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50 मिनट चली रिजिजू-राहुल गांधी की अहम बैठक, फिर भी नहीं टूटा संसद का गतिरोध; जानिए विपक्ष की 3 बड़ी शर्तें

kiren rijiju and rahul gandhi
संसद के मानसून सत्र में सरकार और विपक्ष के बीच बना गतिरोध टूटने का नाम नहीं ले रहा है। लोकसभा और राज्यसभा में जारी हंगामे के बीच बुधवार को संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के संसद भवन स्थित चेंबर में जाकर उनसे मुलाकात की। लगभग 50 मिनट तक चली इस उच्चस्तरीय बैठक में कांग्रेस की ओर से प्रियंका गांधी वाड्रा भी मौजूद रहीं।ALSO READ: Fact-Check: क्या दतिया उपचुनाव हारने के बाद BJP ने हजारों नेताओं को बाहर निकाला?

हालांकि, परिसीमन बिल (Delimitation Bill) पर विपक्ष का समर्थन जुटाने और सदन की कार्यवाही सुचारू रूप से चलाने की सरकारी कोशिशें इस बैठक के बाद भी बेनतीजा ही रहीं। 
 

1. मुलाकात में क्या हुआ और कहां अटका पेच?

सूत्रों के मुताबिक, केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने प्रस्तावित परिसीमन बिल को लेकर कांग्रेस और विपक्षी दलों का रुख जानना चाहा और संसद की कार्यवाही में सहयोग की अपील की। लेकिन राहुल गांधी ने साफ कर दिया कि जब तक सरकार विपक्ष की मुख्य मांगों पर ध्यान नहीं देती, तब तक किसी भी विधायी कार्य पर सहमति बनना संभव नहीं है। ALSO READ: यूसुफ पठान समेत 3 मुस्लिम सांसदों ने क्यों बनाई NDA से दूरी! क्या 'खेला' हो गया?
 

2. राहुल गांधी की 3 मुख्य शर्तें

विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने स्पष्ट रुख अपनाते हुए सरकार के सामने ये प्रमुख मांगें रखी हैं: 
1. गृह मंत्री अमित शाह का सदन में वक्तव्य: विपक्ष की मांग है कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह खुद सदन में आकर हालिया प्रदर्शनों के दौरान हुए पुलिस एक्शन और पेलेट गन/लाठीचार्ज के मुद्दे पर विस्तृत बयान दें। 
2. प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी और माफी: विपक्ष का कहना है कि उत्पन्न हुई समस्याओं पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी सदन में आकर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। 
3. मुद्दों पर सीधी चर्चा: जब तक इन गंभीर विषयों पर गृह मंत्री और प्रधानमंत्री का जवाब नहीं आता, तब तक विपक्ष किसी भी नए बिल या विधायी प्रक्रिया का समर्थन नहीं करेगा। ALSO READ: संसद परिसर में विपक्षी सांसदों का मार्च, अमित शाह से मांगा जवाब
 
 
किरेन रिजिजू और राहुल गांधी के बीच हुई यह बैठक भले ही गतिरोध को समाप्त न कर सकी हो, लेकिन इसने दोनों पक्षों के कड़े रुख को स्पष्ट कर दिया है। अब देखना यह होगा कि क्या सरकार विपक्ष की मांगों को मानते हुए गृह मंत्री के बयान के लिए तैयार होती है या फिर मानसून सत्र के बाकी बचे दिनों में भी हंगामे का दौर इसी तरह जारी रहता है। 
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