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Tue, 1 Sep 2026

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विवेक त्रिपाठी
लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं

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रांधण छठ शीतला सातम व्रत का महत्व और पौराणिक कथा

रांधण छठ शीतला सातम व्रत का महत्व और पौराणिक कथारांधण छठ, गुजराती कैलेंडर में श्रावण कृष्ण पक्ष की षष्ठी को मनाया जाता है। यह शीतला सातम (सप्तमी) से ठीक एक दिन पहले आता है। क्योंकि शीतला सातम के दिन चूल्हा जलाना और भोजन पकाना वर्जित होता है, इसलिए सभी गुजराती परिवार अगले दिन के लिए पूरा भोजन रांधण छठ के दिन ही पकाकर रख लेते हैं। 'रांधण' का शाब्दिक अर्थ ही "भोजन पकाना" होता है, इसलिए इसे रांधण छठ कहा जाता है। चलिए जानते हैं महत्व और पौराणिक कथा। रांधण छठ इसे ललही छठ और हलछठ व्रत भी कहते हैं. इसके अलावा इसे हलषष्ठी, हरछठ व्रत, चंदन छठ, तिनछठी, तिन्नी छठ, कमर छठ या खमर छठ भी कहते हैं। शास्त्रों में मान्यता है कि इस दिन भगवान बलराम की पूजा करने से संतान की रक्षा होती है।