बांकीपुर से प्रशांत किशोर की जीत के क्या हैं मायने
मनीष कुमार
प्रशांत किशोर (पीके) की बिहार के उपचुनाव में जीत पर फिलहाल उन्हें गेम चेंजर तो नहीं कहा जा सकता लेकिन इतना तो साफ है कि बिहार की राजनीति करवट लेना चाह रही है। ALSO READ: दक्षिण कोरिया में गर्मी ने तोड़ा 100 साल का रिकॉर्ड
इस जीत का साफ संदेश है कि कुछ वोटर सिर्फ जातिगत समीकरण नहीं देख रहे, बल्कि उनकी नजर में मुद्दों, गवर्नेंस व विकास के साथ-साथ विकल्प भी अहमियत रख रहा है। साथ ही, यह भी तय है कि बतौर विधायक अब अकेले ही प्रशांत किशोर विधानसभा में गवर्नेंस के मुद्दे पर दबाव बनाए रखेंगे। अगर सब कुछ ठीक रहा तो एनडीए को मजबूरी मान रहे लोगों को उनकी पार्टी भी विकल्प के रूप में दिखेगी। भारत की राजनीति ने एक बार फिर चौंकाया है।
बीजेपी की पारंपरिक सीट
बांकीपुर उपचुनाव के लिए 30 जुलाई को मतदान हुआ था। इस बार 2025 के चुनाव की तुलना में यहां सात प्रतिशत कम वोटिंग हुई। पिछली बार यहां 41.39 प्रतिशत मतदान हुआ था, जबकि इस बार 34.30 फीसदी वोटिंग हुई। 2010 में हुए विधानसभा चुनाव के बाद मतदान का यह सबसे कम प्रतिशत है। एनडीए की तरफ से बीजेपी के नीरज सिन्हा और महागठबंधन की ओर से आरजेडी की रेखा गुप्ता सहित कुल 25 उम्मीदवार चुनाव मैदान में थे।
बांकीपुर की यह सीट बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद नितिन नवीन के इस्तीफे से खाली हुई थी। यह बीजेपी की परंपरागत सीट मानी जाती रही है। 1995 से यहां बीजेपी जीतती रही है। पहले पिता नवीन कुमार सिन्हा और फिर पुत्र नितिन यहां से लगातार जीतते रहे।
यहां से पांच बार लगातार जीतने वाले नितिन को इस बार भी पार्टी की जीत का इतना अधिक भरोसा था कि उन्होंने यहां तक कहा था कि बांकीपुर की जनता इस चुनाव में बीजेपी की जीत के नए कीर्तिमान स्थापित करेगी। लेकिन अब, जब पीके ने बीजेपी के गढ़ में घुसकर सेंध लगा दी है।
राजनीतिक समीक्षक एके चौधरी कहते हैं, बिहार में चुनाव में जाति ही जीत की गारंटी रही है। इसी समीकरण को देखकर पार्टियां टिकट भी देती रही हैं, यह इतनी जल्दी टूटने वाला नहीं है। हां, इतना जरूर है कि पीके की जीत से उन सुधारों की चर्चा अवश्य ही तेज होगी, जिससे संबंधित मुद्दे वे 2025 के चुनाव से उठा रहे। अब इन मुद्दों से अन्य पार्टियां भी मुंह नहीं मोड़ सकेंगी।'' ALSO READ: क्या हम फफूंद के खतरे को अब तक कम आंकते रहे हैं?
पीके पर भरोसा बढ़ेगा
प्रशांत किशोर की 'वोटकटवा' वाली छवि पर इसका असर पड़ेगा। 2025 के चुनाव में जनसुराज ने 238 सीट पर अपने प्रत्याशी खड़े थे, किंतु हालत इतनी खराब हुई कि 237 पर पार्टी के उम्मीदवार अपनी जमानत तक नहीं बचा सके थे। चौधरी कहते हैं, पीके को पिछली बार ही चुनाव लड़ना चाहिए था। राघोपुर सहित अन्य सीटों से उनके चुनाव लड़ने की बात पहले सामने आई, किंतु अंतत: वे शायद हिम्मत नहीं जुटा सके, या यूं कहिए कि अपनी जीत के प्रति आश्वस्त नहीं थे। पार्टी के मुखिया की यह अनिश्चितता लोगों को शायद रास नहीं आई।''
विश्लेषकों का कहना है कि इस जीत से उनका मनोबल तो बढ़ेगा ही, साथ ही उनकी जिम्मेदारियां भी बढ़ गई हैं। आखिरकार, उन्हें चुनौतीपूर्ण लंबी लड़ाई जो लडऩी है। हालांकि बीजेपी के एक नेता कहते हैं, "और कारण जो भी रहे हों, पीके की जीत में भितरघात की भी बड़ी भूमिका रही। अन्यथा इतना अधिक मार्जिन नहीं रहता। निशाने पर कौन और क्यों था, आप समझ सकते हैं।"
बीजेपी के गढ़ में मिली यह जीत प्रशांत किशोर के लिए संजीवनी का काम करेगी। राजनीति विज्ञान की अवकाश प्राप्त प्रोफेसर श्यामली घोष कहती हैं, अब उनकी शख्सियत केवल एक पॉलिटिकल स्ट्रैटेजिस्ट की नहीं रह जाएगी, बल्कि वह राजनेता के रूप में स्थापित हो जाएंगे। उनकी पार्टी के लिए अवसर बढ़ेंगे, लेकिन बहुत कुछ विधानसभा में उनके परफार्मेंस पर निर्भर करेगा, जिससे आम जनता को लगे कि उनकी बात दमदार तरीके से उठाने वाला कोई है, जिस पर कोई चर्चा नहीं होती।''
घोष के मुताबिक प्रशांत किशोर को सरकार के उन वादों को जोरदार तरीके से उछालना होगा, जिन पर काम नहीं हुआ या वे पूरे नहीं हुए। सरकार के आंकड़ों के खेल पर भी उन्हें सक्रिय रहना होगा। तभी उनकी पार्टी के प्रति लोगों का भरोसा बढ़ेगा, क्योंकि बिहार में जातिगत रूढ़िवादिता को तोड़ना इतना आसान नहीं है।
श्यामली घोष यह भी कहती हैं, यह कहना जल्दबाजी होगी कि इससे एनडीए की पार्टियों का कोर वोटर शिफ्ट हो रहा। हां, यह इस बात का संकेत हो सकता है कि सवर्ण सहित इनका शहरी व मिडिल क्लास वोटर इनसे बिदक सकता है। मुझे नहीं लगता कि सम्राट सरकार पर कोई असर पड़ने वाला है।''
हालांकि, पीके एनडीए की हार का ठीकरा मुख्यमंत्री के सिर फोड़ने की कोशिश करते हुए उनसे नैतिक आधार पर इस्तीफे को लेकर तंज तो कसते रहेंगे। जनसुराज पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष मनोज भारती ने इसे जनता की जीत और बीजेपी की हार बताते हुए कहा, बिहार में लोकतंत्र को जीवित रखने के लिए इस जीत के बड़े मायने हैं।'' ALSO READ: अमेरिका-चीन के बीच तनाव, अमेरिका ने लगाया चीनी रोबोट पर प्रतिबंध
गठबंधनों को करना होगा आत्ममंथन
बिहार में पिछले कई दशकों से कोई भी पार्टी अकेले सत्ता पर काबिज नहीं हो सकी है। जातिगत समीकरणों को देखते हुए गठबंधन उनकी मजबूरी बन जाती है। सत्ता पक्ष में बीजेपी, जेडीयू, चिराग पासवान की एलजेपी (लोक जनशक्ति पार्टी), उपेंद्र कुशवाहा की आरएलएम (राष्ट्रीय लोकतांत्रिक मोर्चा) और जीतन राम मांझी की हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) है तो विपक्ष में आरजेडी, कांग्रेस और माले सहित सात पार्टियां हैं। पिछले 21 सालों के अधिकांश समय में एनडीए सत्ता और आरजेडी विपक्ष में है। यह परिणाम इन दोनों गठबंधनों के लिए झटका तो है ही, साथ यह एक अवसर भी है।
श्यामली घोष कहती हैं, अब समय आ गया है कि दोनों ही पक्ष आत्ममंथन करें। किसी वर्ग विशेष को अपनी जागीर का हिस्सा नहीं समझें। अपनी नीतियों तथा रणनीति की समीक्षा करें। क्योंकि, अगर एनडीए से शहरी वोटरों का मोहभंग दिख रहा है तो आरजेडी का माइ (मुस्लिम-यादव) समीकरण भी कहीं न कहीं दरक रहा।''
जेडीयू-आरजेडी में भी नेतृत्व के प्रति चुनौती बढ़ेगी। कांग्रेस प्रवक्ता असितनाथ तिवारी तो पहले ही कह चुके हैं कि बिहार में महागठबंधन को चलाने की जिम्मेदारी आरजेडी पर है, लेकिन इस चुनाव में तेजस्वी यादव ने साथी दलों को साथ लेने की जरूरत ही नहीं समझी। हालांकि, आरजेडी प्रवक्ता एजाज अहमद ने इस आरोप को सिरे से खारिज किया है।
इस खींचतान के बीच गठबंधन की पार्टियों में परिवर्तन के इच्छुक वोटर जनसुराज के प्रति आकर्षित तो हो ही सकते हैं। पटना के बोरिंग रोड निवासी वोटर राहुल कहते हैं, परिवर्तन से ही बेहतर मिलता है। पहले विकल्प का अभाव था। लोग यह सोचते थे कि कहीं पहले वाली स्थिति ना लौट आए, इसलिए मजबूरी में वोट करते थे। स्वाभाविक है, जब विकल्प दिखेगा तो लोग आजमाएंगे ही। इसमें गलत क्या है।''
प्रशांत किशोर की जीत के फैक्टर अब चाहे जितने गिना लें, फिलहाल बीजेपी का यह भ्रम तो टूट ही गया कि वे बांकीपुर सीट से किसी को भी जीत दिला देंगे।

