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संघ प्रमुख मोहन भागवत ने किसको कहा अहंकारी, बोले- सूर्य भी अस्त होता है...

मोहन भागवत
Mohan Bhagwat speech Ujjain: महाकाल की नगरी उज्जैन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत द्वारा दिए गए भाषण के कुछ अंश काफी चर्चा में हैं। भागवत ने कहा कि जब व्यक्ति अहंकार में आकर काम करता है और यह मानता है कि सब कुछ उसके नियंत्रण में। ऐसा मानकर चलता है कि सब तरफ मेरी ही सत्ता चलती है। दरअसल, यह उसकी गलतफहमी होती है। 
 
उज्जैन में शुक्रवार को धर्म संसद को संबोधित करते हुए संघ प्रमुख ने कहा कि किसी को भी यह भ्रम नहीं होना चाहिए कि सब कुछ उसकी मर्जी से होता है। भागवत द्वारा इशारों में कही गई इस बात के अलग-अलग अर्थ निकाले जा रहे हैं। सूरज का उदय हुआ है तो अस्त भी निश्चित है। संघ प्रमुख ने युवाओं से अपील की कि वे धर्म को केवल पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं रखें, बल्कि इसे अपने दैनिक जीवन और आचरण में उतारें। भारत के युवाओं का जीवन ऐसा होना चाहिए, जिससे पूरा विश्व प्रेरणा ले। 

धर्म और रिलिजन में अंतर

भागवत ने कहा कि धर्म पश्चिमी 'रिलिजन' या केवल पूजा-पाठ/कर्मकांड तक सीमित नहीं है। कर्मकांड अभ्यास का हिस्सा मात्र हैं, धर्म वास्तव में जीवन जीने का एक स्थायी अनुशासन है। कचरा न फैलाना, ट्रैफिक नियमों का पालन करना, अपनी उपासना का सम्मान करने के साथ दूसरों की पद्धति का आदर करना और धर्मांतरण न कराना भी धर्म का ही अंग है।
 
उन्होंने कहा कि भारत ने अकारण विवाद करने वाले पड़ोसी देशों को सबक सिखाने के बावजूद कभी अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं किया। वैचारिक मतभेदों से परे संकट के समय पीड़ितों की मदद करना भारत के स्वभाव (डीएनए) में शामिल है। धर्म केवल बुढ़ापे या सेवानिवृत्ति के बाद की चीज नहीं है। यह जीवन के प्रारंभ से अंत तक बना रहता है। सुख-दुख और परिस्थितियां बदलती रहती हैं, लेकिन धर्म स्थायी है। किसी भी भय, लोभ, इच्छापूर्ति या प्राण बचाने के लिए भी धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए, क्योंकि यही मोक्ष का मार्ग है।
 
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