भगवान जगन्नाथ को क्यों लगाया जाता है फुलुरी तेल? जानिए उपचार और दिव्य श्रृंगार की अनोखी परंपरा
स्नान पूर्णिमा के बाद भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा को बुखार आता है। इस दौरान 15 दिनों के 'अनासारा' (गुप्त उपचार) काल में सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार भगवान का जड़ी-बूटियों से बने 'फुलुरी तेल' से उपचार और श्रृंगार किया जाता है। यह अनूठी परंपरा पूरी तरह वैज्ञानिक और धार्मिक दृष्टिकोण पर आधारित है।
जब भगवान बीमार पड़ते हैं: 'अनासर' काल
जेठ महीने की पूर्णिमा के दिन भगवान जगन्नाथ को 108 घड़ों के सुगन्धित जल से स्नान कराया जाता है, जिसे 'स्नान पूर्णिमा' कहते हैं।
बीमारी का कारण: इतने अधिक जल से स्नान करने के कारण महाप्रभु को तेज बुखार आ जाता है।
अनासर घर: बीमार होने के बाद भगवान को 15 दिनों के लिए एक गुप्त कक्ष में रखा जाता है, जिसे 'अनासर' कहा जाता है। इस दौरान आम भक्तों के लिए मंदिर के कपाट बंद रहते हैं।
क्या है 'फुलुरी तेल' और कैसे होता है उपचार?
भगवान के इस बुखार और बदन दर्द को ठीक करने के लिए 'फुलुरी तेल' का उपयोग किया जाता है। यह कोई साधारण तेल नहीं होता, बल्कि इसे एक साल पहले से तैयार किया जाता है।
बनाने की विधि: शुद्ध तिल के तेल में बेल, मल्लिका (चमेली), चंपा, जूही जैसे सुगन्धित फूल, जड़ें और जड़ी-बूटियां मिलाई जाती हैं।
तैयारी: इस मिश्रण को मिट्टी के बर्तनों में बंद करके हेरा पंचमी (पिछले वर्ष की रथयात्रा के दौरान) के दिन जमीन के नीचे दबा दिया जाता है।
उपचार का दिन: ठीक एक साल बाद, अनासर काल की अष्टमी तिथि को इस तेल को जमीन से निकाला जाता है। इसके बाद मंदिर के विशेष सेवकों (दैतापति) द्वारा महाप्रभु के श्रीअंग पर इस तेल की मालिश (मालिश और श्रृंगार) की जाती है।
विशेष मान्यता: यह तेल एक तरह का आयुर्वेदिक लेप और थेरेपी है, जो भगवान के दिव्य शरीर के "ज्वर" (बुखार) को शांत करता है। इस तेल की मालिश के बाद भगवान धीरे-धीरे स्वस्थ होने लगते हैं।
नवयौवन रूप और रथयात्रा
फुलुरी तेल की मालिश और जड़ी-बूटियों के काढ़े (ओषधि) के सेवन के बाद, भगवान पूरी तरह स्वस्थ हो जाते हैं। रथयात्रा से ठीक एक-दो दिन पहले भगवान 'नवयौवन' रूप में भक्तों को दर्शन देते हैं, जिसे 'नेत्रोत्सव' कहा जाता है। इसके बाद ही वे पूरी तरह सज-धजकर मौसी के घर (गुंडिचा मंदिर) जाने के लिए रथ पर सवार होते हैं।
यह परंपरा हमें सिखाती है कि भगवान भी जब मानव रूप (काष्ठ विग्रह) में धरती पर आते हैं, तो वे प्रकृति के नियमों, बीमारी और उपचार के चक्र से गुजरते हैं।
