आगे तो बढ़ रहे हैं… पर किस दिशा में? कहीं ऐसा तो नहीं कि जीवन बेहतर बनाने की दौड़ में हम जीना ही भूलते जा रहे हैं?
सुबह आंख खुलते ही हमारी दौड़ शुरू हो जाती है। काम, जिम्मेदारियां, बढ़ते खर्च, बच्चों का भविष्य और जीवन में कुछ बेहतर कर दिखाने की बेचैनी। एक काम पूरा नहीं होता कि दूसरा सामने खड़ा हो जाता है। हम चलते रहते हैं—कभी अपनों के लिए, कभी अपने सपनों के लिए और कभी केवल इसलिए कि रुककर यह सोचने का समय ही नहीं मिलता कि हम जा कहां रहे हैं।
धीरे-धीरे यही दौड़ हमारा जीवन बन जाती है। हम कमाते हैं, आगे बढ़ते हैं, नई उपलब्धियां प्राप्त करते हैं। बाहर से देखने पर लगता है कि सब कुछ ठीक चल रहा है। लेकिन कभी रात के शांत माहौल में मन पूछता है— 'मैं इतना कुछ कर रहा हूं… लेकिन क्या सचमुच उस जीवन के करीब पहुंच रहा हूं, जिसे जीना चाहता हूं?'
शायद यह प्रश्न हम सभी को समय-समय पर स्वयं से पूछना चाहिए।
आज हमारे पास सुविधाएं अधिक हैं, लेकिन मन की शांति कम होती जा रही है। संपर्क बहुत हैं, लेकिन मन की बात कहने वाले लोग कम हैं। घर बड़े हो रहे हैं, पर साथ बैठने का समय घट रहा है। कमाई बढ़ रही है, लेकिन चिंताएं भी साथ-साथ बढ़ती जा रही हैं। समस्या आगे बढ़ने में नहीं है। चिंता तब शुरू होती है, जब गति बढ़ती जाए और दिशा पीछे छूट जाए; जब हम यह देखना भूल जाएं कि हम जा कहां रहे हैं और जो पा रहे हैं, उसके बदले क्या खोते जा रहे हैं।
हम सोचते हैं— थोड़ा और कमा लें, फिर परिवार को समय देंगे। थोड़ा और सफल हो जाएं, फिर स्वास्थ्य पर ध्यान देंगे। जिम्मेदारियां कम हो जाएं, फिर अपने मन की सुनेंगे। लेकिन जिम्मेदारियां कभी पूरी तरह समाप्त नहीं होतीं। एक लक्ष्य पूरा होता है, दूसरा सामने आ जाता है। वर्ष बीतते जाते हैं। बच्चे बड़े हो जाते हैं, माता-पिता बूढ़े हो जाते हैं, शरीर अपनी थकान बताने लगता है और कुछ रिश्ते केवल इसलिए दूर हो जाते हैं, क्योंकि हमने उनके लिए समय निकालना बंद कर दिया था।
फिर कभी एक दिन मनुष्य के पास वह सब कुछ हो सकता है, जिसे पाने के लिए उसने वर्षों मेहनत की थी। लेकिन उसी समय उसे यह भी महसूस हो सकता है कि जिन लोगों के लिए वह इतना कुछ जुटा रहा था, उनके साथ बिताने वाला समय कहीं पीछे छूट गया। जीवन की सबसे बड़ी विडंबना शायद यही है— हम भविष्य को बेहतर बनाने में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि वर्तमान को जीना भूल जाते हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि सपने देखना, धन कमाना या सफल होना गलत है। बड़ा सपना देखिए। खूब मेहनत कीजिए। अपना भविष्य संवारिए। अपने व्यवसाय को आगे बढ़ाइए। अपने परिवार को बेहतर जीवन दीजिए। लेकिन समय-समय पर यह भी देखिए कि सफलता पाने की कीमत क्या चुका रहे हैं।
यदि अधिक कमाने के लिए स्वास्थ्य खो रहे हैं, परिवार का भविष्य बनाने के लिए परिवार से ही दूर होते जा रहे हैं या दुनिया की नजरों में सफल बनने के बाद भी भीतर संतोष नहीं है, तो शायद आपको मेहनत कम करने की नहीं, अपनी दिशा सुधारने की आवश्यकता है। कभी शांत मन से अपने जीवन का हिसाब कीजिए। केवल यह मत देखिए कि पिछले वर्ष आपकी आय कितनी बढ़ी। यह भी देखिए कि आपके संबंध कितने मजबूत हुए, स्वास्थ्य कितना बेहतर हुआ, आपने अपने किसी सपने की ओर कितने कदम बढ़ाए और क्या आज आप एक वर्ष पहले की तुलना में अधिक संतुष्ट मनुष्य हैं। क्योंकि कई बार जीवन के खाते में उपलब्धियां बढ़ती रहती हैं, लेकिन जिन चीजों से जीवन सचमुच समृद्ध होता है, उनका संतुलन धीरे-धीरे घटता जाता है।
यदि इन प्रश्नों के उत्तर मन के अनुकूल नहीं हैं, तो स्वयं को असफल मत मानिए। आत्ममूल्यांकन का उद्देश्य स्वयं को दोष देना नहीं, समय रहते अपनी दिशा सुधारना है। आज हमारी एक बड़ी समस्या यह भी है कि हम दूसरों के जीवन को देखकर अपनी सफलता का मूल्य तय करने लगे हैं। किसी की बड़ी नौकरी देखकर अपनी नौकरी छोटी लगती है। किसी का बड़ा घर देखकर अपना घर छोटा लगने लगता है। किसी की उपलब्धियां देखकर अपना जीवन साधारण लगने लगता है। हम भूल जाते हैं कि हर व्यक्ति की यात्रा अलग होती है। यदि खुशी का आधार दूसरों से आगे निकलना है, तो यह दौड़ कभी समाप्त नहीं होगी। आप कितना भी पा लें, कोई न कोई आपसे आगे दिखाई देगा। उपलब्धियां बढ़ती रहेंगी, लेकिन संतोष हमेशा कुछ कदम आगे खड़ा रहेगा।
इसलिए दूसरों से आगे निकलने के बजाय स्वयं से आगे बढ़ने का प्रयास कीजिए। कल की तुलना में आज थोड़ा अधिक समझदार हों, स्वास्थ्य के प्रति सजग रहें, अपनों के लिए उपस्थित रहें और अपने काम में बेहतर बनने का प्रयास करें। वास्तविक प्रगति वही है, जो उपलब्धियों के साथ मनुष्य के भीतर संतोष भी बढ़ाए। जीवन में असफल होना सबसे बड़ी हार नहीं है। मनुष्य असफल होकर सीख सकता है, फिर उठ सकता है और नया रास्ता चुन सकता है।
सबसे बड़ी भूल तब होती है, जब मनुष्य वर्षों तक केवल इसलिए चलता रहता है, क्योंकि वह चल रहा था— बिना यह देखे कि जिस मंजिल की ओर जा रहा है, वह उसकी अपनी मंजिल है भी या नहीं। यदि आज आपको लगता है कि जीवन की दिशा में कुछ बदलना चाहिए, तो सब कुछ एक साथ बदलने की कोशिश मत कीजिए।
एक छोटा परिवर्तन चुनिए।
अपने स्वास्थ्य के लिए प्रतिदिन थोड़ा समय निकालिए। किसी अपने से खुलकर बात कीजिए। लंबे समय से टाले गए काम की शुरुआत कीजिए। कोई नया कौशल सीखिए। अपने समय का कुछ हिस्सा उस सपने को दीजिए, जिसे जिम्मेदारियों के कारण वर्षों से पीछे छोड़ते आए हैं। छोटे कदम साधारण दिखाई देते हैं, लेकिन लगातार सही दिशा में उठाए गए छोटे कदम ही एक दिन जीवन की बड़ी तस्वीर बदल देते हैं। काम कीजिए, लेकिन स्वयं को समाप्त करके नहीं। पैसा कमाइए, लेकिन अपने संबंधों को गरीब बनाकर नहीं। सफलता प्राप्त कीजिए, लेकिन अपनी शांति खोकर नहीं। आगे बढ़िए, लेकिन इतना भी नहीं कि पीछे मुड़कर देखने पर अपने ही लोग बहुत दूर छूट गए हों।
याद रखिए, आप केवल जिम्मेदारियां निभाने के लिए पैदा नहीं हुए हैं। आप स्वयं भी एक मनुष्य हैं। आपके अपने सपने हैं। कुछ लोग हैं, जिन्हें आपकी उपलब्धियों से अधिक आपकी उपस्थिति की आवश्यकता है। कुछ इच्छाएं हैं, जिन्हें हमेशा 'किसी दिन' के लिए नहीं छोड़ा जा सकता। और आपके पास एक जीवन है—जिसका बीता हुआ समय वापस नहीं आएगा। इसलिए यदि आपको लगता है कि आप गलत दिशा में कुछ दूर निकल आए हैं, तो निराश मत होइए। कमजोर हुए संबंध फिर मजबूत किए जा सकते हैं। स्वास्थ्य की देखभाल आज से शुरू की जा सकती है। वर्षों से अधूरा सपना फिर उठाया जा सकता है। गलत निर्णयों से सीखा जा सकता है। और जीवन की दिशा किसी भी उम्र में बदली जा सकती है। जब तक जीवन शेष है, तब तक एक बेहतर जीवन बनाने की संभावना भी शेष है।
आपको सब कुछ छोड़ने की आवश्यकता नहीं है। केवल यह पहचानने की आवश्यकता है कि क्या महत्वपूर्ण है, क्या बदलना है और पहला कदम किस दिशा में उठाना है।
इसलिए आगे बढ़ते रहिए। बड़े सपने देखिए। खूब मेहनत कीजिए। सार्थक सफलता प्राप्त कीजिए। लेकिन समय-समय पर स्वयं से यह अवश्य पूछिए— क्या मैं केवल अधिक कमा रहा हूं, या भीतर से भी समृद्ध हो रहा हूं? क्या जिन लोगों के लिए मैं मेहनत कर रहा हूं, उनके लिए मेरे पास समय भी है? क्या मैं हर वर्ष केवल उम्र में बढ़ रहा हूं, या एक बेहतर मनुष्य भी बन रहा हूं?
और सबसे महत्वपूर्ण—मैं जिस जीवन को बेहतर बनाने के लिए दिन-रात दौड़ रहा हूं… क्या उसे सचमुच जी भी रहा हूं? यदि इन प्रश्नों में आपको अपना जीवन दिखाई देता है, तो स्वयं से निराश मत होइए। बीता हुआ समय वापस नहीं आएगा, लेकिन बचा हुआ समय अभी भी आपका है। जीवन की दिशा बदलने के लिए हमेशा किसी बड़े अवसर की आवश्यकता नहीं होती। कई बार एक ईमानदार आत्ममूल्यांकन, एक सही निर्णय और सही दिशा में उठाया गया छोटा-सा कदम ही पर्याप्त होता है।
इसलिए आगे बढ़िए, लेकिन केवल इसलिए नहीं कि दुनिया आगे बढ़ रही है। अपनी मंजिल पहचानिए, अपनों को साथ रखिए और समय-समय पर यह अवश्य देखिए कि आपकी मेहनत आपको उस जीवन के करीब ले जा रही है या नहीं, जिसे आप सचमुच जीना चाहते हैं। क्योंकि जीवन में सबसे महत्वपूर्ण यह नहीं कि हम कितनी दूर पहुंचे। महत्वपूर्ण यह है कि सही दिशा में चलते हुए हमने अपने लोगों को कितना समय दिया, अपने सपनों को कितना जिया और स्वयं को कितना बचाए रखा।
जीवन के अंत में शायद सबसे बड़ा संतोष यही होगा कि हम यह कह सकें— मैंने केवल जीवन बिताया नहीं… उसे सचमुच जिया।
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