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राघव चड्ढा सहित 7 सांसदों के भाजपा में जाने से मोदी सरकार को कितना फायदा होगा?
भारतीय राजनीति में 24 अप्रैल 2026 को एक बड़ा विकास हुआ है। राघव चड्ढा ने घोषणा की कि वे आम आदमी पार्टी (AAP) छोड़कर भाजपा में शामिल हो रहे हैं। उनके साथ राज्यसभा में AAP के 7 सांसद (स्वाती मालीवाल, हरभजन सिंह, संदीप पाठक, अशोक मित्तल, राजिंदर गुप्ता और विक्रम साहनी सहित) संवैधानिक प्रावधान (दो-तिहाई बहुमत) का हवाला देते हुए भाजपा में विलय कर रहे हैं।यह कदम AAP के लिए बड़ा झटका है, लेकिन मोदी सरकार और भाजपा के लिए रणनीतिक रूप से कुछ लाभ दे सकता है।
भाजपा को संभावित फायदे:
राज्यसभा में संख्या बढ़ोतरी: AAP के 7 सांसदों का विलय भाजपा की ऊपरी सदन में ताकत बढ़ाएगा। इससे महत्वपूर्ण विधेयकों पर समर्थन मिलने में मदद हो सकती है, खासकर जब INDIA गठबंधन को तोड़ने के प्रयास चल रहे हों। चड्ढा जैसे चेहरों का आना भाजपा की विस्तारवादी छवि को मजबूत कर सकता है।
विपक्ष में फूट: AAP, जो दिल्ली और पंजाब में सरकार चला रही है, अब आंतरिक कलह का शिकार दिख रही है। AAP नेता संजय सिंह ने इसे “धोखा” बताया और कहा कि इन सांसदों ने पंजाब की जनता को धोखा दिया। उन्होंने भाजपा पर “ऑपरेशन लोटस” का आरोप लगाया। आतिशी और अन्य नेताओं ने पहले चड्ढा पर “बीजेपी और मोदी से डर” तथा “नरमी” बरतने का आरोप लगाया था। यह घटना AAP की एकता को कमजोर करती है और अरविंद केजरीवाल की नेतृत्व क्षमता पर सवाल खड़े करती है।
राजनीतिक नैरेटिव: चड्ढा ने कहा कि वे “गलत पार्टी” में थे और अब “सकारात्मक राजनीति” करना चाहते हैं। भाजपा इसे “कंसेंस कॉल” या AAP के कथित भ्रष्टाचार से मुक्ति के रूप में प्रचारित कर सकती है।
फायदा सीमित क्यों हो सकता है?
हालांकि यह घटना भाजपा के लिए सकारात्मक प्रतीत होती है, लेकिन लोकसभा में हालिया महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े 131वें संविधान संशोधन बिल 2026 की पराजय ने सरकार की चुनौतियों को उजागर किया है।
यह बिल महिला आरक्षण को 2029 तक लागू करने और परिसीमन (delimitation) से जोड़ने का प्रयास था। लोकसभा में इसे दो-तिहाई बहुमत नहीं मिला (लगभग 298-230 के आसपास वोट पड़े, लेकिन आवश्यक बहुमत नहीं जुटा) और बिल गिर गया।
विपक्ष (खासकर दक्षिणी दल जैसे DMK, TMC) ने इसे “ट्रोजन हॉर्स” बताया — महिला आरक्षण के नाम पर उत्तरी राज्यों (भाजपा के मजबूत क्षेत्र) को ज्यादा सीटें देने की कोशिश। इससे भाजपा की महिला सशक्तिकरण की छवि को नुकसान पहुंचा और संघीय ढांचे पर सवाल उठे।
यह मोदी सरकार की लोकसभा में एक बड़ी विधायी हार मानी जा रही है, जो दिखाती है कि संख्या बल के बावजूद व्यापक सहमति बनाना चुनौतीपूर्ण है।
इस पृष्ठभूमि में, 7 सांसदों का आना राज्यसभा में अल्पकालिक राहत दे सकता है, लेकिन लोकसभा में बिल पास कराने या 2029 की रणनीति (परिसीमन पर निर्भर) के लिए पर्याप्त नहीं। जनता के मुद्दों जैसे महंगाई, रोजगार और क्षेत्रीय असंतुलन पर विपक्ष की एकता अभी बनी हुई है।
अल्पकालिक बढ़त, लेकिन रणनीतिक सबकराघव चड्ढा और 7 सांसदों का भाजपा में जाना मोदी सरकार को अल्पकालिक फायदा जरूर देगा — राज्यसभा में मजबूती, AAP को कमजोर करना और “विपक्ष टूट रहा है” का नैरेटिव। लेकिन महिला आरक्षण-परिसीमन बिल की हार याद दिलाती है कि लोकसभा में संख्या के साथ-साथ सहमति भी जरूरी है।
राजनीति में ऐसे विलय अक्सर व्यक्तिगत फैसले या दबाव का नतीजा होते हैं। लंबे समय में जनता तय करती है कि कौन सही दिशा में है। भाजपा को इस मौके का फायदा उठाना चाहिए, लेकिन बिना आत्मसंतोष के — क्योंकि विकास, शासन और सहमति के मुद्दों पर विपक्ष अभी पूरी तरह हारा नहीं है।
