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क्या बिना संसद में परिसीमन बिल पास हुए बदल जाएंगी लोकसभा की सीटें? जानिए संविधान का वो नियम जो कोई नहीं बताता

Delimitation Lok Sabha Seats
Delimitation Lok Sabha Seats: भारत की भावी राजनीति और संसदीय व्यवस्था को लेकर इन दिनों एक बड़ा सवाल चर्चा में है—क्या लोकसभा की सीटों का नए सिरे से बंटवारा करने के लिए संसद से नया संवैधानिक संशोधन पारित कराना अनिवार्य है?

अमूमन यह माना जा रहा है कि जब तक सरकार संसद में दो-तिहाई बहुमत से परिसीमन (Delimitation) से जुड़ा विधेयक पास नहीं करा लेती, तब तक सीटों का गणित नहीं बदलेगा। परंतु भारत के संविधान में एक ऐसा प्रावधान पहले से मौजूद है, जो किसी भी नए संशोधन के बिना भी सीटों के पुनर्गठन की प्रक्रिया को कानूनी रूप से आगे बढ़ा सकता है। ALSO READ: परिसीमन विधेयक पर संसद में सस्पेंस, क्या अगले 10 दिनों में अमित शाह चलने वाले हैं मास्टर स्ट्रोक? Delimitation Lok Sabha Seats
सरकार ने अप्रैल 2026 में परिसीमन और सीटों की संख्या (संभावित 850 तक) बढ़ाने से संबंधित एक संवैधानिक संशोधन विधेयक पेश किया था, जो पारित नहीं हो सका। लेकिन संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कोई नया संशोधन पास नहीं भी होता है, तब भी 2027 की जनगणना के आंकड़े जारी होते ही अनुच्छेद 81 और 82 के तहत परिसीमन की वैधानिक प्रक्रिया स्वतः शुरू की जा सकती है। ALSO READ: परिसीमन पर 5 बड़े बयान : स्टालिन से सोनिया गांधी तक किसने क्या कहा, उत्तर-दक्षिण विवाद क्यों गरमा रहा है? Delimitation Lok Sabha Seats Delimitation Lok Sabha Seats

2027 की जनगणना से 2029 के चुनाव तक : समय की चुनौती

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3. राज्यों के बीच बदलेगा सीटों का समीकरण: उत्तर बनाम दक्षिण
यदि मौजूदा संवैधानिक प्रावधानों के तहत ही 2027 की जनगणना के बाद परिसीमन होता है, तो 1973 से चला आ रहा सीटों का ढांचा पूरी तरह बदल जाएगा। वर्तमान में लोकसभा की 543 सीटों का बंटवारा 1971 की जनसंख्या पर आधारित है।
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इसके साथ ही, 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' के तहत महिलाओं के लिए 33% आरक्षण भी इसी परिसीमन प्रक्रिया के पूरा होने के बाद ही प्रभावी होगा।
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 'जेरिमैंडरिंग' का जोखिम और निष्पक्षता की आवश्यकता
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इसीलिए, नए परिसीमन आयोग की निष्पक्षता और सभी राजनीतिक घटकों का विश्वास हासिल करना इस पूरी प्रक्रिया का सबसे संवेदनशील हिस्सा होगा।

संविधान में यह स्पष्ट व्यवस्था है कि 2027 की जनगणना के बाद परिसीमन रोका नहीं जा सकता। बिना किसी नए संवैधानिक संशोधन के भी राज्यों के बीच सीटों का पुनर्गठन, सीमाओं का निर्धारण और महिला आरक्षण का क्रियान्वयन संभव है। असली चुनौती यह होगी कि 'एक व्यक्ति, एक वोट' के लोकतांत्रिक अधिकार को लागू करते समय भारत के संघीय ढांचे और जिम्मेदार राज्यों के हितों की रक्षा कैसे की जाए।
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