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सारे जहां से अच्छा हिंदोस्ता (फिर इंदौर) हमारा

London Trip
Trip To London: मेरा कथन न तो आत्म मुग्धता है, न अतिशयोक्ति। हर किसी को अपनी माटी, अपना घर, अपने लोग पसंद होते हैं। वह उन सबके साथ सुविधाजनक स्थिति में होता है। फिर भी कोई तो ऐसी बात है कि सैकड़ों साल की गुलामी और लाखों सितम के बाद भी हमारे अभिमान के लिए एक वाक्य ही काफी है कि 'हस्ती मिटती नहीं हमारी'। इसका मतलब यह भी नहीं कि दुनिया में कहीं कुछ हमसे अच्छा नहीं, हमसे बेहतर नहीं। बेहतर तो बहुत है। तकनीक, विज्ञान, शिल्प, शिक्षा, शिष्टाचार, प्राकृतिक संसाधन, व्यवहार वगैरह बहुत कुछ भिन्न और उम्दा बहुत सारी जगह है।

फिर भी हम 140 करोड़ की चिल्लर जैसी आबादी के साथ, मामूली-सी प्राकृतिक और खनिज संपदा (मुगल और अंग्रेज अधिकांश तो लूट ले गए) के साथ, बैसाखी वाली शिक्षा के सहारे, लोकतंत्र के नाम पर लूटमार वाली राजनीतिक व्यवस्था के बीच, जातिवाद, भेदभाव, तुष्टिकरण, भाई-भतीजावाद के नासूर के बावजूद यदि आज दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच पा रहे हैं तो यह है फिनिक्स जैसी जिजीविषा, चट्‌टान जैसी दृढ़ता और पानी जैसी प्रकृति की वजह से, जो किसी भी तरह आगे बढ़ने का रास्ता निकाल लेता है। तो आइए, इस किस्त में कुछ अन्य पहलुओं को टटोलते हैं। ALSO READ: Trip To London : लंदन में न सड़क पर धरने-प्रदर्शन, न चक्का जाम
 
मेरी यह दृढ़ मान्यता है कि जहां से जो अच्छा मिले, उसे ग्रहण करें। यह भी कि जिसने भी इस ब्रह्मांड की रचना की, उसने किसी एक की झोली में सब कुछ नहीं डाला। कमीबेशी के साथ जीवन दिया है। यदि उत्तर, पश्चिम को ठंडा माहौल, बर्फ से ढंकी वादियां दीं तो पूरब को प्रचुर जल संपदा, विविध भौगोलिक संरचना, नदियां, दुनिया में सर्वाधिक बोलियां, विभिन्न संस्कृतियां, रस्म, त्यौहार, परंपराओं वाली प्रकृति दी। इसलिए किसी को कमतर व किसी को बेहतर हम बताते रहें, लेकिन वे सब अपने आप में भिन्न और कुछ विशेषता लिए हैं। ALSO READ: Trip To London: पाउंड को रुपए में गिनेंगे तो चाय भी नहीं पी सकेंगे
 
ब्रिटेन का प्रमुख शहर व राजधानी लंदन 90 लाख से अधिक आबादी वाला है, लेकिन यहां अंग्रेज केवल 36.8 प्रतिशत हैं। शेष एशियाई, अरब, अफ्रीकन, यहूदी व दुनिया भर के अन्य लोग हैं। लंदन में साढ़े 6 लाख भारतीय, 3 लाख 22 हजार बांग्लादेशी व 2 लाख 90 हजार पाकिस्तानी हैं। आपको किसी भी मॉल, शॉपिंग सेंटर, कार टैक्सी, सिक्यूरिटी सर्विस, एअरपोर्ट ग्राउंड टी, रेस्टारेंट, ग्रासरी स्टोर्स पर मालिक या कर्मचारी के तौर पर भारत, पाक, बांग्लादेश के चेहरे मिल जाएंगे। आप इस चक्कर में न रहें कि कोई भारतीय आपकी ओर देखकर मुस्कराएगा। जबकि, हम इंदौरियों को कोई भटिंडा में भी दिख जाए तो चेहरा खिल उठता है। फिर इंदौर में उससे कभी न मिले हों, बस कहीं देखा भर हो। ALSO READ: London Trip: प्रधानमंत्री से पब्लिक तक मेट्रो, सिटी बस में सफर करते हैं
 
लंदन में यहूदी भी भरपूर नजर आते हैं और मुस्लिमों की तरह अपनी स्पष्ट पहचान के साथ रहते हैं। जैसे मुस्लिम को टोपी-दाढ़ी से परहेज नहीं, वैसे ही ये लांग काला कोट और काली पेंट, सफेद शर्ट पहनते हैं, जिसमें से डोरियां बाहर लटकती रहती हैं। सिर पर हैट भी पहनते हैं। शनिवार को अपने पूजा स्थल सपरिवार जाएंगे। ये आम तौर पर किसी से बात नहीं करते। इनमें भी अधिक बच्चों का चलन है। तीन-चार बच्चे आम बात है। इस शहर में भिखारी, स्ट्रीट डॉग, मच्छर व मक्खियां नहीं हैं। यहां मांगने का तरीका थोड़ा हटकर है। जैसे, कोई फुटपाथ पर कोई स्वांग रचकर लेट-बैठ जाएगा। कोई संगीत पेश करेगा। कोई मेट्रो स्टेशन पर बाकायदा पूरा बैंड सजाकर गाएगा-बजाएगा। आपकी इच्छा हो तो दो नहीं तो निकल लो। ALSO READ: London Trip: सड़कें संकरी, फुटपाथ चौड़े, फिर भी जाम नहीं लगता
 
जब ब्रिटिश हुकूमत के तहत दुनिया के करीब 60-65 देश गुलाम थे, तब कहा जाता था कि विक्टोरिया के राज में कभी सूर्य अस्त नहीं होता। यह दुनिया के करीब 35 प्रतिशत हिस्से पर कब्जे के समय की बात है, लेकिन भौगोलिक कारणों से आज भी ब्रिटन में नाम को ही सूर्यास्त होता है। रात साढ़े नौ बजे तक उजाला रहता है और सुबह 4 बजे फिर से प्रकाश फैल जाता है। यूरोप में भी प्राय: ऐसा होता है।
 
लंदन या ब्रिटेन में टेलिफोन, ऑप्टिकल फाइबर या किसी भी तरह की केबल सड़क के ऊपर नजर नहीं आएगी। सब अंडरग्राउंड। इनके चैंबर पर लिखा भी होगा कि कौन-सी लाइन है। सिवरेज, वाटर सप्लाय, पोस्टल सर्विस, स्ट्राम वाटर लाइन के अलग-अलग चैंबर हैं, जिन पर स्पष्ट अक्षरों में अंकित रहता है। यहां टेलिफोन का उपयोग अभी-भी बहुतायत से होता है- खासकर वरिष्ठ नागरिक इसका उपयोग करते हैं। उनके लिए आपातकालीन सेवा के नंबर याद रखना आसान होता है। यहां सौ-दो सौ साल पुराने भवन मिलना सामान्य बात है। तमाम मकान लाल ईंट व कवेलू के होते हैं और समूचे ब्रिटेन, यूरोप में मकान की छत ढलान वाली होती है, ताकि बर्फ व पानी बहकर नीचे गिर जाए। 
 
इनमें टैरेस या गच्ची नहीं होती, जहां खड़े होकर पतंग उड़ाई जा सके। न छत पर पानी की टंकी या अवैध पेंट हाउस होता है। वास्तु शिल्प बेजोड़ होता है। 400 से एक हजार साल पुराने विशालकाय भवन हैं, जो पत्थरों के बने हैं। ये प्रमुखत: चर्च हैं। स्कॉटलैंड का चर्च 900 साल पुराना और लंदन का सैंट पॉल कैथेड्रल 400 साल पुराना है। जबकि वेस्टमिंस्टर चर्च 1066 से अभी तक कायम है। इसमें ब्रिटिश राजाओं के राज्याभिषेक होते रहे हैं तथा शादियां भी होती हैं। यहां राजा, रानियों, आइजैक न्यूटन व स्टीफन हाकिंग जैसे वैज्ञानिकों, कवियों को दफनाया गया है।
 
यहां आपको दो सौ, तीन सौ साल पुराने रेस्टारेंट भी मिल जाएंगे, जिनके संचालक तो काफी बदल गए, लेकिन रंगत वही बनी रही। ये रेस्टारेंट किसी प्रतीक से पहचाने जाते हैं। जैसे पैवैलियन, फोर सिस्टर्स, हेलमेट। तब इनसे रास्ता बताना आसान होता था। यहां की प्रसिद्ध नदी टेम्स का पानी साल भर मटमैला होता है, जबकि यूरोप में आम तौर पर नदियां साफ पानी वाली होती हैं। टेम्स की तलहटी मिट्‌टी वाली है, जो उसे साफ नहीं रहने देती।
 
यहां लंदन से अन्यत्र जाने वाली ट्रेन भी मेट्रो या वंदे भारत जैसी होती हैं, जिनमें हवाई जहाज जैसी सुविधाएं होती हैं। इनमें बैठने के लिए सीट होती हैं और भारत की तरह कुछ बोगियां और आरक्षित बोगी में भी कुछ सीट बिना आरक्षण के होती हैं। उन पर लिखा रहेगा- अवेलेबल। पूरे रास्ते उद्घोषणा होती रहती है। बस, मेट्रो, ट्रेन में दिव्यांग, बुजुर्ग के लिए सीट अलग होती हैं। उन पर आप बैठ सकते हैं, लेकिन किसी के आने पर उठना होता है।
 
बातें तो काफी हैं, लेकिन हर एक का उल्लेख जरूरी नहीं। मैंने अभी तक ब्रिटेन, यूरोप के सात देश, मॉरीशस, दुबई, थाईलैंड की यात्रा की है। अपने इस भ्रमण के मद्देनजर एक ही बात कह सकता हूं- सारे जहां से अच्छा हिंदोस्ता हमारा और हिंदोस्ता में सबसे अच्छा इंदौर हमारा। दुनिया घूमें, लेकिन इंदौर जैसा खान-पान, आत्मीयता, शांति-सद्भाव, उल्लास, उत्सवप्रियता, सुरक्षित वातावरण, दिलदार लोग, आसपड़ोस, पता पूछने पर गली या मकान तक छोड़ने आने का उत्साह जैसे अनेक कारण हैं, जिनकी वजह से इंदौर लाजवाब है। (समाप्त) 
लेखक के बारे में
रमण रावल
मध्यप्रदेश के कुक्षी (धार) में  5 जुलाई 1957 में जन्मे रमण रावल वाणिज्य स्नातक हैं। पत्रकारिता की शुरुआत 1979 से इंदौर से प्रकाशित साप्ताहिक युग प्रभात से हुई। इससे पहले अपने गांव से ही पत्र लेखन शुरू हो चुका था। 3 जुलाई 1975 को नईदुनिया के संपादकीय पन्ने पर पहला.... और पढ़ें
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