब उसे मालूम है कि भुखमरी का समय आ गया है। अभी यह सब नहीं लिया गया तो बड़ी मुसीबत आ सकती है।
लगभग इसी बात को लागू किया एस वेंकटरमन जी ने उस समय जब देश में बहुत बुरी हालत थी, मतलब सोचिए अपने घर की जमा पूंजी अपने देश की जमा पूंजी को एक जगह इकट्ठा करके किसी और को दे देना ताकि उसके एवज में कुछ पैसा मिल जाए। एक बेहद मुश्किल समय रहा होगा। ऐसा नहीं कि उस समय राजनेताओं ने मदद करने की कोशिश नहीं की होगी लेकिन यह एक ऐसा समय था जो किसी भी गवर्नर के लिए एक काम एकांत में चलने वाला सफर था और बहुत डरा कर रख देने वाला यह सफर हो सकता था।
सोचने वाली बात यह है कि जब यह आरबीआई गवर्नर बने थे तो मनमोहन सिंह जी ने खुद ही उनके नाम को लोगों के सामने रखा था। बहुत कठिन दौर था इसलिए भी, क्योंकि पूरे देश के सोने को कहीं गिरवी रखने वाली बात आ गई थी। देश के भविष्य की बात आ गई थी। उसके आज के वर्तमान की बात आ गई थी। यह बात कह रहे हैं मनोज बाजपेयी जो कि 'गवर्नर' जैसी फिल्म के साथ लोगों के सामने आ रहे हैं।
फिल्म में मनोज बाजपेयी आरबीआई गवर्नर के रूप में दिखाई देने वाले हैं, जिसने भारत में जब मार्केट ओपन किए गए थे, उस समय क्या स्थिति रही होगी देश की इसे बयां करने के लिए फिल्म में काम किया है। इस फिल्म के प्रमोशन इंटरव्यू के दौरान मनोज बाजपेयी ने अपने दिल की बहुत सारी बातें मीडिया के सामने साझा की।
इस फिल्म का ट्रेलर देखकर समझ में आता है कि आपने भाषा पर बहुत नियंत्रण रखा।
बिल्कुल, भाषा पर नियंत्रण रखना बहुत जरूरी हो जाता है। मूल तो हम तो यह मानकर चलता है कि हमारे जो दर्शक है, वह हिंदी बोलने वाले हैं। हिंदी समझने वाले दर्शक हैं। लेकिन यह जो गवर्नर है, यह एक तमिल व्यक्ति है। और क्योंकि वह बहुत बड़े पद पर है और एक सरकारी ऑफिसर है तो उससे यह नहीं दिखा सकते कि इंग्लिश नहीं आती है या हिंदी नहीं आती है। उसे सब आता है। और यह वह भी व्यक्ति है जिसे तमिल और हिंदी दोनों बोलना आती है क्योंकि ऐसे कई सारे लोग हमारे देश में आज भी हैं तो दोनों भाषा बोल सकते हैं तो बहुत संभलकर और संतुलित होकर मुझे भाषा का प्रयोग करना पड़ा।
फिल्म में कैरेक्टर के अंदर जाने के लिए आपको क्या-क्या प्रिपरेशन करनी पड़ी
बिल्कुल जब भी कोई कैरेक्टर में लेता हूं या कोई भी अभिनेता लेता है तो ऐसा नहीं होता कि आपने उसके स्क्रिप्ट पढ़ा और शुरू हुई और काम बस बन गया। उसके लिए आपको फिजिकली, कई बार मेंटली कई बार इमोशनली बहुत सारे काम करने पड़ते हैं। अब गवर्नर जैसे किसी व्यक्ति का रोल कर रहा हूं और लोगों के सामने अभिनीत कर रहा हूं तो बहुत जरूरी हो जाता है
मैं तो हिस्ट्री ऑनर्स का छात्र था। मेरे लिए गणित तो बिल्कुल बुरा था। इस विषय में बड़े बुरे नंबर से मैं पास होता था और फिजिक्स तो पूछो ही मत बहुत बुरी हालत थी। लेकिन जब मैं गवर्नर का रोल निभा रहा हूं तो मैं यह सोच नहीं रख सकता। मेरे जुबान में फिस्कल डेफिसिट या जीटीपी या क्रेडिट ऐसे सब शब्द बिल्कुल आसानी से निकलने वाले होने चाहिए। आप जब इन बातों को पढ़ते रहते हैं तो यह कहीं आपके जुबान पर समा जाते हैं। और सिर्फ इतना ही नहीं फिर मुझे वैसे ही बॉडी लैंग्वेज भी करनी पड़ती, क्योंकि आप जो सोच रहे हैं आप जिस तरीके के सोच वाले व्यक्ति हैं वह आपकी बॉडी लैंग्वेज में समझ में आ जाता है।
यह जो घटनाक्रम था हमारे सोने को गिरवी रखने की पूरी बात ही यह भारत में ऐतिहासिक भी रहा है सामाजिक भी रहा है। इकोनामी से जुड़ा हुआ तो रहा है। कहीं ऐसा तो नहीं कि यह सब चीज है। अब सिर्फ फिल्मों के जरिए लोग समझेंगे टेक्स्ट बुक के जरिए नहीं। क्या यह जिम्मेदारी फिल्मों पर आ गई है?
नहीं कोई जिम्मेदारी नहीं है। हरेक की अपनी अपनी चॉइस है कि वह किस तरह की फिल्में चुनना चाहता है। अगर फिल्म की स्क्रिप्ट बहुत अच्छी हो, बहुत विश्वसनीय हो तो कर लेता हूं। ऐसे फिल्म क्योंकि इससे लोग बहुत जुड़ते हैं। अब इंस्पेक्टर झेंडे की ही बात कर लीजिए। कॉमेडी की शक्ल में एक फिल्म आई थी लेकिन जरा सोचिए चार्ल्स शोभराज जैसे व्यक्ति जिसको कोई पकड़ नहीं पा रहा था, उसे एक छोटे से हवलदार ने पकड़ लिया वो भी एक बार नहीं दो बार पकड़ लिया। यह तो अपने आप में बहुत हंसी ला देने वाला सब्जेक्ट है।
जरा सोचिए ना इतने बड़े क्रिमिनल को एक छोटे से हवलदार ने पकड़ा। पहली बार पकड़ लिया वो गलती से था और दूसरी बार बिल्कुल प्लानिंग के साथ पकड़ा। जब इस फिल्म के लिए मैंने असली इंस्पेक्टर झेंडे से बात की थी तो उन्होंने कहा, मैं जब उसे पकड़ रहा था उसको तो बड़ा डर लग रहा था क्योंकि चार्ल्स शोभराज को मार्शल आर्ट बड़ा अच्छा था तो हम सारे पुलिस वाले थोड़े से टेंशन में थे। फिर जब पकड़ भी लिया गया और वैन में ले जा रहे थे तो उसके ऊपर एक और हवलदार को बैठाया गया ताकि कहीं किसी भी रूप में वह भाग ना जाए। वही उसको पेशाब करने के लिए भी नहीं जाने दिया कि ऐसा नहीं हो कि बहाना बनाकर वहां से चंपत हो जाए।
मनोज आगे कहते हैं जहां तक बात है घटना को पाठ्यक्रम में पढ़ाया नहीं जाता है तो वह तो हर जगह पर पूरी दुनिया में होता रहता है। कोई घटना होती है। उसे बच्चों को स्कूल में पढ़ा दिया जाता है जिसे पढ़ना होता है, वह पढ़ लेते हो और जो बच्चा पढ़ाई में बहुत ज्यादा रुचि नहीं रखता है। उसे ऑडियो वीडियो दिखा कर बात समझा दी जाती है। अब इसमें क्या है ना वह गवर्नर जैसी फिल्में पूरे ड्रामा के साथ लोगों के सामने किसी घटना को रखा गया है जो ज्यादा रुचिकर होता है।
जब निर्देशक चिन्मय से भी मैं बात करता था जिनमें से तो उनका ही कहना था कि इकोनामिक टर्म्स और भाषा का प्रयोग करना एक अलग बात है, लेकिन उससे ज्यादा जरूरी है कि इस घटना को लोगों के सामने सरल तरीके से रखा जा सके। विश्वसनीय बनाया जा सके और उसी के साथ-साथ यह भी ध्यान रखा जाए कि कहीं कोई बात गलत तरीके से या गलत शब्दों के प्रयोग के साथ ना जाए। मेरे हिसाब से जल्द किसी घटना को पूरे ड्रामा के साथ दिखाया जाता है तो कोई भी आम व्यक्ति उसे अच्छे से समझ पाता है।
फिल्म के निर्देशक चिन्मय खुद एक बहुत मंजे हुए कलाकार हैं तो जब आपने उनके साथ काम किया तो क्या अभिनेता जब निर्देशक बनता है तो कोई मदद होती है
बिल्कुल होती हैं कि जब भी कोई शख्स या एक एक्टर कैमरा के सामने क्या होता है, उसे क्या कठिनाई महसूस हो रही है। क्या परेशानी आ रही है या उसकी क्या हालत हो रही है। इस बात को सिर्फ दूसरा ऐक्टर ही समझ सकता है। कई बार ऐसा हुआ इस फिल्म के दौरान भी। और इस फिल्म क्यों मुझे तो इंस्पेक्टर झेंडे के समय में भी चिन्मय का बहुत साथ मिला है।
लोग स्टेडियम में बैठे-बैठे बहुत आसानी से कह जाते हैं कि अरे वैभव को शार्ट यहां नहीं वहां मारना चाहिए था। असली बात तो यह कि कोई नही जानता है कि कितनी तेजी से कोई गेंद आई है। अब हालत तो यह हो जाती है कि शायद आपको बॉल दिखाई भी ना दे। इतनी तेजी से वह आ रही होगी। लेकिन सच कहूं चिन्मय के होने से मुझे इस फिल्म में बहुत फायदा हुआ।
