कोरोना का इलाज: दिल्ली के प्राइवेट अस्पतालों में लाखों का ख़र्च, सरकारी में डराने वाली हालत

BBC Hindi| Last Updated: शुक्रवार, 12 जून 2020 (16:51 IST)
सिन्धुवासिनी/शादाब नाज़मी (बीबीसी संवाददाता)

'मेरे पिता कोरोना संक्रमण से पीड़ित हैं। मैंने उन्हें बीएल कपूर, फ़ोर्टिस, मैक्स, मूलचंद, वेंकटेश्वर, होली फ़ैमिली और अपोलो जैसे नामी और सुपर स्पेशियलिटी अस्पतालों में भर्ती कराने की कोशिश की लेकिन किसी ने उनकी परवाह नहीं की। उन्होंने बेड न होने की बात कही। उन्होंने कहा कि अगर मैं 15-20 लाख रुपए एडवांस में जमा करा सकता हूं तो कुछ हो सकता है, वरना नहीं।
दिल्ली के कोटला मुबारकपुर में रहने वाले मोहित ने बीबीसी से अपने कोरोना संक्रमित और गंभीर रूप से बीमार पिता को भर्ती कराने में आई मुश्किलों के बारे में विस्तार से बताया। मोहित 7 जून से ही अपने पिता को किसी अच्छे अस्पताल में भर्ती कराने की कोशिशों में जुटे थे और आख़िकार उन्हें बड़ी मुश्किल से 10 जून को दिल्ली के कटवारिया सराय के रॉकलैंड हॉस्पिटल में जगह मिली। 'चैरिटी बेड्स' नाम की ग़ैर-सरकारी संस्था ने उनके पिता को यहां भर्ती कराने में मदद की लेकिन इसके लिए मोहित तीन दिन तक इंतज़ार करना पड़ा।
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मोहित के 62 वर्षीय पिता तीन जून को दिल्ली के सरकारी एलएनजेपी अस्पताल में भर्ती हुए थे लेकिन वहां के बुरे हालात देखकर मोहित ने उन्हें कहीं और ले जाने का फ़ैसला किया। इलाज के बंदोबस्त में कमी और भारी ख़र्च की मार झेलने वाले अकेले मोहित ही नहीं हैं। उनकी तरह कई और लोगों ने भी ऐसी ही जानकारी बीबीसी हिन्दी से साझा की। केजरीवाल ने दिल्ली में कोरोना के हालात और उपराज्यपाल के आदेश पर क्या कहा?
बाटला हाउस इलाके में रहने वाले हैदर अली ने बताया कि कम-से-कम 5-6 अस्पतालों के चक्कर काटने के बाद उनकी कोरोना संक्रमित पत्नी को हमदर्द नगर के एक अस्पताल में भर्ती कराया जा सका। हैदर अली का आरोप है कि मरीज़ को भर्ती करने से पहले अस्पताल ने उन्हें एक लाख रुपए कैश में जमा कराने पर मजबूर किया।

इसी तरह सादिक नगर में रहने वाले विनय ने अपने कोविड-19 संक्रमित भाई को भर्ती कराने के लिए चार-5 प्राइवेट अस्पतालों में संपर्क किया लेकिन कहीं बात नहीं बनी। उन्होंने बताया कि मैंने लाजपत नगर के मेट्रो हॉस्पिटल से रोज़ाना के संभावित खर्च के बारे में पूछा था और उन्होंने मुझसे कहा था कि रोज़ 25 हज़ार के लगभग ख़र्च आएगा।
विनय ने अपने भाई को सरकारी आरएमएल अस्पताल में भर्ती कराने का सोचा था लेकिन वहां की स्थति बहुत ख़राब थी। वो बताते हैं कि अस्पताल के बाहर और अंदर परिसर में बिल्कुल सफ़ाई नहीं थी। हर जगह इतनी भीड़ थी कि लोग मक्खी-मच्छरों की तरह एक-दूसरे से चिपके हुए थे। एक ही जगह पर टेस्ट हो रहा था, वहीं रिपोर्ट मिल रही थी और वहीं किसी की मौत की ख़बर आते ही रोना-धोना चल रहा था। ये सब देखकर मैं बहुत घबरा गया और मुझे लगा कि भाई यहां रहा तो और बीमार हो जाएगा।
सरकारी अस्पताल बेहाल, प्राइवेट में भारी बिल

मोहित, हैदर अली और विनय की शिकायत है कि कोरोना वायरस संक्रमण से पीड़ित लोग सरकारी अस्पतालों की अव्यवस्था, बेड और टेस्टिंग की कमी से परेशान हैं साथ ही प्राइवेट अस्पतालों के भारी-भरमक बिल ने उनके लिए बेबसी के हालात पैदा कर दिए हैं।

प्रोग्रेसिव मेडिकोज़ एंड साइंटिस्ट्स फ़ोरम के अध्यक्ष डॉक्टर हरजीत सिंह भट्टी भी मानते हैं कि ज़्यादातर कोविड संक्रमित मरीजों को भर्ती करने से पहले 5 लाख रुपए तक की एडवांस राशि ले रहे हैं और रोज़ाना का खर्च लगभग 25 हज़ार रुपए तक आ रहा है।
अभी कुछ दिनों पहले ही रोहिणी स्थित सरोज हॉस्पिटल का एक सर्कुलर सोशल मीडिया में वायरल हुआ था जिसमें कहा गया था कि किसी भी कोविड मरीज़ को भर्ती कराने के लिए कम से कम चार लाख रुपए एडवांस में देने होंगे। विवाद और हंगामे के बाद हॉस्पिटल ने सफ़ाई दी कि यह एक पुराना सर्कुलर है और अब रेट बदल दिए गए हैं।
बीबीसी ने जब सरोज हॉस्पिटल को फ़ोन कर इस बारे में जानकारी लेनी चाही तो बताया गया कि जनरल वार्ड को प्रतिदिन का ख़र्च 30-35 हज़ार और आईसीयू वार्ड का रोज़ाना खर्च 40-50 हज़ार के लगभग आएगा। बीबीसी की टीम पिछले तीन दिनों से दिल्ली के अलग-अलग अस्पतालों में फ़ोन करके खाली बेड, वेंटिलेटर और खर्च का जानकारी जुटाने की कोशिश कर रही है।इस दौरान हमें अस्पतालों से जो जवाब मिले, वो कुछ इस तरह है:
* एस्कॉर्ट हार्ट इंस्टीट्यूट में बेड उपलब्ध हैं लेकिन इसके लिए भारी-भरकर राशि देनी होगी। बेड का रोज़ाना ख़र्च- 9000 रुपए, डॉक्टर की एक विजिट-4200 रुपए, आईसीयू का रोज़ाना खर्च-एक लाख रुपए और भर्ती होने से पहले 50 हज़ार-80 हज़ार रुपए एडवांस में देना होगा।

* संत परमानंद हॉस्पिटल में जनरल वॉर्ड और आईसीयू बेड उपलब्ध हैं लेकिन वेंटिलेटर नहीं। जनरल वार्ड में भर्ती होने के लिए एडवांस में 5 लाख और आईसीयू के लिए नौ लाख का ख़र्च।
* बत्रा हॉस्पिटल में कोई बेड खाली नहीं है लेकिन अगर मरीज़ की हालत बहुत नाजुक है और कोई इंश्योरेंस नहीं है तो लाख रुपए के एडवांस भुगतान के बाद आईसीयू वार्ड में जगह मिल सकती है।

* धर्मशाला नारायण हॉस्पिटल में बेड खाली नहीं हैं और कई मरीज़ पहले से ही वेटिंग लिस्ट में हैं।

* तीर्थराम शाह अस्पताल में बेड हैं लेकिन वेंटिलेटर उपलब्ध नहीं हैं। अस्पताल के पास चार वेंटिलेटर हैं और सभी पर मरीज़ हैं इसलिए गंभीर मरीज़ों की भर्ती नहीं हो रही है।
* सीताराम भरतिया इंस्टिट्यूट में बेड उपलब्ध हैं लेकिन वेंटिलेटर नहीं। इसलिए सिर्फ़ उन्हीं मरीज़ों को भर्ती किया जा रहा है जिनकी हालत स्थिर है।
सरकार ने इस बारे में अब तक क्या किया है?
दिल्ली सरकार ने प्राइवेट अस्पतालों को निर्देश दिया है कि वो कोविड-19 से जुड़ी अपनी हर कैटेगरी की रेट लिस्ट सार्वजनिक करें। दिल्ली सरकार ने लैब टेस्ट, बेड, आइसोलेशन बेड, आईसीयू और वेंटिलेटर के ख़र्च को भी अस्पताल में अलग-अलग जगहों पर प्रमुखता से डिस्प्ले को कहा है।
सरकार ने ये भी है कहा कि हर निजी अस्पताल में एक सीनियर नर्सिंग ऑफ़िसर भी तैनात किया जाएगा जो मरीज़ों की मदद करेगा और उनकी शिकायतें सरकार तक पहुंचाएगा। हर अस्पताल में 24x7 हेल्पलाइन भी शुरू की गई है। हालांकि सरकार ने कोविड-19 के इलाज में लगने वाले कुल ख़र्च की कोई सीमा निर्धारित नहीं की है।

दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य महानिदेशालय की प्रमुख डॉक्टर नूतन मुंडेजा ने बीबीसी हिन्दी से कहा कि दिल्ली में कोविड-19 के इलाज के ख़र्च पर कोई कैप नहीं लगाया गया है। हमारे पास ऐसा करने के लिए कोई क़ानूनी प्रावधान नहीं है। भविष्य में ऐसा करना मुमकिन होगा या नहीं, इसका फ़ैसला सरकार करेगी।
कैसे लगेगी इस ख़र्च पर लगाम?

दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉक्टर गिरीश त्यागी ने बीबीसी हिन्दी से कहा कि निजी अस्पतालों के भारी-भरकम ख़र्च पर लगाम लगाने को लिए सरकार को अस्पतालों के प्रतिनिधियों से बात करनी चाहिए। डॉक्टर त्यागी सुझाव देते हैं कि सरकार अलग-अलग अस्पतालों से पूछे कि कोरोना संक्रमित मरीज़ का इलाज करने में उनके कितने पैसे ख़र्च होते हैं और फिर उसी आधार पर एक औसत राशि निर्धारित कर इस ख़र्च पर कैप लगा दे।
डॉक्टर हरजीत भट्टी का सुझाव है कि कुछ महीनों के लिए दिल्ली सरकार को निजी अस्पतालों के कुछ हिस्से का प्रबंधन अपने हाथ में ले लेना चाहिए। वो कहते हैं कि सरकार को चाहिए कि वो प्राइवेट अस्पतालों से कोविड वाले 20 फ़ीसदी बेड टेकओवर कर ले। वहां वो मरीज़ों को भर्ती करे, उनके इलाज के ख़र्च की निगरानी करे और प्रबंधन का ख़र्च उठाए। मुझे नहीं लगता कि निजी अस्पताल इस प्रस्ताव से असहमत होंगे।
इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉक्टर राजन शर्मा का मानना है कि मौजूदा हालात में कोरोना से लड़ाई के लिए 'एक राष्ट्र एक नीति' अपनाई जानी चाहिए। उन्होंने बीबीसी हिन्दी से कहा कि अचानक कोई एकतरफ़ा आदेश पारित करने और क़ानूनी कार्रवाई के ऐलान से बेहतर ये होगा कि सभी पक्ष मिलकर विचार-विमर्श करें और तब किसी फ़ैसले पर पहुंचे।

डॉक्टर राजन का मानना है कि महामारी के इस दौर में प्राइवेट अस्पतालों पर भी काफ़ी दबाव है क्योंकि कोरोना संक्रमित मरीज़ की देखभाल करना आसान नहीं होता।
उन्होंने कहा कि मरीज़ों की देखभाल करने वाले डॉक्टर, नर्स और अन्य स्वास्थ्यकर्मी ख़ुद भी संक्रमण की चपेट में आ रहे हैं। कोरोना पॉज़िटिव होने के बाद संक्रमित स्वास्थ्यकर्मी और उसके संपर्क में आने वाले सभी लोगों को एहतियातन क्वारंटीन में जाना ही पड़ता है। ऐसे में अस्पतालों के सामने स्टाफ़ की कमी लगातार बनी हुई है। कोई भी आदेश जारी करने से पहले सरकार को इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखना चाहिए।
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कैसे सुधरेंगे हालात?

डॉक्टर हरजीत भट्टी का सुझाव है कि अस्पताल में स्टाफ़ की कमी और मौजूदा चुनौतियों को देखते हुए सरकार उन मेडिकल ग्रैजुएट्स की मदद ले सकती है जो इंटर्नशिप कर रहे हैं या एमबीबीएस की डिग्री के बाद पीजी की तैयारी कर रहे हैं।
वो कहते हैं कि सभी एमबीबीएस ग्रैजुएट प्रशिक्षित डॉक्टर होते हैं। सरकार को उन्हें कोविड मरीज़ों की देखभाल के लिए बस 10-15 दिनों की ट्रेनिंग देनी होगी और इसके बाद वो ड्यूटी के लिए तैयार होंगे। इस तरह हम अस्पतालों में स्वास्थ्यकर्मियों की कमी को पूरा कर सकते हैं।

डॉक्टर हरजीत कहते हैं कि आख़िर में कुल मिलाकर बात स्वास्थ्य के क्षेत्र में निवेश पर आकर रुक जाती है और सरकारें अब भी यहां पैसे ख़र्च करने से कतराती हैं। भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने करीब दो हफ़्ते पहले एक याचिका पर सुनवाई करते हुए पूछा था कि सरकारों से मुफ़्त में ज़मीन लेने वाले अस्पताल कोविड मरीज़ों का मुफ़्त में इलाज क्यों नहीं कर सकते?
कोर्ट ने उन अस्पतालों की पहचान किए जाने का आदेश भी दिया था जो कम ख़र्च में कोरोना संक्रमित लोगों का इलाज कर सकते हैं। निजी अस्पतालों में कोविड मरीज़ों से मनमानी वसूली के मामले पर देश के और भी कई राज्यों में बहस छिड़ी है।

तमिलनाडु सरकार ने ऐसे कुछ मामलों के बाद इसी सप्ताह आदेश जारी कर कोरोना इलाज के ख़र्च की ऊपरी सीमा तय कर दी है। उसने अलग-अलग कैटेगरी के अस्पतालों के लिए अलग-अलग रेट तय कर दिए हैं।
मिसाल के तौर पर, अगर कोई कोविड-19 संक्रमित मरीज़ तमिलनाडु के ग्रेड-3 और ग्रेड-4 अस्पतालों के जनरल वार्ड में इलाज कराता है तो उससे 5,000 रुपए प्रतिदिन से ज़्यादा पैसे नहीं लिए जा सकेंगे। ग्रेड-1 और ग्रेड-2 के अस्पतालों के प्रतिदिन का अधिकतम ख़र्च 7,500 रुपए होगा और आईसीयू वार्ड का खर्च अधिकतम 15 हज़ार रुपए प्रतिदिन।

इससे पहले महाराष्ट्र सरकार ने पिछले महीने 22 मई को कोरोना संक्रमण के इलाज में प्रतिदिन का अधिकतम ख़र्च 9,000 रुपए निर्धारित कर दिया था।

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