Iran US War: अहंकार की लड़ाई जब दो व्यक्तियों में हो तो दो परिवार प्रभावित या बरबाद होते हैं, लेकिन जब ये दो देशों के बीच हो तो समूचा विश्व प्रभावित होता है और टकराने वाले दोनों ही देश बरबाद हो सकते हैं। रूस-यूक्रैन में टकराव तो 2014 से ही प्रारंभ हो गया था, किंतु पूर्णकालिक युद्ध 24 फरवरी 2022 से शुरू हुआ, जिसमें सीधे दोनों ने मैदान पकड़ लिया है, जिसमें अभी तक कोई कमजोर पड़ता नहीं दिखाई देता। इसी तरह से अमेरिका-वियतनाम के बीच 1955 में शुरू हुआ युद्ध 1975 में समाप्त हो सका था, वह भी अमेरिका सेना के पीछे हट जाने से। पीछे तो उसे अफगानिस्तान से भी हटना पड़ा, लेकिन फटे में टांग अड़ाने का अब भी कोई मौका वह नहीं छोड़ता। ऐसा ही है ईरान के साथ अमेरिका व इजराइल का हालिया पंगा, जो गले की हड्डी बन अटका है।
इस समय पूरी दुनिया में एक ही चर्चा है कि मध्य पूर्व एशिया में हाल-फिलहाल शांति हो पायेगी या अमेरिका-इजराइल का ईरान के साथ युद्ध चलता रहेगा? इस लाख टके के सवाल का अभी तो एक भी सही जवाब देने का माद्दा किसी में नहीं है। इन युद्धरत देशों में भी। फिर भी अभी तक के हालात के परिप्रेक्ष्य में यह तो कहा ही जा सकता है कि ईरान ने ऐंठ दिखाकर और अमेरिका ने युद्ध छेड़कर अक्लमंदी तो नहीं की। इजराइल तो आजीवन युद्धरत रहा है तो उसकी तो दिनचर्या ही ऐसी हो चुकी है। फिर भी, वह भी तीसमारखां तो नहीं बन पाया। इतिहास इस कालखंड का जब निर्मम, बेबाक और वास्तविक तथ्यों पर आधारित विश्लेषण करेगा, तब समूची दुनिया के लिए वे ऐसे सबक होंगे, जो आगामी काल के लिए निर्णायक और विषम परिस्थितियों में सटीक फैसले लेने में सहायक होंगे।
कोई माने या न माने, यह अटल सत्य है कि सुपर पॉवर का तमगा लिए दुनिया के सामने इतराने वाले अमेरिका की बुरी गत हुई है। यह न तो उसके लिए न शेष विश्व के लिए अच्छा संकेत है। जिस आतंकवाद से समूची दुनिया थर्राती आई है, उसे नकेल डालने में जो भूमिका अमेरिका निभा सकता था, यह उस पर संशय खड़े करता है। हालांकि यह भी उतना ही बड़ा सच है कि विश्व में आतंकवाद को पल्लवित करने में अमेरिका का प्रमुख हाथ रहा है। भले ही वह अपनी हथियार लॉबी की ब्लैकमेलिंग या ताकत के आगे झुककर फैसले लेते रहा हो। इक्कीसवीं सदी में अब जो आगे होगा, वह अमेरिका के एकाधिकार के खात्मे का इतिहास बनेगा। इसके लिए निर्विवाद रूप से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ही दोषी करार दिए जाएंगे।
बीसवीं और इक्कीसवीं सदी में अभी तक इतना भ्रमित, विचलित, विवादास्पद, सनकी और तानाशाही के मिश्रित चरित्र वाले अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प पर ठप्पा लगेगा कि उन्होंने अमेरिका के सुपर पॉवर की छवि वाली बंद मुट्ठी को अंगुलियां मरोड़कर खोल दिया। यह कोई मामूली बात नहीं है कि उनके अपने देश में 60 लाख लोग उनकी युद्ध नीति के खिलाफ सड़क पर उतर आए थे। वे भले ही कार्यकाल पूरा करें, लेकिन इतना तय जान लीजिए कि वे जितने समय व्हाइट हाउस में काबिज रहेंगे, उतना अधिक अमेरिका गर्त की ओर लुढ़केगा।
अब, जबकि कुछ दिन शांति के मिले हैं, तब दुनिया यह विश्लेषित करने में जुटी है कि आखिरकार इस युद्ध के भड़कने के कारण क्या थे? हम यह तो नहीं कह सकते कि ईरान निर्दोष है या ट्रम्प एकतरफा गलत हैं, लेकिन विभीषिका के इस स्वरूप की जरूरत तो बिल्कुल नहीं थी। जिन मुद्दों पर सीधे मिसाइलें दाग दी गईं, वे हलवे की तरह चट कर जाने वाले नहीं हैं। ईरान के पास परमाणु हथियारों के होने का अभी तक कोई प्रमाण नहीं मिला है और न उसने किसी ऐसी वैश्विक आतंकवाद को बढ़ावा देने वाली घटना को अंजाम दिया था, जो उसके खिलाफ जंग का एलान करवा दे। जो गलती अमेरिका ने अतीत में इराक के पास रासायनिक हथियार होने का कारण बताकर वहां अमेरिकी फौजें उतार कर की थी, वही उन्होंने ईरान के साथ करना चाहा। यह पासा इसलिए उलटा पड़ा कि ईरान के पास अस्त्र-शस्त्र का ऐसा विरल भंडार भरा था, जिसकी कल्पना अमेरिका समेत दुनिया में शायद ही किसी को रही होगी। यह तो अब पता चला कि उसने ऑइल मनी को चीन, रूस से हथियारों का जखीरा जमा करने के लिए उपयोग किया था। चूंकि दोनों ही देश अमेरिका के खिलाफ हैं तो स्वाभाविक रूप से ईरान से दोस्ती का हाथ बढ़ाना फायदेमंद ही रहना था। हो सकता है, होर्मुज के सामरिक व आर्थिक महत्व से भी वे परिचित रहे हों।
अमेरिका-ईरान के बीच पहली शांति वार्ता असफल होने के बाद दूसरी, तीसरी, चौथी होती रही, जो बेनतीजा ही कही जाएगी। ईरान-अमेरिका दोनों ही अब भी मोल-तौल करने की स्थिति में है। युद्ध विराम करने के बदले भी ईरान ने 10 सूत्री मांग पत्र थमाया था, जिस पर अमेरिका सहमत नहीं है। इसमें चार मांगें बेहद खास हैं, जिन पर ईरान अड़ा है और अमेरिका कतई तैयार नहीं है। ईरान खाड़ी देशों (सउदी अरब, कतर, यूएई, बहरीन व जॉर्डन) से 25 लाख करोड़ रुपए का मुआवजा चाहता है, जिस पर अभी तो कोई सहमत नहीं।
दूसरा, वह होर्मुज से गुजरने वाले तेल जहाजों से प्रति बैरल एक डॉलर टोल चाहता है तो दूसरी तरफ अमेरिका होर्मुज पर खुद कब्जा चाहता है। अमेरिका ने सैन्य नाकाबंदी भी की, लेकिन चीन समेत अन्य जहाज वहां से सुरिक्षत निकल चुके हैं। तीसरा, ईरान परमाणु कार्यक्रम 5 साल तक रोकेगा, जबकि अमेरिका 20 साल तक इसे रोकना चाहता है। चौथा, युद्ध विराम में लेबनान भी शामिल रहेगा, जिस पर इजराइल को आपत्ति है। अब देखना दिलचस्प है कि बाजुओं का जोर दिखाने में किसकी रुचि है और कौन हाथ मिलाने को तैयार है।
इस युद्ध ने दुनिया के सामने एक और पहलू पर ध्यान दिलाया है। अब लड़ाई के लिए तोप-मिसाइलें, जल-थल-नभ सेना की मजबूती ज्यादा मायने नहीं रखती। यह दौर आर्टिफिशियल इंटेलिजेन्स (एआई) का है, जिससे ड्रोन संचालित होते हैं। ये युद्ध की समूची दिशा बदलने में सक्षम है, जो ईरान ने कर दिखाया। यूक्रेन भी इसी बूते रूस को पानी पिला रहा है। अमेरिका-इजराइल की सबसे बड़ी चूक यही हुई कि वे मिसाइल हमले रोकने की व्यूह रचना करते रहे और ईरान ने छोटा बम, बड़ा धमाका की तर्ज पर ड्रोन हमले कर बड़े लक्ष्य भेद डाले। खाड़ी देशों में ईरानी ड्रोन ने जो कहर बरपाया है, उस नुकसान से उबरने में इन्हें 3 से 5 साल तक लगेंगे और अरबों डॉलर का खर्च होगा, वह अलग। ड्रोन हमलों की मार यूक्रैन दिखा चुका है, जिसने महाशक्ति रूस को नाको चने चबवा रखे हैं।
इस युद्ध से एक और तस्वीर साफ हुई कि अब अमेरिका अकेला सब कुछ नहीं कर सकता। जिस तरह से नाटो देशों ने उसका साथ देने से स्पष्ट इनकार किया, वह दुनिया के सामने बड़ी चेतावनी है। इसका संदेश साफ है कि प्रत्येक देश अब अपने हित-अहित पहले देखेगा, फिर पंचायत में उलझेगा। ट्रम्प की खीज ने यह बताया है कि वे मुगालते में थे कि मित्र देश ईरान पर टूट पड़ेंगे। यदि वाकई ऐसा होता तो रूस-यूक्रेन (5 वर्ष हो चुके हैं) की तरह यह भी अनिश्चित काल चलता रहता और रूस व चीन को भी हस्तक्षेप का मौका मिल जाता, जो पूरी दुनिया की सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक व्यवस्था को तहस-नहस करने की ओर ले जाता। इसकी विभीषिका तीसरे विश्व युद्ध के समान होती, जिसमें क्या-क्या गुल खिलते, कोई नहीं कह पाता।
सबसे प्रमुख बात-इसमें भारत की क्या स्थिति रही? उसने निष्पक्ष रहकर स्वयं को सुरक्षित रखा। जिसका नतीजा यह हुआ कि चलते युद्ध में गैस व तेल से भरे टैंकर आते रहे, वह ईरान से ही सात साल के लिए तेल खरीदने का समझौता कर सका और चीन के साथ उसके मालवाहक जहाज निकलते रहे। यह लड़ाई हमारी किसी भी तरह से नहीं थी, बावजूद इसके कि ऑपरेशन सिंदूर में ईरान ने पाकिस्तान को ड्रोन व हथियार दिए थे। इसके उलट हमारा तंत्र ईरान के समानांतर लोगों से बात करता रहा, जिसे ईरान ने सकारात्मक माना। भविष्य में इसके वास्तविक संदेश नजर आएंगे और काफी हद तक वे भारत के पक्ष में रहेंगे।
एक जो सबसे चिंताजनक बात उभरी है, वह यह कि ट्रम्प इसे गली-मोहल्ले के दादा-पहलवानों की तरह लड़ रहे हैं और पल-पल में उनकी बदलती रीति-नीति ने उलझनों को बढ़ाया ही है। वे कभी अपने हित साधने वाले व्यापारी हो जाते हैं तो कभी तानाशाह। कभी दुनिया को कदमों तले मानकर पेश आते हैं तो कभी जादूगर की तरह डमरू बजाकर मसले हल करने का दावा करते हैं। उनके विरोधाभासी चरित्र को यूं तो दुनिया ने टैरिफ लागू करते हुए बखूबी देख ही लिया है, लेकिन युद्ध जैसे संवेदनशील व दूरगामी मसलों में उनका रवैया बचकाना रहा, जो विश्व के लिये बड़े खतरे का आगाज है। उन्हें रोका नहीं गया तो इस दुनिया को ज्वालामुखी के लावे की तरह बहते देखना भी नसीब हो जाएगा।