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लोकतंत्र की पहली पाठशाला: छात्रसंघ चुनावों की वापसी क्यों जरूरी? जानें युवाओं की बड़ी जिम्मेदारी

Madhya Pradesh Student Union Elections 2026
"विश्वविद्यालय केवल डिग्रियाँ नहीं गढ़ते, वे राष्ट्र का भविष्य गढ़ते हैं।"
 
करीब नौ वर्षों के लंबे अंतराल के बाद मध्य प्रदेश के महाविद्यालयों में छात्रसंघ चुनावों की आहट फिर सुनाई दे रही है। कैंपस एक बार फिर जीवंत हैं- गलियारों में चुनावी नारों की गूंज है, कक्षाओं में प्रत्याशी विद्यार्थियों से संवाद कर रहे हैं, छात्र अपने भविष्य के प्रतिनिधियों पर चर्चा कर रहे हैं और पूरे परिसर का वातावरण लोकतांत्रिक ऊर्जा से भर उठा है। यह दृश्य केवल चुनावी गतिविधियों का नहीं, बल्कि उस लोकतांत्रिक संस्कृति की वापसी का प्रतीक है जिसकी शुरुआत शिक्षण संस्थानों से होती है।
 
मेरे लिए यह दृश्य केवल वर्तमान का अनुभव नहीं, बल्कि स्मृतियों का भी हिस्सा है। छात्र जीवन के वे दिन अनायास ही सामने आ खड़े होते हैं, जब मैं स्वयं छात्र राजनीति में सक्रिय था। वर्ष 2000 से लेकर 2017 तक छात्र राजनीति से जुड़ने एवं मार्गदर्शन करने का एक लंबा अवसर मुझे मिला। विद्यार्थियों की समस्याओं को समझना, नेतृत्व करना, संगठन बनाना, संवाद स्थापित करना और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का हिस्सा बनना मेरे सार्वजनिक जीवन की ऐसी पाठशाला रही जिसने मेरे व्यक्तित्व और सोच दोनों को परिपक्व बनाया। आज यह गहराई से महसूस होता है कि छात्रसंघ चुनाव केवल प्रतिनिधि चुनने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि नेतृत्व, उत्तरदायित्व और लोकतांत्रिक संस्कारों का पहला विद्यालय हैं।
 
लोकतंत्र संसद या विधानसभा की सीढ़ियों से शुरू नहीं होता; उसकी पहली सांस विद्यालयों और महाविद्यालयों के परिसरों में चलती है। यहीं युवा मतदान का महत्व समझते हैं, भिन्न विचारों का सम्मान करना सीखते हैं, असहमति के साथ भी संवाद करने की कला विकसित करते हैं और यह अनुभव करते हैं कि नेतृत्व अधिकार नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व है। इसी कारण छात्र राजनीति को 'लोकतंत्र की पहली पाठशाला' कहा जाता है।
 
वर्ष 2017 के बाद मध्य प्रदेश के अधिकांश महाविद्यालयों में छात्रसंघ चुनाव नहीं हुए। इस दौरान एक पूरी पीढ़ी कॉलेजों में आई, पढ़ाई पूरी की और आगे बढ़ गई, लेकिन उन्हें लोकतंत्र का प्रत्यक्ष अभ्यास करने का अवसर नहीं मिला। आज जो विद्यार्थी स्नातक और स्नातकोत्तर कक्षाओं में अध्ययनरत हैं, उनके लिए यह पहला अवसर होगा जब वे अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करेंगे। यह केवल मतपत्र पर मुहर लगाने या बटन दबाने का अवसर नहीं, बल्कि एक सजग लोकतांत्रिक नागरिक बनने की दिशा में पहला कदम है।
 
शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री प्राप्त करना या रोजगार हासिल करना नहीं होता। इसका वास्तविक लक्ष्य ऐसे नागरिक तैयार करना है जो समाज के प्रति संवेदनशील हों, विवेकपूर्ण निर्णय लेने में सक्षम हों और सार्वजनिक जीवन में जिम्मेदारी निभाने का साहस रखते हों। छात्रसंघ चुनाव इन मूल्यों को व्यावहारिक रूप से सीखने का अवसर देते हैं। यहाँ विद्यार्थी समझते हैं कि लोकतंत्र केवल बहुमत का नाम नहीं, बल्कि संवाद, सहमति और सम्मानजनक असहमति की संस्कृति का नाम है।
 
भारतीय लोकतंत्र का इतिहास इस बात का साक्षी है कि अनेक राष्ट्रीय और प्रादेशिक नेताओं ने अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत छात्र राजनीति से ही की। संसद, विधानसभाओं और सामाजिक आंदोलनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले अनेक व्यक्तित्व कभी कॉलेज परिसरों में छात्र प्रतिनिधि रहे। मध्य प्रदेश भी इससे अलग नहीं है। यहाँ के छात्रसंघों ने ऐसे अनेक नेता दिए जिन्होंने आगे चलकर राजनीति, प्रशासन, शिक्षा और समाज सेवा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया। इसलिए छात्रसंघ चुनावों को केवल एक वार्षिक औपचारिकता मानना उनके ऐतिहासिक महत्व को कम करके आंकना होगा।
 
समय के साथ छात्र राजनीति का स्वरूप भी बदला है। मेरे छात्र जीवन में चुनाव प्रचार पोस्टर, पर्चियों, दीवार लेखन और नुक्कड़ सभाओं तक सीमित रहता था। आज डिजिटल युग में व्हाट्सएप ग्रुप, इंस्टाग्राम, फेसबुक, यूट्यूब और अन्य सोशल मीडिया मंच चुनावी अभियान के प्रमुख माध्यम बन चुके हैं। यह परिवर्तन समय की मांग भी है और एक नया अवसर भी। इससे संवाद का दायरा व्यापक हुआ है और विद्यार्थी अपने विचार अधिक प्रभावी ढंग से रख पा रहे हैं। हालाँकि, इसके साथ ही यह जिम्मेदारी भी बढ़ी है कि डिजिटल मंच स्वस्थ बहस का माध्यम बनें- दुष्प्रचार, ट्रोलिंग और व्यक्तिगत कटाक्ष का नहीं।
 
आज की राजनीति की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि अनेक बार रचनात्मक विमर्श की जगह शोर और तथ्यों की जगह भावनात्मक ध्रुवीकरण हावी हो जाता है। यदि यही प्रवृत्ति छात्र राजनीति में भी प्रवेश कर गई, तो लोकतंत्र की पहली पाठशाला अपना मूल उद्देश्य खो देगी। इसलिए यह आवश्यक है कि चुनाव व्यक्तियों की लोकप्रियता से अधिक मुद्दों की गंभीरता पर आधारित हों। महाविद्यालयों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, आधुनिक पुस्तकालय, शोध सुविधाएं, छात्रावास, खेल, महिला सुरक्षा, दिव्यांग-अनुकूल परिसर, डिजिटल संसाधन, स्टार्टअप और कौशल विकास जैसी मूलभूत आवश्यकताओं को चुनावी विमर्श का केंद्र बनाया जाना चाहिए। विद्यार्थियों को यह समझना होगा कि केवल अच्छे भाषण से अधिक महत्वपूर्ण एक अच्छी और व्यावहारिक कार्ययोजना होती है।
 
यह भी उतना ही आवश्यक है कि छात्र राजनीति अपनी मूल आत्मा को सुरक्षित रखे। राजनीतिक दलों की वैचारिक प्रेरणा लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा हो सकती है, लेकिन छात्रसंघों की प्राथमिकता सदैव 'छात्रहित' ही रहनी चाहिए। यदि चुनाव धनबल, बाहुबल, जातीय ध्रुवीकरण या व्यक्तिगत प्रतिद्वंद्विता का माध्यम बनेंगे, तो उनका शैक्षणिक और लोकतांत्रिक उद्देश्य कमजोर पड़ जाएगा। विश्वविद्यालय प्रशासन, राज्य सरकार, छात्र संगठनों और स्वयं विद्यार्थियों की यह साझा जिम्मेदारी है कि चुनाव मर्यादित, शांतिपूर्ण और विचार-केंद्रित हों।
 
छात्रसंघ के निर्वाचित प्रतिनिधियों के लिए भी यह अवसर केवल विजय प्राप्त करने का नहीं, बल्कि विद्यार्थियों का विश्वास अर्जित करने का है। उनका प्रमुख दायित्व प्रशासन और विद्यार्थियों के बीच प्रभावी संवाद स्थापित करना, समस्याओं के समाधान के लिए रचनात्मक पहल करना और परिसर में सकारात्मक शैक्षणिक वातावरण बनाए रखना है। नेतृत्व का वास्तविक अर्थ लोकप्रियता नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व और सेवा भाव है। यदि यह भावना छात्र जीवन में ही विकसित हो जाए, तो वही युवा भविष्य में समाज और राष्ट्र को बेहतर नेतृत्व प्रदान करेंगे।
 
मध्य प्रदेश में प्रस्तावित छात्रसंघ चुनाव इसलिए केवल एक प्रशासनिक कार्यक्रम नहीं हैं, बल्कि वे लोकतांत्रिक विश्वास की पुनर्स्थापना का सुनहरा अवसर हैं। नौ वर्षों के बाद लौटती यह चुनावी हलचल केवल पोस्टरों, नारों और मतदान तक सीमित नहीं रहनी चाहिए; यह विचारों के पुनर्जागरण, संवाद की पुनर्स्थापना और युवाओं की सकारात्मक भागीदारी का उत्सव बननी चाहिए।
 
आज आवश्यकता इस बात की है कि विद्यार्थी चुनाव को अधिकार नहीं बल्कि दायित्व के रूप में देखें, उम्मीदवार पद को नहीं बल्कि सेवा को अपना संकल्प समझें, और विश्वविद्यालय प्रशासन चुनाव को महज औपचारिकता न मानकर लोकतांत्रिक संस्कृति के उत्सव के रूप में संचालित करे। यदि ऐसा हुआ, तो यह केवल छात्रसंघ चुनावों की वापसी नहीं होगी, बल्कि लोकतंत्र की उस आत्मा का पुनर्जन्म होगा जो शिक्षा संस्थानों से होकर पूरे समाज तक प्रवाहित होती है। इतिहास गवाह है- जब विश्वविद्यालयों में विचार जागते हैं, तब केवल परिसर ही नहीं जागते; समाज जागता है, राजनीति परिपक्व होती है और राष्ट्र का भविष्य एक नई व सही दिशा प्राप्त करता है।
लेखक के बारे में
अमित राव पवार
अमित राव पवार वर्ष 2004 से देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं, समाचार पत्रों और डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर समसामयिक तथा धार्मिक-सांस्कृतिक और इतिहास विषयों पर निष्पक्ष एवं स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। समाज के प्रति उनके योगदान और वैचारिक प्रतिबद्धता को देखते हुए उन्हें देवास (मध्य प्रदेश) शहर का 'स्वच्छता ब्रांड.... और पढ़ें
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