1. मनोरंजन
  2. बॉलीवुड
  3. मुलाकात
  4. amit-sadh-exclusive-interview-pratap-movie-encounter-specialist-karma

अमित साध EXCLUSIVE: 'प्रताप' में एक पुलिस अफसर की कहानी नहीं, इंसान के भीतर चल रही जंग दिखाई देगी

अमित साध EXCLUSIVE: 'प्रताप' में एक पुलिस अफसर की कहानी नहीं, इंसान के भीतर चल रही जंग दिखाई देगी
'कर्म से कोई नहीं बच सकता'... अमित साध ने बताया, जब शिकारी खुद बन जाता है शिकार
फिल्मों में पुलिस अधिकारी के किरदार अक्सर वर्दी, बहादुरी और अपराधियों के साथ मुठभेड़ तक सीमित रह जाते हैं, लेकिन फिल्म 'प्रताप' में अमित साध एक ऐसे पुलिस अधिकारी की भूमिका निभा रहे हैं, जिसकी जिंदगी एक ऐसा मोड़ लेती है जहां वह खुद कानून और हालात के शिकंजे में फंस जाता है। कभी दूसरों का शिकार करने वाला यह अधिकारी खुद शिकार बन जाता है। उसके जीवन का यह बदलाव केवल परिस्थितियों की कहानी नहीं, बल्कि इंसानी मनोविज्ञान, सही-गलत के बीच की महीन रेखा और कर्मों के परिणामों की भी पड़ताल करता है। इस फिल्म, अपने किरदार की आंतरिक यात्रा, सह-कलाकारों और अभिनय को लेकर अपनी सोच पर अमित साध ने वेबदुनिया से खुलकर बातचीत की। पेश हैं बातचीत के प्रमुख अंश :
 
'प्रताप' में आप एक ऐसे पुलिस अधिकारी की भूमिका निभा रहे हैं, जो पहले एनकाउंटर करता है और बाद में खुद जेल पहुंच जाता है। एक तरह से किरदार के दो रूप हैं। कभी वह शिकारी है तो कभी खुद शिकार बन जाता है। इन दोनों में से कौन-सा पहलू आपके लिए ज्यादा चुनौतीपूर्ण रहा?
 
यही तो जिंदगी है। इतने सालों में इसका अनुभव हो ही गया है। जिंदगी में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। कभी ऊपर तो कभी नीचे। फिल्म में भी इस किरदार के दो पहलू हैं। एक वह दौर है जब वह अपनी जिंदगी के शिखर पर है और दूसरा वह, जब वह सबसे निचले स्तर पर पहुंच जाता है। 
 
ऐसा हर इंसान के साथ होता है। चाहे महेंद्र सिंह धोनी हों, विराट कोहली हों या पुलिस और सेना में काम करने वाले लोग, हर किसी की जिंदगी में अच्छे और बुरे दौर आते हैं।
 
कई बार सही और गलत के बीच की वह महीन रेखा धुंधली पड़ने लगती है, जिसके बारे में हमें हमेशा पता होता है कि उसे पार नहीं करना चाहिए। लेकिन जब इंसान पूरी तरह टूट जाता है, जिंदगी में शून्य पर पहुंच जाता है, तब कुदरत, दुनिया या यूनिवर्स उसे खुद को समझने और अपनी गलतियों को सुधारने का एक और मौका देती है। मैं इसे कर्म कहता हूं।
 
यही बात इस फिल्म में मेरे लिए सबसे बड़ा आकर्षण थी। इस किरदार की पूरी यात्रा काफी दिलचस्प और चुनौतीपूर्ण रही। इसका श्रेय मैं फिल्म की लेखन टीम को देना चाहूंगा। उन्होंने किरदार की एक खूबसूरत यात्रा रची है। मुझे लगता है कि फिल्म की सबसे दिलचस्प बात भी यही है।
 
आपने एक एनकाउंटर स्पेशलिस्ट की भूमिका निभाई है। अक्सर वास्तविक जिंदगी में ऐसे पुलिस अधिकारी हीरो बन जाते हैं, जबकि कई बार वे कानून की सीमाओं से आगे जाकर भी काम करते हैं। यह काफी संवेदनशील विषय है। फिल्म इस मुद्दे को किस तरह सामने रखती है?
 
इसके लिए तो आपको फिल्म देखनी पड़ेगी। इस विषय को किस तरह दिखाना है, यह निर्देशक का नजरिया और उनकी कहानी है। वही तय करते हैं कि उन्हें कौन-सा पहलू दर्शकों के सामने लाना है।
 
जैसा कि आपने शुरुआत में बहुत अच्छी बात कही कि इस किरदार के दो पहलू हैं, एक बाहर की दुनिया और दूसरा उसके भीतर की दुनिया। यही फिल्म की सबसे बड़ी खासियत है। इसे शब्दों में समझाना थोड़ा मुश्किल है, क्योंकि असल में यही फिल्म का विषय है।
 
मैं इतना जरूर कहूंगा कि एक महीन रेखा होती है, जिसे पार नहीं करना चाहिए। यह सिर्फ पुलिस वालों के साथ नहीं, हर इंसान के साथ होता है। बचपन से ही हमें सही और गलत का फर्क समझ आने लगता है। कुछ लोग उस सीमा को पार कर जाते हैं और कुछ नहीं करते।
 
लेकिन जो लोग उस सीमा को पार करते हैं, उन्हें कभी न कभी अपने कर्मों का परिणाम भुगतना पड़ता है। जिंदगी में आप जो करते हैं, सोचते हैं और देखते हैं, उसका कहीं न कहीं असर जरूर होता है। कर्म बहुत बड़ी चीज है और यही बात इस फिल्म में भी दिखाई गई है।
 
आपका किरदार बाहर से बेहद मजबूत दिखाई देता है, लेकिन जेल पहुंचने के बाद मानसिक और भावनात्मक रूप से टूटने लगता है। इस बदलाव को पर्दे पर विश्वसनीय बनाने के लिए आपने किस तरह की तैयारी की?
 
कई बार मुझे लगता है कि किसी किरदार की स्क्रिप्ट को ध्यान से सुनना और उसमें लिखे दृश्यों को समझना ही अपने आप में बहुत बड़ी तैयारी होती है। इस फिल्म में मेरे निर्देशक का भी बहुत बड़ा योगदान रहा। उन्होंने स्क्रिप्ट तो अच्छी लिखी ही थी, लेकिन शूटिंग से पहले और शूटिंग के बाद भी हम काफी देर तक बैठकर इस किरदार की आंतरिक यात्रा पर चर्चा करते थे।
 
उन्होंने जेल की एकांत कोठरी यानी सेल में रहने वाले लोगों की मनःस्थिति और इंसानी मनोविज्ञान पर काफी शोध किया था।
 
आप एक छोटी-सी बात से इसे समझिए। अभी हमारे घर में करीब आधे घंटे तक इंटरनेट नहीं चल रहा था और हम इंटरव्यू दे रहे थे। आपका भी समय लगा हुआ है और हमारा भी। हम चाहते हैं कि बातचीत अच्छी तरह हो। लेकिन इंटरनेट बंद होते ही घर में अफरा-तफरी मच गई। कोई इधर भाग रहा है, कोई कुछ कर रहा है। हमारा डॉगी तक परेशान हो गया।
 
सिर्फ पांच-छह मिनट इंटरनेट ठीक से नहीं चला तो हम सब बेचैन हो गए कि आखिर सब कुछ सामान्य तरीके से क्यों नहीं हो रहा है।
 
अब सोचिए, जेल में रहने वाले व्यक्ति के साथ यही स्थिति कितने बड़े स्तर पर होती होगी। उसे अपनी पसंद का खाना नहीं मिलता, अपनी मर्जी से किसी से बात नहीं कर सकता। उसे लगता है कि वह वहां सड़ रहा है। ऐसी परिस्थितियों का इंसान की मानसिक स्थिति पर कितना गहरा असर पड़ता होगा, इसकी कल्पना की जा सकती है।
 
हमने इसी कल्पना और शोध, दोनों को ध्यान में रखकर अपने दृश्यों को वास्तविक बनाने की कोशिश की। एक अभिनेता के तौर पर मेरी हमेशा कोशिश रहती है कि अपने अभिनय से दर्शकों को किसी किरदार का वास्तविक अनुभव दे सकूं। मैंने इस फिल्म में भी अपना सर्वश्रेष्ठ देने की कोशिश की है। उम्मीद है कि दर्शकों को लगेगा कि वे किसी किरदार को नहीं, बल्कि उसके बेहद करीब की सच्चाई को देख रहे हैं।
 
फिल्म में सीमा बिस्वास, तिग्मांशु धूलिया, मिलिंद गुणाजी और ईशा देओल जैसे बेहतरीन कलाकार हैं। इनके साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा? क्या ऐसे कलाकारों के साथ काम करने से आपके किरदार को निभाना आसान हुआ?
 
कहते हैं कि जब आपके सामने अच्छे कलाकार होते हैं तो आप अपने आप बेहतर अभिनय करने लगते हैं। ये सभी बहुत अच्छे कलाकार होने के साथ-साथ शानदार इंसान भी हैं। इनके साथ काम करके बहुत मजा आया। सभी ने अपने-अपने किरदारों को बहुत खूबी से निभाया है।
 
फिल्म में और भी कई कलाकार हैं। शीनू नाम का एक किरदार है, उनका काम भी आपको पसंद आएगा। कुछ पुलिस अधिकारी ऐसे भी हैं जो पूरी फिल्म में मेरे साथ रहते हैं। उन्होंने भी बहुत अच्छा काम किया है।
 
कुल मिलाकर यह पूरी टीम की मेहनत है। सभी ने एक टीम के रूप में बहुत अच्छा काम किया है और मुझे इस बात की खुशी है कि मुझे इतने अच्छे कलाकारों के साथ काम करने का मौका मिला। 
 
मैं ईशा देओल के बारे में एक बात जरूर कहना चाहूंगा। फिल्म में ईशा मेरी पत्नी का किरदार निभा रही हैं और उन्होंने बहुत प्यारा अभिनय किया है। उन्होंने अपने किरदार को जिस शिद्दत से निभाया है, उससे वह बेहद आत्मीय और खूबसूरत बन गया है। उन्होंने उस किरदार को बहुत महत्व दिया है।
 
मुझे लगता है कि जो लोग यह फिल्म देखने जाएंगे, उन्हें ईशा देओल का एक नया रूप देखने को मिलेगा। उनका अभिनय निश्चित रूप से दर्शकों को पसंद आएगा।
 
आपकी फिल्मोग्राफी पर नजर डालें तो आपने हमेशा अलग-अलग तरह के किरदार और प्रोजेक्ट किए हैं। ऐसा लगता है कि आप ऐसे किरदार चुनते हैं जिनमें अभिनय की काफी गुंजाइश हो। एक अभिनेता के तौर पर अपनी अलग पहचान बनाना आपके लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है या हर नई फिल्म में खुद को पिछले किरदार से अलग साबित करने की कोशिश?
 
कभी-कभी हमें लगता है कि हम अपनी पसंद से फिल्में और किरदार चुन रहे हैं, लेकिन सच यह है कि हर चीज पूरी तरह हमारे हाथ में नहीं होती।
 
हां, मैं मेहनत करता हूं और पूरी ईमानदारी से फैसले लेने की कोशिश करता हूं। लेकिन किसी फिल्म में कोई भूमिका मिलने के पीछे बहुत सारे लोगों की सहमति होती है। कई बार ऐसा होता है कि मैं कोई किरदार करना चाहता हूं, लेकिन कास्टिंग डायरेक्टर मना कर देते हैं। कभी प्रोड्यूसर की तरफ से ना होती है तो कभी स्टूडियो की तरफ से।
 
इसलिए किसी किरदार तक पहुंचने के लिए बहुत सारे लोगों की हां जरूरी होती है। जब इतने लोगों की सहमति के बाद कोई भूमिका आपके पास आती है तो उसके लिए मैं खुद को बहुत भाग्यशाली और आभारी महसूस करता हूं।
 
मैं अपनी तरफ से हमेशा मेहनत करता हूं और अपना सौ प्रतिशत देने की कोशिश करता हूं। इसके लिए आपका भी धन्यवाद कि आपने मेरे काम की तारीफ की और इतना अच्छा सवाल पूछा।
 
मैंने जिंदगी में एक बात सीखी है कि अगर आप मेहनत करते हैं और पूरी सच्चाई व ईमानदारी से अपना काम करते हैं तो आप कभी हार नहीं सकते। मुझे लगता है कि मेहनत और ईमानदारी का फल किसी न किसी रूप में जरूर मिलता है।
लेखक के बारे में
समय ताम्रकर
समय ताम्रकर फिल्म समीक्षक हैं, जो फिल्म, कलाकार, निर्देशक, बॉक्स ऑफिस और फिल्मों से जुड़े पहलुओं पर गहन विश्लेषणात्मक लेख लिखते हैं।.... और पढ़ें
अगला लेख
'रामायण: पार्ट 1' को सेंसर बोर्ड से मिली हरी झंडी, बिना कट के मिला U सर्टिफिकेट, जानें कितना होगा रनटाइम