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गवर्नर रिव्यू: मनोज बाजपेयी की गंभीर एक्टिंग भी नहीं बचा पाई फिल्म को
भारतीय सिनेमा में राजनीति, युद्ध और स्वतंत्रता संग्राम पर आधारित फिल्मों की कोई कमी नहीं है, लेकिन अर्थव्यवस्था को केंद्र में रखकर बनी फिल्में आज भी दुर्लभ हैं। यही वजह है कि 'गवर्नर' का विषय शुरू से उत्सुकता पैदा करता है। 1991 के उस दौर की कहानी, जब भारत का विदेशी मुद्रा भंडार लगभग खत्म हो चुका था और देश आर्थिक दिवालियापन के मुहाने पर खड़ा था, किसी भी फिल्मकार के लिए एक बेहद रोमांचक सिनेमाई सामग्री हो सकती थी।
लेकिन सवाल यह है कि क्या 'गवर्नर' इस ऐतिहासिक घटना को उसी गहराई और संतुलन के साथ पेश कर पाती है जिसकी उससे उम्मीद थी?
फिल्म का केंद्र हैं भारतीय रिजर्व बैंक के तत्कालीन गवर्नर से प्रेरित किरदार एस वेंकटरमनन, जिसे मनोज बाजपेयी ने निभाया है। देश आर्थिक संकट में फंसा है। विदेशी मुद्रा भंडार तेजी से घट रहा है। सरकार दबाव में है। अंतरराष्ट्रीय बाजार भारत पर भरोसा खो रहा है। ऐसे में देश के सोने को विदेशी बैंकों के पास गिरवी रखने का साहसिक फैसला सामने आता है।
सुनने में यह कहानी किसी राजनीतिक थ्रिलर से कम नहीं लगती। इसमें सत्ता के गलियारों की खामोश साजिशें हैं, आर्थिक फैसलों का दबाव है और राष्ट्रीय सम्मान से जुड़ी भावनाएं भी हैं। लेकिन फिल्म इन तमाम परतों को खोलने के बजाय एक सीधी रेखा पर चलती रहती है।
'गवर्नर' की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह इतिहास को समझने से ज्यादा इतिहास का नायक तय करने में दिलचस्पी दिखाती है। एक ऐसी आर्थिक घटना, जिसमें नौकरशाहों, अर्थशास्त्रियों, सरकारों और कई संस्थाओं की सामूहिक भूमिका थी, उसे फिल्म धीरे-धीरे एक व्यक्ति की असाधारण प्रतिभा की कहानी में बदल देती है।
रमनन को लगभग हर संकट का समाधान खोज लेने वाले व्यक्ति के रूप में दिखाया गया है। कभी एक साधारण कर्मचारी की बात से उन्हें प्रेरणा मिलती है, कभी पत्नी की सलाह से कोई बड़ा आर्थिक सूत्र मिल जाता है। कई बार ऐसा लगता है कि हम किसी जटिल आर्थिक ड्रामा के बजाय एक सुपरहीरो की उत्पत्ति कथा देख रहे हैं।
फिल्म की पटकथा बार-बार उन परिस्थितियों को आसान बना देती है, जिन्हें समझाने के लिए गंभीर संवाद और मजबूत दृश्य जरूरी थे। 1991 का आर्थिक संकट भारत के आधुनिक इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक था। लेकिन फिल्म उसे इतनी सरल भाषा में प्रस्तुत करती है कि कई जगह उसकी गंभीरता ही कम हो जाती है।
मनोज बाजपेयी हमेशा की तरह पूरी ईमानदारी से अपना किरदार निभाते हैं। उनके चेहरे की थकान, चिंता और जिम्मेदारी का बोझ कई दृश्यों में साफ महसूस होता है। समस्या अभिनय में नहीं, बल्कि उस लेखन में है जो उनके किरदार को इंसान कम और किंवदंती ज्यादा बनाने की कोशिश करता है।
बाजपेयी के अभिनय में वह परिपक्वता दिखाई देती है जिसके लिए उन्हें जाना जाता है। कई दृश्यों में वे बिना संवाद के भी प्रभाव छोड़ते हैं। लेकिन एक अभिनेता कितना भी अच्छा क्यों न हो, वह कमजोर पटकथा की सीमाओं को पूरी तरह नहीं तोड़ सकता।
फिल्म में पत्रकारिता, राजनीति और नौकरशाही के चित्रण भी सवाल खड़े करते हैं। विशेष रूप से पत्रकारों को जिस तरह पेश किया गया है, वह काफी सतही लगता है। कई दृश्य वास्तविकता से ज्यादा नाटकीय प्रतीत होते हैं। यही कारण है कि फिल्म का थ्रिलर तत्व भी पूरी तरह प्रभावी नहीं बन पाता।
तकनीकी स्तर पर भी 'गवर्नर' औसत दर्जे की फिल्म है। कुछ दृश्य ऐसे हैं जहां निर्माण गुणवत्ता अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंचती। विजुअल प्रस्तुति और ग्राफिक्स कई बार टीवी ड्रामा जैसी अनुभूति देते हैं। जबकि विषय की भव्यता कहीं अधिक सिनेमाई ट्रीटमेंट की मांग करती थी।
फिल्म का दूसरा बड़ा मुद्दा उसका दृष्टिकोण है। इतिहास पर आधारित किसी भी फिल्म को लेकर दर्शक यह उम्मीद करते हैं कि वह विभिन्न पक्षों को सामने रखेगी। लेकिन यहां कई पात्र केवल कहानी को आगे बढ़ाने के उपकरण बनकर रह जाते हैं। कुछ ऐतिहासिक व्यक्तित्वों की भूमिका सीमित दिखाई देती है, जबकि केंद्रीय किरदार का महत्व लगातार बढ़ाया जाता है।
यही वजह है कि फिल्म कई बार डॉक्यूमेंट्री, राजनीतिक बयान और नाटकीय जीवनी के बीच झूलती नजर आती है। वह तय नहीं कर पाती कि उसे आर्थिक संकट की कहानी कहनी है, राजनीतिक इतिहास समझाना है या एक भूले-बिसरे नायक को स्थापित करना है।
'गवर्नर' एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना को नई पीढ़ी के सामने लाने का काम जरूर करती है। जो दर्शक 1991 के आर्थिक संकट के बारे में ज्यादा नहीं जानते, उनके लिए यह फिल्म उत्सुकता पैदा कर सकती है। संभव है कि फिल्म देखने के बाद वे उस दौर के इतिहास को और विस्तार से पढ़ना चाहें।
कुल मिलाकर 'गवर्नर' उस दुर्लभ अवसर को पूरी तरह भुना नहीं पाती जो उसके पास था। यह भारत के आर्थिक इतिहास के सबसे नाटकीय अध्यायों में से एक को पर्दे पर लाती है, लेकिन उसकी जटिलता, बहस और मानवीय संघर्ष को पर्याप्त गहराई नहीं दे पाती। मनोज बाजपेयी का गंभीर अभिनय फिल्म को सम्मानजनक बनाए रखता है, लेकिन पटकथा बार-बार उसे नीचे खींचती है। 'गवर्नर' इतिहास का दरवाजा जरूर खोलती है, लेकिन उसके भीतर मौजूद पूरे कमरे को दर्शकों के सामने नहीं ला पाती।
- GOVERNOR (2026)
- निर्देशक: चिन्मय डी मंडलेकर
- गीतकार: जावेद अख्तर संगीतकार: अमित त्रिवेदी
- कलाकार: मनोज बाजपेई, अदा शर्मा, मधु शाह, नौशाद मोहम्मद कुंजु निर्माता: विपुल अमृतलाल शाह
- रेटिंग : 2/5
