शारदीय नवरात्रि 2026: मां दुर्गा के 7 सबसे शक्तिशाली शक्तिपीठ
माता सती के जहां जहां अंग गिरे वह सभी शक्तिपीठ बने और जहां रक्त गिरा वह रक्तिपीठ बने। प्रमुख 51 शक्तिपीठों में से 7 ऐसे शक्तिपीठ हैं जहां जाकर भक्त कभी भी खाली हाथ नहीं लौटा है। नवरात्रि में यह शक्तिपीठ और भी ज्यादा जागृत हो जाते हैं। यदि आप यहां नहीं गए हैं तो एक बार जरूर जाएं।
1. विमला शक्तिपीठ, जगन्नाथपुरी ओड़िसा
भारतीय प्रदेश उड़ीसा के विराज में उत्कल स्थित जगह पर माता की नाभि गिरी थी। इसकी शक्ति है विमला और शिव को जगन्नाथ कहते हैं। विमला शक्तिपीठ जगन्नाथ मंदिर के दक्षिण-पश्चिमी कोने में पूर्व की ओर स्थित है। मार्कण्डेय तालाब के पास पुरी में एक सप्त मातृका मंदिर भी मौजूद है। कुछ लोग इसे शक्तिपीठ कहते हैं, लेकिन, विमला मंदिर मूल है। कुछ लोग इसे विराज शक्ति पीठ भी कहते हैं, जो उड़ीसा के जाजपुर में स्थित है।
स्थानीय मान्यता के अनुसार यही देवी संपूर्ण जगन्नाथ क्षेत्र की रक्षा करती है। इन देवी की आज्ञा से ही सभी कार्य होते हैं। यह यहां की रक्षक देवी हैं। इन्हें योगमाया और परमेश्वरी कहा जाता है। जगन्नाथ से पहले से ही वे यहां पर विराजमान हैं। इसे पहला आदिशक्ती पीठ कहा जाता है। तंत्र और मंत्र की अधिश्वरी देवी वही है। माया और छाया उन्हीं के कंट्रोल में रहती है। यह तंत्र का सेंटर है। विरजा और विमला अलग अलग हैं या एक इसको लेकर मतभेद हैं। ओड़ियास के समुद्री तट पर स्थित पुरी के जगन्नाथ मंदिर पहुंचने के लिए किसी भी मार्ग से पहुंचा जा सकता है।
2. मां विंध्यवासिनी शक्तिपीठ, काशी
शिवपुराण के अनुसार इन्हें माता सती का अंश मानकर 'वनदुर्गा' भी कहा जाता है। देवताओं के अनुरोध पर माता ने पृथ्वी कल्याण के लिए विंध्याचल पर्वत को अपना स्थाई निवास चुना। मां विंध्यवासिनी की पूजा केवल एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भक्तों की सोई हुई किस्मत जगाने वाली और तुरंत फल देने वाली महासाधना है। उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर में गंगा किनारे बसी मां विंध्यवासिनी का दरबार देश के सबसे जाग्रत शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार, अन्य शक्तिपीठों में देवी के केवल अंगों की प्रतीक रूप में पूजा होती है, लेकिन विंध्याचल इकलौता ऐसा स्थान है जहाँ देवी के पूरे विग्रह (संपूर्ण रूप) के दर्शन होते हैं।
3. हिंगलाज माता का रहस्यमयी शक्तिपीठ, बलूचिस्तान
बलूचिस्तान की सुरम्य पहाड़ियों और हिंगोल नदी के तट पर स्थित हिंगलाज माता मंदिर आस्था का एक ऐसा केंद्र है, जहाँ मजहब की दीवारें धुंधली पड़ जाती हैं। माता सती के 51 शक्तिपीठों में से एक इस स्थान को हिंदू जहाँ परम शक्ति मानते हैं, वहीं मुस्लिम समुदाय इन्हें अत्यंत श्रद्धा के साथ 'नानी पीर' कहकर पुकारता है। माना जाता है कि यह गुफा मंदिर 2000 वर्षों से भी अधिक पुराना है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, यहाँ माता सती का मस्तिष्क गिरा था। इस स्थान की महत्ता इतनी है कि यहाँ की यात्रा करने वाली महिलाओं को 'हाजियानी' कहकर सम्मानित किया जाता है। इतिहास गवाह है कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम, गुरु नानक देव और गुरु गोरखनाथ जैसी महान विभूतियों ने भी यहाँ शीश नवाया है।
4. माता हरसिद्धि शक्तिपीठ, उज्जैन:
मध्य प्रदेश के उज्जैन में स्थित है माता का हरसिद्धि मंदिर। हरसिद्धि मंदिर माता के 51 शक्तिपीठों में से एक है। मान्यता है कि इस जगह पर देवी सती की कोहनी गिरी थी। यूं तो इस मंदिर के कई आकर्षक है लेकिन एक खास वजह से यह हमेशा ही लोगों में चर्चा का केंद्र बना रहता है वह है मंदिर में बने दो दीप स्तंभ। लगभग 51 फीट ऊंचे इस दीप स्तंभ के बारे में मान्यता है कि इस उज्जैन के सम्राट राजा विक्रमादित्य ने बनवाया था। इस तरह से यह दीप स्तंभ लगभग 2000 साल से ज्यादा पुराना है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार उज्जैन के राजा विक्रमादित्य माता हरसिद्धि के अनन्य भक्त थे। जैन श्रुति के अनुसार वे घर बाहर साल में अपना सिर माता हरसिद्धि को अर्पित कर दिया करते थे लेकिन देवी की कृपा से उन्हें चमत्कारी रूप से हर बार नया सिर मिल जाता था लेकिन 12वीं बार जब उन्होंने अपना सिर देवी को चढ़ा कर अर्पित किया तो वह वापस नहीं आया और इस तरह से उनके जीवन का अंत हो गया।
5. कालीपीठ (कोलकाता कालिका शक्तिपीठ):
कोलकाता स्थित कालीपीठ, जिसे कालीघाट मंदिर भी कहा जाता है, भारत के प्रमुख शक्तिपीठों में से एक है। रामकृष्ण परमहंस की आराध्या देवी मां कालिका का कोलकाता में विश्व प्रसिद्ध मंदिर है। इस स्थान पर सती देह की दाहिने पैर की चार अंगुलियां गिरी थी। इसलिए यह सती के 52 शक्तिपीठों में शामिल है। इस स्थान पर 1847 में जान बाजार की महारानी रासमणि ने मंदिर का निर्माण करवाया था। 25 एकड़ क्षेत्र में फैले इस मंदिर का निर्माण कार्य सन् 1855 पूरा हुआ। कोलकाता के उत्तर में विवेकानंद पुल के पास स्थित इस पूरे क्षेत्र को कालीघाट कहते हैं।
6. मां ज्वालादेवी, कांगड़ा:
भारत के हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा में जहां माता सती की जीभ गिरी थी, उसे ज्वालाजी स्थान कहते हैं। यह माता सती के 51 शक्तिपीठों में से एक है। इसकी शक्ति है सिद्धिदा (अंबिका) और भैरव को उन्मत्त कहते हैं। इस मंदिर में माता के मूर्तिरूप की नहीं बल्कि ज्वाला रूप की पूजा होती है, जो हजारों वर्षों से प्रज्वलित है। यहां प्रज्वलित ज्वाला चमत्कारिक मानी जाती है। इस स्थान से आदिकाल से ही पृथ्वी के भीतर से 9 अग्निशिखाएं निकल रही हैं। ये ज्वालाएं 9 देवियों- महाकाली, महालक्ष्मी, सरस्वती, अन्नपूर्णा, चंडी, विन्ध्यवासिनी, हिंगलाज भवानी, अम्बिका और अंजना देवी का ही स्वरूप हैं।
7. पावागढ़ शक्तिपीठ, गुजरात:
गुजरात की ऊंची पहाड़ी पर बसा पावागढ़ मंदिर। यहां स्थित काली मां को महाकाली कहा जाता है। काली माता का यह प्रसिद्ध मंदिर मां के शक्तिपीठों में से एक है। शक्तिपीठ उन पूजा स्थलों को कहा जाता है, जहां सती मां के अंग गिरे थे। पावागढ़ में मां के वक्षस्थल गिरे थे। कहते हैं कि यहां माता का जागृत दरबार लगता है और उनकी कई सेविकाएं उनके लिए कार्य करती हैं। यहीं लोगों को दंड या दान मिलता है। इस पहाड़ी को गुरु विश्वामित्र से भी जोड़ा जाता है। कहा जाता है कि गुरु विश्वामित्र ने यहां काली मां की तपस्या की थी। यह मंदिर गुजरात की प्राचीन राजधानी चंपारण्य के पास स्थित है, जो वडोदरा शहर से लगभग 50 किलोमीटर दूर है। पावागढ़ मंदिर ऊंची पहाड़ी की चोटी पर स्थित है। रोप-वे से उतरने के बाद आपको लगभग 250 सीढ़ियां चढ़ना होंगी, तब जाकर आप मंदिर के मुख्य द्वार तक पहुंचेंगे।

