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Written By WD Feature Desk
Last Updated : शनिवार, 11 अप्रैल 2026 (18:31 IST)

वरुथिनी एकादशी 2026: जानें इसका अर्थ, पूजा विधि, शक्तिशाली मंत्र और मिलने वाले चमत्कारी लाभ

Lord vishnu
Ekadashi fasting Date n Time 2026: वरुथिनी एकादशी का व्रत 13 अप्रैल 2026 सोमवार के दिन रखा जाएगा। वरूथिनी का अर्थ है- संकटों से बचाने वाली ढाल। माना जाता है कि जो व्यक्ति इस एकादशी का व्रत रखता है, यह व्रत उसके लिए एक अभेद कवच (Shield) की तरह काम करता है।
 

वरुथिनी का अर्थ:

प्राचीन काल में युद्ध के दौरान रथ के चारों ओर जो सुरक्षा घेरा या रक्षक दल होता था, उसे भी 'वरुथिनी' कहा जाता था। सरल शब्दों में कहें तो, जो आपको हर तरफ से सुरक्षित घेरे में रखे और बाहरी बाधाओं से बचाए, वही 'वरुथिनी' है।
 

शुभ समय:

ब्रह्म मुहूर्त- प्रात: 04:28 से 05:13 तक।
अभिजीत मुहूर्त- दिन में 11:56 से 12:47 तक।
गोधूलि मुहूर्त- शाम को 06:44 से 07:07 तक।
 

वरुथिनी एकादशी का विशेष मंत्र

चूंकि इस दिन वराह भगवान की पूजा का विधान है, इसलिए इस मंत्र का जाप विशेष फलदायी होता है:
ॐ वराहाय नमः
संकटों से मुक्ति और रक्षा के लिए (वरुथिनी कवच मंत्र)
यदि आप शत्रुओं या संकटों से रक्षा के लिए यह व्रत कर रहे हैं, तो 'श्री विष्णु सहस्रनाम' का पाठ करें या इस छोटे मंत्र का जाप करें:
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं वराह रूपाय नमः
 

वरुथिनी एकादशी की पूजा विधि:

  • वरुथिनी एकादशी के पहले दिन यानी दशमी तिथि की रात्रि में सात्विक और हलका भोजन करें, प्‍याज-लहसुन का त्‍याग दशमी से ही कर दें। 
  • एकादशी के दिन सुबह सूर्योदय से पहले उठकर शौच आदि से निवृत्त होकर स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करके व्रत का संकल्प लें।
  • तत्पश्चात घर के पूजा स्‍थल को गंगाजल से पवित्र करें। 
  • श्री भगवान विष्णु की प्रतिमा को स्‍नान करवाएं तथा अक्षत, दीपक, नैवेद्य आदि सामग्री से विधिपूर्वक पूजन करें। 
  • घर के आसपास पीपल का वृक्ष हो तो उसकी जड़ में कच्चा दूध चढ़ाकर, पूजा करें और घी का दीपक जलाएं।
  • साथ ही तुलसी का पूजन करें। 
  • पूजन के दौरान 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जप करते रहें।
  • भगवान श्रीहरि को खरबूजे का भोग लगाएं।
  • रात्रि में पुन: भगवान श्री विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा तथा अर्चना करें। 
  • पूरे दिन श्री विष्णु का स्मरण करें।
  • रात में भगवान श्री विष्णु का ध्यान, कीर्तन आदि करते हुए रात्रि जागरण करें। 
  • एकादशी व्रत के दिन अगर हो सकें तो एक ही बार फलाहार ग्रहण करें।
  • एकादशी के अगले दिन यानी द्वादशी को व्रत खोलने से पूर्व पुन: श्री विष्‍णु का पूजन करके किसी योग्य ब्राह्मण या गरीब व्यक्ति को भोजन कराएं तथा दान-दक्षिणा दें।
  • तत्पश्चात व्रत का पारण करें। पारण के समय शुभ मुहूर्त का अवश्य ध्यान रखें।

वरुथिनी एकादशी का लाभ:

जैसा कि अभी वैशाख माह का कृष्ण पक्ष चल रहा है, तो इस संदर्भ में वरुथिनी एकादशी का नाम विशेष रूप से लिया जाता है। इस नाम के पीछे एक ठोस कारण है।
दुखों से सुरक्षा: माना जाता है कि जो व्यक्ति इस एकादशी का व्रत रखता है, यह व्रत उसके लिए एक अभेद कवच (Shield) की तरह काम करता है। यह उसे मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक कष्टों से सुरक्षित रखता है।
सौभाग्य की प्राप्ति: 'वरुथिनी' का अर्थ केवल रक्षा नहीं, बल्कि सौभाग्य भी है। कहा जाता है कि इस व्रत के प्रभाव से व्यक्ति के कष्टों का नाश होता है और उसे सुख-सौभाग्य प्राप्त होता है।
कथा का संकेत: पौराणिक कथाओं के अनुसार, राजा मान्धाता ने इसी 'वरुथिनी' शक्ति के प्रभाव से मोक्ष प्राप्त किया था।
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