राधा अष्टमी 2026: पूजा का मुहूर्त और पूजन विधि
Shri Radha Ashtami 2026 : सनातन धर्म की पावन धारा में 'राधा अष्टमी' केवल एक पर्व नहीं, बल्कि निष्काम प्रेम, भक्ति और अलौकिक चेतना का जीवंत उत्सव है। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पावन अष्टमी तिथि को समूचा जगदंबर और विशेष रूप से ब्रज मंडल अपनी आराध्या, पराशक्ति देवी राधा के प्राकट्य की रसमय अनुभूति में डूब जाता है। शास्त्रों में श्री राधा को भगवान श्रीकृष्ण की आत्मा और उनकी आनंददायिनी शक्ति (आह्लादिनी शक्ति) माना गया है। इस बार श्री राधा अष्टमी का यह पर्व 19 सितंबर, शनिवार 2026 को मनाया जा रहा है। आइए जानते हैं श्री राधा अष्टमी की पूजा का मुहूर्त और पूजन विधि...
श्री राधा अष्टमी पूजा का मुहूर्त
ब्रह्म मुहूर्त: प्रात: 04:52 से 05:39 तक।
मध्याह्न मुहूर्त: सुबह 11:19 से दोपहर 01:45 तक।
अभिजित मुहूर्त: दोपहर 12:08 से 12:56 तक।
गोधूलि मुहूर्त: शाम 06:38 से 07:01 तक।
श्री राधा अष्टमी की पूजन विधि
मध्याह्न काल के समय मंदिर तथा घरों में श्री राधारानी और मुरलीधर की स्वर्ण, रजत या पीतल की प्रतिमा को दूध, दही, घृत, मधु और शर्करा (पंचामृत) से दिव्य स्नान कराया जाता है। अभिषेक के पश्चात श्रीजी को नवीन पीले या नीले वस्त्र पहनाकर दिव्य आभूषणों और सुगंधित पुष्पों से अलंकृत किया जाता है। तत्पश्चात उन्हें मालपुआ, अरबी की सब्जी, पंचमेवा और मिश्री का भोग अर्पण किया जाता है।
श्री राधा अष्टमी का व्रत एवं नियम
इस दिन भक्तगण पूर्ण निष्ठा के साथ एक दिवसीय व्रत का पालन करते हैं। यह व्रत मन, वचन और कर्म की पवित्रता को बनाए रखने का संदेश देता है। व्रत वाले दिन प्रात:काल से ही सात्विक विचारों को धारण किया जाता है। ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए काम, क्रोध, लोभ और मोह जैसी वृत्तियों से दूर रहने का विधान है। इस पावन अवसर पर व्रत धारण करने से साधक के जीवन से जन्म-जन्मांतर के पाप कट जाते हैं और घर में सुख, शांति, समृद्धि तथा अखंड सौभाग्य का वास होता है।
मध्याह्न का फलाहार
श्री राधारानी का प्राकट्य दोपहर (मध्याह्न काल) में माना गया है। अतः मध्याह्न पूजन एवं आरती के पश्चात ही भक्त फलाहार या सात्विक आहार ग्रहण करते हैं। मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण की आह्लादिनी शक्ति और उनकी परम अर्धांगिनी श्री राधारानी के बिना माधव की भक्ति अधूरी है। इसी कारण इस पावन तिथि का धार्मिक और आध्यात्मिक जीवन में एक विशिष्ट एवं सर्वोच्च स्थान है।
श्री राधा अष्टमी का आध्यात्मिक स्वरूप
शास्त्रों में श्री राधा को भगवान श्रीकृष्ण की आत्मा और उनकी आनंददायिनी शक्ति (आह्लादिनी शक्ति) माना गया है। वे केवल कृष्ण की संगिनी ही नहीं, बल्कि भक्ति की साकार मूर्ति हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, 'कृष्ण' यदि शब्द हैं, तो 'राधा' उनका अर्थ हैं। राधा अष्टमी का यह पर्व भक्त को केवल प्रभु पूजा का मार्ग नहीं दिखाता, बल्कि हृदय में विशुद्ध प्रेम और नि:स्वार्थ समर्पण के भाव को जागृत करता है।
श्री राधा अष्टमी पर्व से मिलती है यह सीख
पूजन के समय भक्तगण 'राधा कृपा कटाक्ष स्तोत्र' का पाठ करते हैं और 'राधे-राधे' के नाम संकीर्तन से संपूर्ण वातावरण को गुंजायमान कर देते हैं। श्री राधा अष्टमी का यह पावन पर्व हमें सिखाता है कि ईश्वर को प्राप्त करने का सबसे सरल और सुगम मार्ग केवल और केवल निश्छल प्रेम और संपूर्ण समर्पण है।

