Tulsi Vivah 2026: देवउठनी एकादशी पर ऐसे करें तुलसी-शालिग्राम विवाह की तैयारी, चमकेगा सौभाग्य
तुलसी विवाह देवउठनी एकादशी के दिन मनाया जाने वाला एक अत्यंत पवित्र उत्सव है, जिसमें माता तुलसी का विवाह भगवान विष्णु के स्वरूप शालिग्राम जी से विधि-विधानपूर्वक संपन्न कराया जाता है। हालांकि कुछ समाज में यह परंपरा कार्तिक पूर्णिमा के दिन निभाई जाती है। इस पावन पर्व की तैयारी को सरल और व्यवस्थित बनाने के लिए यहाँ संपूर्ण पूजन सामग्री चेकलिस्ट और चरणबद्ध विधि दी गई है।
- तुलसी का पौधा (गमला सहित)
- शालिग्रामजी की शिला
- गन्ने का मंडप (4 गन्ने, पत्ते सहित)
- पूजन सामग्री
- वर पक्ष और वधू पक्ष के लोग
चरणबद्ध तैयारी और पूजा विधि
1. मंडप और स्थान की सजावट
सफाई व गेरू लेपन: पूजा स्थान की अच्छी तरह सफाई करें। तुलसी जी के गमले को धोकर उस पर गेरू, हल्दी और चूने से सुंदर रंगोली या स्वास्तिक बनाएं।
गन्ने का मंडप: गमले के चारों ओर 4 गन्ने खड़े करके ऊपर से लाल चुन्नी या धागे से बांधकर सुंदर विवाह मंडप तैयार करें।
2. तुलसी माता और शालिग्राम जी का श्रृंगार
तुलसी माता: तुलसी जी को लाल चुनरी ओढ़ाएं। उन्हें सिंदूर, रोली, बिंदी, चूड़ियां और मेहंदी अर्पित कर दुल्हन का रूप दें।
शालिग्राम जी: शालिग्राम जी को पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) और गंगाजल से स्नान कराएं। फिर उन्हें पीले वस्त्र पहनाएं और जनेऊ अर्पित करें।
3. विवाह अनुष्ठान और फेरे
चौकी स्थापना: तुलसी जी के गमले के दाहिनी ओर एक चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर शालिग्राम जी को स्थापित करें।
वर-माला व गठजोड़: शालिग्राम जी को तुलसी जी के पास लाएं और दोनों को फल-फूल की माला पहनाएं। लाल चुनरी और पीले वस्त्र के छोर को मिलाकर 'गठबंधन' करें।
तिलक व पूजा: दोनों को हल्दी, चंदन का तिलक लगाएं। शालिग्राम जी पर तिल और तुलसी पत्र अर्पित करें (ध्यान रखें कि तुलसी माता पर स्वयं तुलसी पत्र न चढ़ाएं)।
परिक्रमा (फेरे): शालिग्राम जी की शिला को हाथ में लेकर तुलसी जी के गमले की 7 बार परिक्रमा (फेरे) कराएं।
4. भोग और आरती
भगवान को खीर, हलवे, आंवला, सिंघाड़ा, शकरकंद और मौसमी फलों का भोग लगाएं।
धूप-दीप जलाकर 'जय तुलसी माता' और भगवान विष्णु की आरती गाएं। आरती के बाद प्रसाद सभी में वितरित करें।
ध्यान रखने योग्य बातें:
तिल का प्रयोग: शालिग्राम पूजा में चावल (अक्षत) के स्थान पर सफेद या काले तिल का उपयोग करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
विष्णुप्रिया तुलसी: शालिग्राम जी पर तुलसी पत्र अवश्य चढ़ाएं, क्योंकि बिना तुलसी के भगवान विष्णु भोग स्वीकार नहीं करते।

