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  4. Is Operation Lotus underway in Parliament to secure the two-thirds majority needed to pass the Delimitation Bill?

लोकतंत्र में सांसदों के दलबदल का नया खेला, दो तिहाई बहुमत के लिए चल रहा ऑपरेशन लोटस?

Operation Lotus
देश के संसदीय इतिहास में इन दिनों दलबदल का नया इतिहास लिखा जा रहा है। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद अचानक से क्षेत्रीय दलों के सांसदों को अपनी पार्टी से मोहभंग होने लगा है। पहले आम आदमी पार्टी, फिर तृणमूल कांग्रेस और अब महाराष्ट्र में शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के कुनबे में सांसदों की बड़ी टूट हो गई है। क्या एक के बाद एक विपक्षी दलों के सांसदों का पाला बदलना महज एक इत्तेफाक है या इसके पीछे कोई ऐसी सियासी रणनीति है जो आने वाले दिनों में संसद के मानसून सत्र में दिखेगी।

क्षेत्रीय दलों के सांसदों का दलबदल- देश में पिछले कुछ दिनों तीन प्रमुख विपक्षी दलों के दो तिहाई सांसदों ने अपनी मूल पार्टी से किनारा कर लिया है। इसकी शुरुआत आम आदमी पार्टी से हुई जब उसके 10 में से 7 सांसदों ने पाला बदल लिया। इसके बाद पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद  तृणमूल कांग्रेस के 22 सांसदों ने बगावत कर तृणमूल कांग्रेस से अलग होने का ऐलान कर दिया और दलबदल कानून से बचने के लिए इन सांसदों ने नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में अपने गुट का विलय कर एनडीए (NDA) को समर्थन दे दिया।

वहीं अब महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की पार्टी शिवसेना (UBT) की पार्टी के 9 लोकसभा सांसदों में से 6 सांसद अपना अलग गुट बनाकर डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे (NDA) के खेमे में शामिल होने जा रहे हैं। बताया जा रहा है कि इन बागी सांसदों ने लोकसभा स्पीकर से मिलकर शिंदे गुट में विलय का पत्र सौंपा दिया है।

सांसदों के दलबदल के पीछे की इनसाइड स्टोरी?- आखिर सांसदों के इतने बड़े  पैमाने पर दलबदल क्यों हो रहा है, इसको समझने के लिए बीजेपी और उसके सियासी चाणक्य अमित शाह की सियासी रणनीति को समझना होगा। संसद के पिछले सत्र में मोदी सरकार ने परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े एक विधेयक पेश किया था लेकिन यह पास नहीं हो सका था, इसी वजह बीजेपी के नेतृत्व वाले NDA का बहुमत नहीं होना है। ऐसे में अब जब संसद का मानसून सत्र फिर होने जा रहा है तब मोदी सरकार लोकसभा में परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़ा अहम विधेयक फिर पेश करने की तैयारी में है और इन अहम विधयकों को पास कराने के लिए दो तिहाई बहुमत जुटाने के लिए इन दिनों ऑपरेशन लोटस को अंजाम दिया जा रहा है। यहीं कारण है कि क्षेत्रीय दलों के 2 तिहाई सांसदों को अगल गुट में मान्यता दी जा रही है जिससे वह दलबदल के कानून के दायरे में नहीं आए और उनकी संसद सदस्यता बनी रहे जिससे तिहाई बहुमत के साथ विधयकों को पास कराया जा रहा है

राजनीति के जानकाकर कहते है कि संसद में परिसीमन बिल या अन्य महत्वपूर्ण संवैधानिक संशोधनों को पास कराने के लिए एनडीए (NDA) को दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता है, और इसी जादुई आंकड़े को छूने के लिए बीजेपी द्वारा विपक्षी सांसदों को सुनियोजित तरीके से तोड़ा जा रहा है। दलबदल कानून के मुताबिक सांसद सीधे किसी दूसरी पार्टी में जाने के बजाय दो-तिहाई का गुट बनाकर विलय करते है तो उनकी संसद सदस्यता बनी रहती है। लोकसभा में तिहाई बहुमत के लिए NDA को 360 के करीब सांसदों का समर्थन चाहिए, जो मौजूदा वक्त में क्षेत्रीय दलों के सांसदों के टूट से ही संभव दिखाई देता है।

विपक्ष के निशाने पर बीजेपी- सांसदों के इस टूट के लिए विपक्षी दलों ने बीजेपी  पर सीधे आरोप लगाए है। विपक्ष का सीधा आरोप है कि जो नेता जांच एजेंसियों के रडार पर हैं, उन्हें मुकदमों और जेल का डर दिखाकर पाला बदलने के लिए मजबूर किया जा रहा है। जैसे पंजाब से आप सांसद अशोक मित्तल के ठिकानों पर ईडी (ED) की छापेमारी के बाद उनका बीजेपी के साथ होना। वहीं यूबीटी में टूट के  बाद उसके नेता संजय राउत ने बीजेपी पर सांसदों को 50-50 करोड़ देने का आरोप लगाया।

 
 
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विकास सिंह
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